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विश्व पर्यावरण दिवस: जलवायु परिवर्तन के युग में स्वतः उपजे खाद्य स्रोतों की महत्ता

Mon, 10 Jun 2024 03:09 PM IST
Dr. N Manika डॉ. एन मनिका
Updated Mon, 10 Jun 2024 03:09 PM IST
सार

जलवायु परिवर्तन के युग में, खाद्य स्रोतों की विश्वसनीयता और स्थिरता भी प्रभावित हो गई है, इसलिए हमारे आहार में विविधता लाना महत्वपूर्ण है। यह विविधीकरण न केवल खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाओं को स्थिर करने में मदद करता है, बल्कि जैव विविधता का भी समर्थन करता है, जो पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने और पारिस्थितिकी तंत्र अनुकूलनशीलता बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण है।

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World Environment Day 2024: Importance of self-grown food sources in the era of climate change
World Environment Day 2024: इन फलों और जंगली पौधों को आमतौर पर स्वास्थ्य के लिए अच्छा माना जाता है क्योंकि इनमें मुख्य फसलों से ज्यादा पोषक तत्व होते हैं। - फोटो : डॉ. एन मनिका

विस्तार

वैसे तो शहरीकरण को लंबे समय से मानव विकास और प्रगति के साथ जोड़ा गया है, लेकिन तेजी से बढ़ता शहरीकरण अपने साथ कई चुनौतियाँ लेकर आता है। हाल के अध्ययनों से पता चला है कि शहरी परिवेश असमानताओं और स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकते हैं। शहरी क्षेत्रों में पोषण सुरक्षा एक बड़ी चुनौती है। इन क्षेत्रों में, निवासियों के लिए उपलब्ध खाद्य विविधता धीरे-धीरे सीमित होती जा रही है, जो मुख्य रूप से खाद्य उत्पादन और वितरण की वैश्विक प्रणाली के कारण है। शहरों में उपभोग की जाने वाली अधिकांश उपज दूरदराज के स्थानों से प्राप्त की जाती है, जिसके लिए लंबे परिवहन समय और व्यापक संरक्षण प्रयास आवश्यक होते हैं।

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ताजगी बनाए रखने के लिए भंडारण और रसायनों का उपयोग होता है, जो खाद्य पदार्थों के पोषण मूल्य को महत्वपूर्ण रूप से कम कर सकता है। उदाहरण के लिए, फल और सब्जियां, कटाई के तुरंत बाद अपने विटामिन और खनिजों को खोना शुरू कर देते हैं मगर ये मंडियों में काफी देर से पहुंचते हैं । परिवहन और भंडारण में बिताए गए समय के कारण शहरी बाजारों में पहुंचने तक ये खाद्य पदार्थ कम लाभकारी हो जाते हैं। यह न केवल लोगों के पोषण को प्रभावित करता है बल्कि उनके स्थानीय रूप से अनुकूलित खाद्य किस्मों और उनके आहार की समग्र गुणवत्ता को भी कम करता है।
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इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन के युग में, खाद्य स्रोतों की विश्वसनीयता और स्थिरता भी प्रभावित हो गई है, इसलिए हमारे आहार में विविधता लाना महत्वपूर्ण है। यह विविधीकरण न केवल खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाओं को स्थिर करने में मदद करता है, बल्कि जैव विविधता का भी समर्थन करता है, जो पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने और पारिस्थितिकी तंत्र अनुकूलनशीलता बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण है। खाद्य स्रोतों में विविधता लाने की दिशा में फोरेजिंग यानी स्वतः उपजे खाद्य स्रोतों जैसे की अपने आस पास उगने वाले जंगली या अर्ध-जंगली पौधों को भोजन के रूप में इस्तेमाल करना एक महत्वपूर्ण कदम है।
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भारत में फोरेजिंग कोई नई बात नहीं है। गांव में तो यह आम चलन है मगर शहरों में भी फोरेजिंग अब चलन मैं है। शहरी फोरेजिंग में बढ़ती दिलचस्पी ऐसे समय में आई है जब मौसम के अनुकूल खाने की जरूरत बढ़ गई है। कम साधनों से उगने वाले, बिना खेती किए खाद्य पदार्थ, सूखा, गर्मी और बाढ़ जैसी मुश्किल परिस्थितियों के लिए एक अच्छा समाधान हैं।

कुछ लोग फोरेजिंग का इस्तेमाल अपनी जीविका चलाने के लिए करते हैं। लेकिन ज्यादातर लोगों के लिए, यह सांस्कृतिक, मनोरंजक और पोषण का एक तरीका है। फोरेजिंग आर्थिक रूप से कमजोर समुदायों को अतिरिक्त आय देती है और उनके जीवन को बेहतर बनाती है।

इन फलों और जंगली पौधों को आमतौर पर स्वास्थ्य के लिए अच्छा माना जाता है क्योंकि इनमें मुख्य फसलों से ज्यादा पोषक तत्व होते हैं और ये कठोर मौसम का भी सामना कर सकते हैं। शहरी परिवारों में, खाद्य सुरक्षा में सुधार, गरीबी कम करने और प्रतिकूल परिस्थितियों से बचाने में यह विधि एक नेचर बेस्ड सलूशन (NbS) की तरह कार्य करती है।

