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प्रेस फ्रीडम: मुद्दों की प्राथमिकता बदलेगी पत्रकारिता

Mon, 08 May 2023 12:03 PM IST
himanshu joshi himanshu joshi
Updated Mon, 08 May 2023 12:03 PM IST
सार

क्या हम स्थानीय स्तर पर पत्रकार बन सकते हैं, हां बन सकते हैं और ऐसी हजारों कोशिशें हुई हैं। स्थानीय और ईमानदार लोगों ने नौकरियों को छोड़कर पहले अखबार निकाले हैं और चंदे से भी निकाले हैं। अब भी समाचार वेब पोर्टल, यूट्यूब चैनल निकाले जा रहे हैं पर सत्ता संरचना इतनी बड़ी और पैसे वाली है कि ऐसे पत्रकार उसमें फिट नहीं बैठ पाते।

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World Press Freedom Index 2023: Prioritization of issues Will Change The Dynamics Of Indian Journalism
World Press Freedom Index 2023 - फोटो : Istock

विस्तार

भारत में प्रेस की आजादी बहुत गम्भीर स्थिति में पहुंच गई है। अब देश के अन्य हिस्सों में दिल्ली से ही बता दिया जाता है कि क्या लिखना और बोलना है। अभी देश की राजनीति और जनता एक जैसे विचार रखती है, जब हमारे देश में धर्म-जाति को छोड़कर मुद्दों को प्राथमिकता मिलने लगेगी तब प्रेस भी मजबूत हो जाएगी।

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पत्रकारिता की स्वतंत्रता के लिए कार्य करने वाले अंतरराष्ट्रीय गैर-लाभकारी संगठन रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स द्वारा 180 देशों में पत्रकारिता की स्थिति का विश्लेषण कर जारी की गई रिपोर्ट 'विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2023' में भारत 161वें पर है और भारत में प्रेस की आजादी बहुत गम्भीर स्थिति में पहुंच गई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि 1 जनवरी 2023 से अब तक भारत में एक पत्रकार को मार दिया गया, यह हत्या महाराष्ट्र में हुई।
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रिपोर्ट में कुलीन वर्गों द्वारा मीडिया अधिग्रहण को भारत में प्रेस की स्वतंत्रता समाप्त होने की मुख्य वजह बताया गया है।

बी मुगन्धन और सी रेनुगा के भारत में प्रेस की स्वतंत्रता पर लिखे एक रिसर्च पेपर में भारतीय प्रेस के लिए सुझाव देते हुए लिखा है कि समाचार पत्र के सम्पादकों में खबर छापने को लेकर दबाव न हो इसके लिए समाचार पत्रों में उनके पूंजीपति मालिकों का दबाव कम करना होगा। साथ ही स्वतंत्र, नए और छोटे समाचार पत्रों को जमाने के लिए भी जरूरी कदम उठाने की आवश्यकता बताई गई है। इन सब सुझावों पर काम करना जरूरी बताया गया है क्योंकि स्वतंत्रता के बाद से राज्य प्रेस की स्वतंत्रता के लिए सबसे संभावित खतरे का स्रोत बना हुआ है।

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अब दिल्ली से तय होने लगी हैं खबरें

इस अप्रैल उत्तराखंड के चमियाला में आयोजित 31वें उमेश डोभाल स्मृति समारोह में प्रेस की स्वतंत्रता पर वरिष्ठ पत्रकार शंकर सिंह भाटिया ने कहा था कि जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो मैंने बीस-पच्चीस साल पत्रकारिता की है, मैंने साल 2000 से पहले और आज की पत्रकारिता भी देखी है।


पहले सारी खबरें रिपोर्टर ही तय किया करते थे और आज दिल्ली से ही बता दिया जाता है कि खबर कैसे लिखनी है। आठ साल पहले मैंने अखबार की नौकरी छोड़ दी थी क्योंकि मुझे लग गया था कि अब हम इस माहौल में काम नहीं कर पाएंगे। आज मीडिया की हालत बहुत खराब है, स्वतंत्रता से लिखना सम्भव नहीं हो पा रहा है।

इसी समारोह में एक स्थानीय व्यक्ति का कहना था कि हमारी खबरें कोई नहीं दिखाता। पहाड़ों में रोजगार, पानी की कमी, लचर स्वास्थ्य व्यवस्था जैसी खबरें मीडिया में कभी नहीं छाती हैं। टीवी चैनलों और अखबारों में अधिकतर वह खबरें ही दिखाई जाती हैं, जिनका हमसे कोई मतलब नहीं होता।

इसके बाद मुझे जब मंच में अपने विचार रखने का मौका मिला तो मैंने उस स्थानीय व्यक्ति का उत्तर देते हुए कहा था कि देहरादून, दिल्ली बैठे व्यक्ति को आपकी खबरों से क्या मतलब होगा। आप ग्रामवासियों को अपने पैसे से अपने पत्रकार बनाने चाहिए, जो प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साथ सोशल मीडिया के इस युग में आपकी बात सही तरीके से दुनिया तक पहुंचाएं। उस पत्रकार पर किसी संस्थान का दबाव नही होगा और उसकी लिखने की स्वतंत्रता भी समाप्त नहीं होगी।
 

