World Press Freedom: विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक और मीडिया के समक्ष चुनौतियां
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'पत्रकारिता' समाज का ऐसा दर्पण है जिसमें देश, विदेश सहित समाज या आस -पास घटने वाली समस्त सत्य घटनाओं को देखा जा सकता है। यदि यह दर्पण मैली हो जाए या टूटने लगे तो समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ खतरे में है।
अपने देश में प्रेस की स्वतंत्रता को संविधान में स्पष्ट रूप से संरक्षित नहीं किया गया है, लेकिन यह संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (क) के तहत संरक्षित है, जिसमें कहा गया है - "सभी नागरिकों को वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार होगा"।
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संविधान ने तो हर व्यक्ति को वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दे दिया, फिर भी हाल के कुछ वर्ष से, 'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स द्वारा' प्रकाशित विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत की रैंकिंग कम होती जा रही है।
इस वर्ष 2022 में 180 देशों के सूची में भारत को 150वां स्थान मिला, पिछले बरस 142वां स्थान मिला था जबकि 2016 में 133 वां स्थान था, ये अब तक का सबसे ख़राब प्रदर्शन है। भारत के पड़ोसी देश नेपाल 30 रैंक उछाल मार कर 76 वें पायदान पर पहुंच गया जबकि चीन (175वां), पाकिस्तान 157वां (12 स्थानों की गिरावट), बांग्लादेश 162वां और श्रीलंका को 146वां स्थान मिला है।
'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' पेरिस की एक अंतर्राष्ट्रीय गैर-सरकारी और जानी मानी संस्था हैं। इसे संयुक्त राष्ट्र, यूनेस्को, यूरोपीय परिषद, फ्रैंकोफोनी के अंतर्राष्ट्रीय संगठन और मानव अधिकारों पर अफ्रीकी आयोग में भी सलाहकार का दर्जा प्राप्त है। रिपोर्ट में मीडिया के प्रति सरकार के नीतियों की रैंकिंग नहीं होती है बल्कि मीडिया की स्वतंत्रता, मीडिया के लिए वातावरण और स्वयं-सेंसरशिप, कानूनी ढांचे, पारदर्शिता के साथ-साथ समाचारों और सूचनाओं के लिये मौज़ूद बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता के आकलन के आधार पर तैयार किया जाता है।
रिपोर्ट के अंक कई मानकों पर दिए जाते हैं जिनमें राजनीतिक, आर्थिक, विधायी, सामाजिक एवं सुरक्षा शामिल हैं, भारत को सुरक्षा में सबसे कम स्कोर मिला उसके बाद राजनीतिक तथा आर्थिक में।
प्रेस स्वतंत्रता और भारत का स्थान
भारत के रैंकिंग गिरने के कई कारण हैं जैसे पत्रकारों के खिलाफ हिंसा, राजनीतिक रूप से पक्षपातपूर्ण मीडिया और मीडिया स्वामित्व की एकाग्रता आदि। आंकड़ों की बात करें तो वर्ष 2022 के पहले तिमाही में ही 9 पत्रकारों को जेल भेजा गया जबकि एक पत्रकार की हत्या की गई है। मीडियाकर्मी, खास कर महिला वर्ग के लिए भारत में पत्रकारिता करना अब बेहद चुनौतीपूर्ण काम हो गया है।
इस रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर भारत सरकार के अपने तर्क हैं। प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया, नीति आयोग एवं सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने इस रिपोर्ट पर अपनी शंका प्रकट की है। भारत सरकार ने पूर्व में भी संसद के अंदर एवं संसद के बाहर इस रिपोर्ट में अपनाई गई पद्धति पर भी संदेह व्यक्त किया और इसे "संदिग्ध और गैर-पारदर्शी" माना है।