जब हम फोरेज किए गए पौधों की बात कर रहे हैं, तो हम उन फलों को कैसे भूल सकते हैं जो हमें इस गर्मी के मौसम में राहत देते हैं। उत्तर भारत में गर्मियों के महीनों के दौरान, 'बेल' और 'फालसा' जैसे जंगली फल गर्मी से राहत देने के साथ-साथ आवश्यक हाइड्रेशन और पोषक तत्व प्रदान करते हैं। बेल का फल, न केवल पाचन में मदद करता है बल्कि शरीर को ठंडा भी करता है।

फालसा, एंटीऑक्सीडेंट्स, विटामिन, और खनिजों का भंडार है जो गर्मी से लड़ने में मदद करते हैं। ये बेरियाँ कच्ची खाई जा सकती हैं या जूस बनाया जा सकता है। ये दोनों फल स्वादिष्ट स्वादिस्ट होने के साथ साथ पारंपरिक स्वास्थ्य लाभ भी देते हैं, जिससे वे गर्मियों की तीव्र गर्मी से निपटने के लिए स्थानीय आहारों में लोकप्रिय विकल्प बन जाते हैं।

ऐसे हे जब हम दक्षिण भारत की तरफ चलते हैं तो पन्नेराले और शर्बत बल्ली की बात न की जाये, ऐसा नहीं हो सकता। पन्नेरले से निकाला गया रस एंटीऑक्सीडेंट और विटामिनों से भरपूर होता है जो शरीर को ठंडा करने और प्रतिरक्षा बढ़ाने में मदद करता है।

इसी तरह, जामुन, बेर, कटहल, और आंवला ऐसे फल हैं जो भारत भर में आसानी से मिल जाते हैं और देश के आहार संरचना का एक अभिन्न हिस्सा हैं। इन फलों को उनके अलग स्वाद और सेहत के फायदों के लिए पसंद किया जाता है, और ये आसानी से फोरेज किए जाते हैं, जिससे इन्हें बिना खरीदे ही सुलभ बनाया जा सकता है।

जहां जामुन, खून में शुगर के स्तर को नियंत्रित करने के लिए जाना जाता है, जिससे यह मधुमेह रोगियों के लिए विशेष रूप से लाभदायक है वहीँ बेर, विटामिन सी से भरपूर, ताजा और सूखे दोनों रूपों में इसकी बहुमुखी प्रतिभा के लिए प्रिय है। कटहल, का उपयोग करी से लेकर मिठाइयों तक कई प्रकार के व्यंजनों में किया जा सकता है। आंवला अपने एंटीऑक्सीडेंट और प्रतिरक्षा बढ़ाने की क्षमता के लिए जाना जाता है और यह त्वचा की सेहत को भी सुधारता है।

भारत में, फोरेजिंग अभी भी ग्रामीण आहारों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है, जिसमें तरह-तरह की देसी प्रजातियां शामिल हैं जो पोषण और दवाई के गुणों से भरपूर हैं, मगर शहरों में भी कई ऐसी पौध

प्रजातियां आसानी से मिल जाती हैं जो मनुष्य के स्वाद और स्वस्थ दोनों का धयान रखती हैं। जैसे की 'बेर' और शहतूत जिन्हें व्यापक रूप से ताजा खाया जाता है और पारंपरिक उपचारों में भी इस्तेमाल किया जाता है। 'शरीफा' जो विटामिन और खनिजों का स्रोत है। ‘अरवी के पत्ते’, जिसका उपयोग पूरे भारत में विभिन्न पारंपरिक व्यंजनों में उपयोग जाता है, इसकी उच्च विटामिन और मिनरल की मात्रा के लिए भी साख है। 'करी पत्ते' भारतीय खानों में उनकी विशिष्ट सुगंध केलेकर आते हैं।

'सहजन', जिसकी पत्तियां और फली पोषक तत्वों से भरी होती हैं, और इनका उपयोग जोड़ो के दर्द, सूजन और जीवाणुरोधी क्षमताओं के लिए भी किया जाता है। 'मोरिंडा' या नोनी फल को इसके स्वास्थ्य-बढ़ाने वाले लाभों के लिए फोरेज किया जाता है। 'जंगली चौलाई' और 'कलमी साग' भी आमतौर पर इकट्ठा किए जाते हैं, जो स्थानीय खाने में हरे पत्तेदार साग के रूप में मूल्यवान हैं। ये फल मिलकर न केवल भारत की खान-पान की परिदृश्य को समृद्ध करती हैं, खाद्य सुरक्षा प्रदान करती हैं, बल्कि अपनी प्राकृतिक गुणवत्ताओं के कारण औषधीय उपयोग में भी आती हैं, इम्युनिटी बढ़ाने और अच्छी सेहत पाने में मदद भी करती हैं।

हालांकि, एक फोरेजर के रूप में, पारिस्थितिकी तंत्र में योगदान देना और जिम्मेदार बने रहना महत्वपूर्ण है। इन तरीको से फोरेजिंग की प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित और सतत बना सकता है


1. जितना प्रकृति से लें उस से अधिक देने की सोचे। बीज एकत्रित कर के बोयें ताकि सतत आपूर्ति सुनिश्चित हो सके।

2. सतत हार्वेस्टिंग विधियों के बारे में अधिक जानें।

3. खाने योग्य प्रजातियों की सही पहचान करें।

4. उतना ही लें जितना खाना हो । ज़रूरत से ज़्यादा एकत्रित कर के संसाधनों को बर्बाद न करें ।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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