World Press Freedom Index 2023: Prioritization of issues Will Change The Dynamics Of Indian Journalism
World Press Freedom Index 2023 - फोटो : Istock

स्थानीय पत्रकारिता हमेशा से रही है उपेक्षित

प्रेस की स्वतंत्रता से क्षेत्रीय पत्रकारिता पर पड़ रहे असर पर नोएडा में रहने वाले प्रिंट मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार सारंग उपाध्याय कहते हैं कि क्षेत्रीय पत्रकारिता पहले से ही उपेक्षित रही है। दिल्ली को छींक आ जाए तो देश को जुकाम और बुखार हो जाता है लेकिन ग्राम, देहात और बाकी देश, मीडिया में हैं ही नहीं। यही नहीं अब तो मुम्बई सहित देश के कई बड़े महानगर भी राष्ट्रीय मीडिया से बाहर होते जा रहे हैं। 

प्रेस की स्वतंत्रता, स्थानीय पत्रकारिता और इसकी मजबूती पर 'जनज्वार' समाचार वेब पोर्टल के सम्पादक अजय प्रकाश से बात की गई तो उन्होंने बताया कि स्थानीय पत्रकारिता हमेशा से हाशिए पर ही रही है। उसकी वजह यह है कि स्थानीय समाज से ही देश चलता है।

देश में नीतियों का अमल होना या न होना, इसकी सच्चाई गांव और उसके आसपास के इलाकों से ही पता चलती है। जब दिल्ली या राज्यों की राजधानियों से सरकारें घोषणा करती हैं कि हम इतने लाख करोड़ की योजनाएं लाए हैं, तब उनका सच हर रोज सौ या पचास रुपये में जीने वालों के जरिए उजागर होता है।

जब भ्र्ष्टाचार थोड़ा कम था तब भी कहा जाता था कि विकास के लिए आने वाले एक रुपये में अस्सी पैसा रास्ते में रह जाता है। अब तो कमीशनखोरी बहुत बढ़ गई है। कर्नाटक में चुनाव हो रहा है, वहां कहा जाता है चालीस फीसदी की सरकार। मतलब कोई भी काम कराना है तो चालीस फीसदी सरकार लेगी।

सच दिखाने वाले दबा दिए जाते हैं

अब सवाल यह है कि इनका सच बताना, जाहिर तौर पर वह पत्रकार ही बताएगा। स्थानीय पत्रकार इतना कमजोर होता है कि उसको सिस्टम में जगह तब मिलेगी जब वह सत्ता में बैठे लोगों या बड़े पदों में बैठे लोगों की जी हजूरी करेगा, उनके पक्ष में खबरें छपेगा। मेरे दो दशक के पत्रकारिता अनुभव बताते हैं कि जिन भी पत्रकारों ने स्थानीय स्तर पर सही और सच मुद्दे उठाने की कोशिश की, उन्हें दबाया ही गया है। इसीलिए ऐसा होता है कि जब स्थानीय पत्रकार बड़ा मुद्दा उठाते हैं, उन्हें कोई नहीं पूछता पर दिल्ली बैठा पत्रकार जब उसी मुद्दे को उठाता है तो वह बड़ा मुद्दा बन जाता है।

क्या हम स्थानीय स्तर पर पत्रकार बन सकते हैं, हां बन सकते हैं और ऐसी हजारों कोशिशें हुई हैं। स्थानीय और ईमानदार लोगों ने नौकरियों को छोड़कर पहले अखबार निकाले हैं और चंदे से भी निकाले हैं। अब भी समाचार वेब पोर्टल, यूट्यूब चैनल निकाले जा रहे हैं पर सत्ता संरचना इतनी बड़ी और पैसे वाली है कि ऐसे पत्रकार उसमें फिट नहीं बैठ पाते। 

इसका उपाय क्या है इस पर भी सोचना चाहिए। देश की राजनीति जैसी चलती है, वहां की जनता वैसी होता है। अगर राजनीति भ्रष्ट है, तो जनता भी भ्रष्ट होगी। इसलिए लोग स्थानीय राजनीति में भी मुद्दों पर कभी वोट नहीं देते। मुद्दों वाली पत्रकारिता इसलिए हाशिए पर है और वह तब तक हाशिए पर रहेगी जब तक राजनीति में मुद्दों को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी।

आप देखते हैं स्थानीय स्तर पर वही युट्यूबर सफल हैं, जो राजनीति से जुड़ी खबरों को नहीं छूते या सत्ता या विपक्ष किसी एक से जुड़ी खबरें दिखाते हैं। वह पत्रकार नहीं पार्टी प्रवक्ता होते हैं और दिल्ली से देहात तक यही स्थिति है।

अगर इस देश में राजनीति, धर्म-जाति के नाम पर होगी। चाहे वह पक्ष द्वारा हो या विपक्ष के द्वारा, तो पत्रकारिता भी इसी के आसपास होगी। मेरा मानना है कि यह इस देश का बदलाव का दौर है, अभी इसमें एक दशक लगेगा। इसके बाद ही पत्रकारिता मजबूत होगी।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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