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World Television Day 2020: सभी को जोड़ने वाला टेलीविजन आज अकेला हो गया है..!

Sat, 21 Nov 2020 09:06 AM IST
Rajesh Verma राजेश वर्मा
Updated Sat, 21 Nov 2020 09:06 AM IST
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world television day 2020 history in hindi
1927 में टेलीविजन का आविष्कार अमेरिका के वैज्ञानिक जॉन लॉगी बेयर्ड ने किया था- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : social media

आज विश्व टेलीविजन दिवस है। टेलीविजन शब्द सुनते या देखते ही उस चौकोर डिब्बे की याद आ जाती है जिसकी स्क्रीन पर एक गोल से प्रतीक चिह्न के नीचे अंकित 'सत्यम् शिवम् सुदरम' नामक पंक्ति होती थी। यह पंक्ति और प्रतीक चिह्न राष्ट्रीय चैनल दूरदर्शन की याद दिलाते हैं।

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ज्यादातार लोग न तो विश्व टेलीविजन दिवस के बारे में जानते हैं और न ही टेलीविजन की कहानी के बारे में। टेलीविजन ग्रीक प्रीफिक्स ‘टेले’ और लैटिन वर्ड ‘विजीओ’ से मिलकर बना शब्द है। टेलीविजन यानि टीवी एक वैज्ञानिक उपकरण है, जो जन-संचार का दृश्य-श्रव्य माध्यम है।
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1927 में टेलीविजन का आविष्कार अमेरिका के वैज्ञानिक जॉन लॉगी बेयर्ड ने किया था। इसी टेलीविजन को पूरी तरह इलेक्ट्रॉनिक स्वरूप धारण करने के बाद जॉन लॉगी बेयर्ड 1938 में मार्केट में लेकर आ गए। भारत में हलांकि इसके पहुंचने में तीन दशक से ऊपर का समय लग गया।
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आज तो हर घर में टेलीविजन है, लेकिन पहला टेलीविजन खरीदने का सौभाग्य कोलकाता के एक संपन्न नियोगी परिवार को मिला था। देश में सर्वप्रथम टेलीविजन का प्रयोग 15 सितंबर 1959 को दिल्ली में दूरदर्शन केंद्र की स्थापना के साथ हुआ था, परंतु आमजन में इसका प्रसार 80 के दशक से माना जाता है। बदलती तकनीक व नए-नए अविष्कारों के चलते टेलीविजन में व्यापक परिवर्तन होते रहे।

भारत में इसका व्यापक प्रसार 1982 में आयोजित एशियाड खेलों के आयोजन से हुआ। लोगों को बुद्धिमान बनाने वाले इस बुद्धू बक्सा में दिखाई देने वाली बोलती तस्वीरें जो कभी ब्लैक एंड व्हाइट हुआ करती थी अब कलर में बदल गईंं। शुरू में इसका नाम टेलिविजन इंडिया था जो 1975 में बदलकर दूरदर्शन हो गया।

26 जनवरी 1993 को दूरदर्शन ने विस्तार करते हुए अपना दूसरा चैनल, "मेट्रो चैनल" के नाम से शुरू कर दिया बाद में पहला चैनल डीडी 1 और दूसरा डीडी 2 के नाम से लोकप्रिय हो गए। आज 30 से ऊपर राष्ट्रीय व क्षेत्रीय चैनल दूरदर्शन द्वारा देश भर में प्रसारित किए जा रहे हैं।

80-90 के दशक में रामायण व महाभारत जैसे धारावाहिकों ने टेलीविजन विस्तार में ऐसी क्रांति ला दी कि इनके प्रसारण के समय सड़कें तक सुनसान होने लग गई। राष्ट्रीय टेलीविजन चैनल दूरदर्शन एक ऐसी पहचान बन चुका था कि जिसके घर में टेलीविजन और दूरदर्शन आता उसे ही कामयाबी व उन्नति का प्रतीक समझा जाने लगा था।

दिन- प्रतिदिन टेलीविजन की बढ़ती भूमिका को देखते हुए 1996 में संयुक्त राष्ट्र की जनरल असेंबली 21 नवंबर को विश्व टेलीविज़न दिवस घोषित कर दिया। इसके बाद प्राइवेट चैनलों की एंट्री होना और इन्हें एक के बाद एक लाइसेंस मिलते गए। भारत में आज प्रसारित होने वाले टीवी चैनलों की संख्या लगभग 1000 के आसपास पहुंच चुकी है।

जैसे ही 21वीं सदी की शुरुआत से केबल टीवी की शुरुआत हुई वैसे ही भारत में सही तरीके से रंगीन टीवी का दौर शुरू हुआ। नित-नए आविष्कारों के साथ टेलीविजन में भी लगातार परिवर्तन होते गए। शुरू के भारी-भरकम डिब्बे के आकार से लेकर आज हल्के पतले एचडीटीवी भी स्मार्ट हो गए हैं।

टेलीविजन के आविष्कार नें इंफॉर्मेशन सेक्टर में एक क्रांति का आगाज किया इसके बाद वैश्विक स्तर पर टेलीविजन की इंपॉर्टेंस का जब लोगों को पता चला तब दूसरी क्रांति आई। वर्तमान में हमारा जो भी आर्थिक व सामाजिक विकास हुआ है उसके पीछे टेलीविजन की सकारात्मक भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता।

