World food day 2019: अन्न बर्बादी और भूख से जूझ रहा है भारत, कब समझेंगे लोग भोजन की कीमत
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प्रतिवर्ष 16 अक्टूबर को दुनिया भर में खाद्य सुरक्षा एवं खाद्य की पहुंच सुनिश्चित करने तथा भुखमरी को समाप्त करने के उद्देश्य से विश्व खाद्य दिवस मनाया जाता है। भोजन का अधिकार मानव का बुनियादी अधिकार है। लेकिन आज भी विश्व में करोड़ों लोग भुखमरी के शिकार हैं। भारत भी भुखमरी की समस्या से जूझ रहा है।
ये सही है कि भुखमरी एक वैश्विक समस्या है, लेकिन हमें यह भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि बहुत से देशों ने सुदृढ़ व सुव्यवस्थित नीतियां बनाकर इससे मुक्त पाई है। लेकिन इसके विपरीत भारत में भुखमरी की समस्या को खत्म करने को लेकर कोई सकारात्मक प्रयास नहीं हुए हैं।
भारत जूझ रहा है भुखमरी और कुपोषण से
यही कारण है कि 119 देशों के वैश्विक भुखमरी सूचकांक 2018 में भारत 103वें पायदान पर है। इस सूचकांक में 2017 में भारत 100वें, 2016 में 97वें व 2015 में 80वें नंबर पर था। जबकि 2014 में भारत 55वें पायदान पर था। भारत की चिंता इसलिए और भी बढ़ जाती है कि वह इस सूचकांक में अपने पड़ोसी देश चीन 25वें, बांग्लादेश 86वें, नेपाल 72वें व श्रीलंका 67वें से भी कई पीछे है।
विश्व की आबादी तीव्र गति से बढ़ रही है। ऐसे में सभी के लिए खाद्य की पहुंच एवं सुरक्षा सुनिश्चित करना एक बड़ा प्रश्न है। दुनिया में एक तरफ तो ऐसे लोग हैं, जिनके घर में खाना खूब बर्बाद होता है और फेंक दिया जाता है। वहीं दूसरी ओर ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है, जिन्हें एक समय का भोजन भी नहीं मिल पाता।
भोजन के अपव्यय के मामले में भारत भी अछूता नहीं है। यूएन के विश्वभर में भूख से मरने वाले लोगों से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि देश में हर साल 21 मिलियन टन गेहूं बर्बाद हो जाता है। देश में जितनी आबादी है, उससे दोगुना खाना बनता है। इनमें से काफी खाना बर्बाद हो जाता है।
खाने की बर्बादी और भारत में बढ़ता कुपोषण
अनुमान है कि साल में 50 हजार करोड़ रुपए का खाना गटर में फेंक दिया जाता है। देश में तकरीबन 87 करोड़ लोग भूखे सोने के लिए विवश हैं। खाद्य अपव्यय से होने वाली क्षति बहुदैशिक है और इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को लगभग 750 अरब डॉलर से अधिक का नुकसान होता है, जो कि स्विट्जरलैण्ड के सकल घरेलू उत्पाद के बराबर है।
शोध में पाया गया कि सिर्फ बंगलूर शहर में हुई शादियों में करीब 950 टन खाद्य पदार्थ बर्बाद हुआ। समस्या सिर्फ खाना फेंकने की ही नहीं है, शादियों के भोजन में कैलोरी भी जरूरत से ज्यादा होती है। भारत में जहां कुपोषण की बड़ी समस्या है तो फिर जरूरत से ज्यादा कैलोरी वाला खाना खिलाना भी एक तरह की बर्बादी है। विश्व खाद्य उत्पादन पर एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में मजबूत आर्थिक प्रगति के बावजूद भुखमरी की समस्या से निपटने की रफ्तार बहुत धीमी है।
क्या कहती है यूएन की रिपोर्ट
संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में खाद्यान्न का इतना भंडार है, जो प्रत्येक स्त्री, पुरुष और बच्चे का पेट भरने के लिए पर्याप्त है, लेकिन इसके बावजूद करोड़ों लोग ऐसे हैं, जो दीर्घकालिक भुखमरी और कुपोषण या अल्पपोषण की समस्या से जूझ रहे हैं।
दरअसल, क्या सिर्फ कृषि उत्पाद बढ़ाकर और खाद्यान्न को बढ़ाकर हम भूख से अपनी लड़ाई को सही दिशा दे सकते हैं? चाहे विश्व के किसी कोने में इस सवाल का जवाब हां हो, लेकिन भारत में इस सवाल का जवाब ना है और इस ना की वजह है, खाद्यान्नों को रखने के लिए जगह की कमी।
यूं तो भारत विश्व में खाद्यान्न उत्पादन में चीन के बाद दूसरे स्थान पर पिछले दशकों से बना हुआ है, लेकिन यह भी सच है कि यहां प्रतिवर्ष करोड़ों टन अनाज बर्बाद होता है।
खाद्य समस्या को लेकर क्या कहते हैं आंकड़े?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 58,000 करोड़ रुपये का खाद्यान्न भंडारण तकनीकी के अभाव में नष्ट हो जाता है। भूखी जनसंख्या इन खाद्यान्नों पर ताक लगाए बैठी रह जाती है। अन्न भंडारण के समुचित प्रबंधन के अभाव में बारिश के समय बड़ी मात्रा में अनाज बहकर चला जाता है और पानी के संपर्क में आने के कारण अपनी गुणवत्ता खो देता है। यह सब ऐसे समय हो रहा है, जब करोड़ों लोग भूखे पेट सो रहे हैं और छह साल से छोटे बच्चों में से 47 फीसदी कुपोषण के शिकार हैं। जिसका असर उनके मानसिक और शारीरिक विकास, पढ़ाई-लिखाई और बौद्धिक क्षमता पर पड़ रहा है।
इस अपव्यय का दुष्प्रभाव हमारे देश के प्राकृतिक संसाधानों पर भी पड़ रहा है। हमारा देश पानी की कमी से जूझ रहा है, लेकिन अपव्यय किए जाने वाले इस भोजन को पैदा करने में 230 क्यूसेक पानी व्यर्थ चला जाता है। अगर इस पानी को अपव्यय होने से बचा लिया जाए तो दस करोड़ लोगों की प्यास बुझाई जा सकती है।
भारत भी जूझ रहा है भुखमरी की समस्या से
एक आकलन के मुताबिक, अपव्यय से बर्बाद होने वाली धनराशि से पांच करोड़ बच्चों की जिंदगी संवारी जा सकती है, उनका कुपोषण दूर कर उन्हें अच्छी तालीम दी जा सकती है। 40 लाख लोगों को गरीबी के चंगुल से मुक्त किया जा सकता है और 5 करोड़ लोगों के लिए आहार सुरक्षा की गारंटी तय की जा सकती है।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कुपोषण की जड़ भुखमरी है। पर्याप्त कैलोरी युक्त पोषण व संतुलित आहार नहीं मिलने के कारण शरीर में विकृतियां आने लगती हैं। समय आने पर यही विकृतियां शरीर को कुपोषित कर देती है। अगर इन हालात में सरकार को 2030 तक भारत को भूखमुक्त करने का सपना साकार करना है तो दीर्घकालीन योजनाओं को और भी सख्ती से लागू करना होगा व क्रियान्वयन के लिए एक पारदर्शी मशीनरी बनाने पर ध्यान देना होगा।
गरीबों की सब्सिडी यथावत रखते हुए किसानों के लिए सस्ते और टिकाऊ संसाधन विकसित करने होंगे। साथ ही सरकार को भोजन की बर्बादी को अपराध घोषित कर जुर्माना लगाना शुरू करना होगा एवं अनाज वितरण प्रणाली व प्रबंधन को लेकर सावधानी बरतनी होगी। समय की मांग है कि भुखमरी मिटाने के लिए अत्याधुनिक तरीके से खेती के प्रयास किये जाएं।
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