सरकार के अनुसार रिपोर्ट में कई कमियां हैं जैसे कि प्रेस स्वतंत्रता की स्पष्ट परिभाषा ना होना, बहुत कम नमूना आकार, लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों को बहुत कम या कोई महत्व नहीं देना आदि। मुद्दे की बात ये है कि रैंकिंग तो ऊपर नीचे होते रहते है किंतु रिपोर्ट ने मीडिया के ऊपर सबसे बड़े दो ख़तरे की घंटी बचा दी है- एक मीडिया पर सत्ता में बैठे लोग का डर और दूसरा आमजन में मीडिया की गिरती साख़।
डर के माहौल में नहीं होती पत्रकारिता
हाल के दो उदहारण- पहला उत्तर प्रदेश में 12वीं कक्षा के अंग्रेज़ी का पर्चा लीक होने की खबर को उजागर करने के मामले में यूपी पुलिस ने अमर उजाला सरीखे राष्टीय दैनिक के दो पत्रकार सहित कई मीडियाकर्मी को परेशान किया गया। दूसरी घटना में मध्यप्रदेश के सीधी का एक मामला चर्चित हुआ जिस में सत्ताधारी दल के विधायक के खिलाफ न्यूज रिपोर्टिंग करने पर एक राष्टीय न्यूज चैनल के स्टिंगर सहित 8 पत्रकार को ना केवल अरेस्ट किया गया बल्कि बिना कपड़ों के फोटो खींच कर वायरल भी किया गया।
इस में कई स्थानीय पत्रकार के लाखों सब्सक्राइबर होने के बाद भी सरकार से जवाब मांगने वाले पत्रकारों को कोतवाली में खड़ा कर दिया जाता है, सिर्फ एक अंडर वियर में। पुलिस की इतनी हिम्मत केवल सत्ता में बैठे हुक्मरानों से नहीं आई है बल्कि जनता में मीडिया के गिरते साख से भी मिली है।
बदलता मीडिया का परिदृश्य
प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ के नीचे की जमीन दलदल बन चुकी है। इसका एक कारण यह भी है कि ज पत्रकार और पत्रकारिता के प्रतिमान बदल गए हैं या बदल दिए गए हैं। बालकृष्ण भट्ट, महावीर प्रसाद द्विवेदी,गणेश शंकर विद्यार्थी, विष्णुराव पराड़कर,धर्मवीर भारती जैसे महान सम्पादकों की श्रृंखला आज समाप्तप्राय सी हो गयी है जिसका प्रमुख कारण मीडिया और पत्रकारिता का घोर व्यवसायिक होना है।
डिजिटल क्रांति के तकनीकों ने मीडिया के क्षेत्र को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। विज्ञापन के प्रभाव से यह क्षेत्र भी अछूता नहीं रहा। चाहे वो अखबार का पहला पृष्ठ हो या न्यूज़ चैनल का समाचार बुलेटिन। पहले पृष्ठ पर ही रंग -बिरंगे विज्ञापन और चैनलों में 'स्पांसर' (प्रायोजक), समय और स्थान जब विज्ञापन ले रहे हैं तब उनमें ख़बरों की सत्यता की जगह ही कहां रहती है?
गरीब जनता के सुख -दुःख तक न कैमरा पहुंच पा रहा और न उनकी बेहाल ज़िन्दगी पर खबर ही छप रही है। आधुनिक पत्रकारिता का यह स्वरूप अत्यंत घातक है। प्रेस का काम सूचना देने के साथ साथ समाज को शिक्षित करना भी है।
निष्पक्षता अपेक्षित
जनमत निर्धारित करने में प्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका होती है और इसी कारण सम्पादकों, रिपोर्टरों से निष्पक्षता अपेक्षित होती है। पत्रकारिता की स्थिति किसी देश की सरकार की प्रगति ,स्वतंत्रता का पैमाना तय करती है। समाज, राजनीति ,साहित्य, खेलकूद किसी भी क्षेत्र में घटित होने वाली घटनाओं का विशलेषण करती हुई मीडिया भविष्यद्रष्टा का महती कार्य करती है।
पत्रकारिता के समक्ष चुनौतियां हमेशा से आती रही हैं और हर चुनौती का सामना करते हुए आज वह इस स्वरूप तक पहुंचा है। आज सबसे बड़ी चुनौती है उसकी गिरती साख। पत्रकारिता की गिरती साख लोकतंत्र के लिए भी शुभ संकेत नहीं है। जनसरोकारों से दूर जाने के कारण इसकी प्रभावशीलता भी संदेह के घेरे में है।
आवश्यकता इस बात की है कि पत्रकारिता को पुनः उसके उचित स्थान पर प्रतिस्थापित, प्रतिष्ठित करना होगा। समय रहते मीडिया समूह तथा संपादक वर्ग को आत्मचिंतन कर पत्रकारिता के बदलते प्रतिमान को पुनः स्थापित करने की आवश्यकता है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।