आज लोग घर परिवार में एक साथ बैठें होते हैं सामने टेलीविजन चला होता है, लेकिन...

world television day 2020 history in hindi
लगता है जैसे आज टीवी पर देखने के लिए कोई ऐसे कार्यक्रम ही नहीं बचे जिन्हें लोग आत्मीयता से देखें- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : पेक्सेल्स

कहते हैं हर चीज का दौर होता है शुरुआत से लेकर कामयाबी तक उस चीज में उतार-चढ़ाव आते हैं टेलीविजन के मामले में भी ऐसा ही हुआ। बदलती जीवनशैली व स्मार्टफोन ने आज लोगों को टेलीविजन से दूर कर दिया है। कह सकते हैं कि तकनीक के दौर में एक तकनीक ने इंसान को दूसरी तकनीक से ही दूर कर दिया है।

आज लोग घर परिवार में एक साथ बैठें होते हैं सामने टेलीविजन चला होता है, लेकिन उसे कोई नहीं देख रहा होता बस सभी के हाथों में स्मार्टफोन होता है सभी उसमें मग्न होते हैं। लगता है जैसे आज टीवी पर देखने के लिए कोई ऐसे कार्यक्रम ही नहीं बचे जिन्हें लोग आत्मीयता से देखें।

बस एक ही वर्ग है जो अब टीवी देखता है और वह खुद घरों में भी अब टीवी बनकर रह गया है जी हां आपने ठीक समझा यहां बुजुर्गों की ही बात हो रही है, टीवी को शायद अब बूढ़े बुजुर्ग ही देखते हैं अन्य लोग टीवी के सामने बैठे हुए भी कहीं और होते हैं।

वैसे प्रश्न यह भी उभर कर सामने आता है कि आखिर टीवी अकेला कैसे हो गया बहुत से कारण हैं टीवी के अकेले होने के सबसे पहला कारण तो यही है कि कोई वक्त था जब टीवी पर आने वाले धारावाहिकों को देखने के लिए भीड़ उमड़ती थी, गली मोहल्ले या गांव में किसी-किसी के पास ही एक टीवी होता था और आस-पड़ोस सभी उस घर में जमावड़ा डाल लेते थे कोई रामायण देखने को तो कोई महाभारत के लिए, कोई शक्तिमान देखने के लिए तो कोई अलिफ लैला देखना के लिए अपने काम तक छोड़ देता था।

इन धारावाहिकों से संस्कार व अच्छाई मिलती थी लेकिन बदलते समय व शहरीकरण ने टीवी पर कुछ और ही विषय परोस दिए सास-बहू की अनबन में कभी सास को बहू की दुश्मन तो कभी बहू को सास की दुश्मन बनाकर दिखाया जाता है कहने का भाव है रिश्तों में दरारें बढ़ाने के लिए इन टीवी धारावाहिकों ने कोई कसर बाकी नहीं रखी।

क्राइम रिपोर्टर जैसे धारावाहिकों ने लोगों को क्राइम करने के तरीके बता दिए। बहुत से अदाकार उन उत्पादों को बेचने के लिए टीवी पर विज्ञापन देते हैं जिनको वह अपने जीवन में खुद कभी उपयोग नहीं करते।

पहले समाचारों में लोग बहुत रुचि लेते थे, जब निजी समाचार चैनल शुरू हुए तो लोगों ने इनमें बहुत रुचि ली लेकिन धीरे-धीरे इनकी विश्वसनीयता कम होती चली गई, इन चैनलों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है और इनमें खुद को एक दूसरे से सर्वश्रेष्ठ साबित करने की होड़ मची हुई है, फिर उसकी बुनियाद भले ही झूठ पर क्यों न हो।

इन चैनलों पर होने वाली डिबेट का स्तर देख कर लगता है कि यह समाज में जागरूकता कम, द्वेष व नफ़रत को ज्यादा बढ़ावा दे रहे हैं। कई बार तो एंकर व वहां आए पैनल के बीच में हाथापाई तक देखने को मिल जाती है। इसी तरह फूहड़ता व नग्नता ने भी परिवारों को टेलीविज़न से दूर किया है।

इन सब चीजों को भला कोई खुद व परिवार को कैसे देखना-दिखाना चाहेगा? देश की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा ऐसा भी है जिसने अब इन्हीं कारणों के चलते टीवी को देखना तक छोड़ दिया है। केबल व डीटीएच कंपनियों ने शुल्क तो बढ़ा दिए लेकिन यह नहीं देखा की लोगों ने टीवी देखना छोड़ दिया है।।

कुछ लोग भले ही टीवी देखने में लोगों की कम होती रुचि को स्मार्टफ़ोन को ही दोषी मानते हों लेकिन इससे कहीं अधिक दोषी तो टीवी चैनल खुद भी हैं। कभी इसके बिना जीवन अधूरा लगता था लेकिन आज भागमभाग भरी जिंदगी की व्यस्तताओं ने भी टेलीविज़न को अकेले छोड़ दिया है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 


 
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