विश्व पर्यावरण दिवस विशेष: वन अनुसन्धान संस्थान, वृक्षों का अनूठा संसार
पर्यावरण और वन्य जीवों से लगाव रखने वाले लोगों में, अक्सर हम पक्षी प्रेमी देख सकते हैं। इसका सीधा कारण यही है कि, सभी वन्य जीवों में, पक्षियों का अवलोकन करना सबसे सरल है।
पर्यावरण और वन्य जीवों से लगाव रखने वाले लोगों में, अक्सर हम पक्षी प्रेमी देख सकते हैं। इसका सीधा कारण यही है कि, सभी वन्य जीवों में, पक्षियों का अवलोकन करना सबसे सरल है।
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पर्यावरण और वन्य जीवों से लगाव रखने वाले लोगों में अक्सर हम पक्षी प्रेमी देख सकते हैं। इसका सीधा कारण यही है कि सभी वन्य जीवों में पक्षियों का अवलोकन करना सबसे सरल है।
हां यह तो है कि घने पेड़ों के झुरमुट में, हम ज्यादातर सिर्फ उनकी पुकार ही सुन पाते हैं, और वे मानों हमसे आंख मिचोली खेल रहे हों। सभी जीव मनुष्यों से डरते भी हैं, इस कारण मनुष्यों को आसपास देख वें छिप जाते हैं, या भाग जाते हैं। इन हालात में संरक्षित स्थानों कि महत्ता काफी बढ़ जाती है।
संरक्षित स्थानों में निवास करने वाले जीव कुछ हद तक मनुष्यों के आदि होते हैं, या यूं कह लीजिए कि वे आश्वस्त रहते हैं कि वहां पर मनुष्य उन्हें हानि नहीं पहुंचाएंगे। इस तरह के संरक्षित स्थान या तो राष्ट्रीय उद्यानों में या वन्यजीव अभ्यारण्यों होते हैं। लेकिन भारत के शैक्षणिक संस्थानों के परिसर, जहां अच्छी मात्रा में पेड़ पौधे हों, भी शहरों के बीचो बीच रहकर संरक्षित स्थानों का ही कार्य करते हैं। ऐसा ही एक परिसर देहरादून के ठीक मध्य में स्थित है, वन अनुसन्धान संस्थान।
सन् 1906 में अंग्रेजों द्वारा स्थापित यह संस्थान, वनों पर उच्चतम शोध हेतु भारत का सर्वप्रथम एवं एशिया का सबसे महत्वपूर्ण संस्थान है। संस्थान की स्थापना के पूर्व, यहां कि जमीन खेती के ही अंतर्गत थी। संस्थान के परिसर के पिछले हिस्से में टोंस नदी भी बहती है, और वहां कुछ 3-4 गांव भी बसे हैं, जिनमें आज भी खेती होती है।
चूंकि यह संस्थान वन के शोध के लिए स्थापित किया गया था, यहां पर वृक्षों कि एक अच्छी विविधता देखी जा सकती है। आज के दिन यदि कोई आगंतुक परिसर में आए तो उसे यह प्रतीत भी नहीं होगा, किन्तु परिसर के अंदर जो भी जंगल देखने का मिलते हैं, सभी अंग्रेजों द्वारा रोपित हैं।
वैज्ञानिक और लकड़ी के अधिक उत्पादन, दोनों के मद्देनजर अंग्रेज़ों ने यहां एक तरफ चीड़ पाइन, सागौन (टीक) और साल के मोनोकल्चर जंगल लगाए तो वहीं दूसरी और देश-दुनिया के अनन्य पेड़ो वृक्षों कि प्रजातियों को एकत्रित कर, एक बहुत सुन्दर बोटैनिकल गार्डन भी बनाया।
इधर, साथ ही पूरे परिसर में, जगह-जगह पर फल देने वाले पेड़ जैसे कि, आम, लीची, जामुन, गूलर इत्यादि लगाए गए हैं। एक प्रकार से तकरीबन 1100 एकड़ का यह परिसर, अनन्य पक्षियों के निवास के लिए एक बहुत ही उपयुक्त स्थल बन जाता है।
वन अनुसंधान संस्थान के परिसर में पक्षियों की विविधता का आकलन सर्वप्रथम श्रीमती राइट ने 1946 से 1951 के बीच किया था। उन्होंने परिसर में 146 विविध पक्षियों का ब्यौरा दिया था। तत्पश्चात् श्री जॉर्ज ने 1946 से 1957 के बीच परिसर में 221 पक्षियों का ब्यौरा दिया।
भारतीय वन्यजीव संस्थान के निदेशक रह चुके डॉ. धनञ्जय मोहन ने अपने विद्यार्थी काल में इस परिसर में 261 का अवलोकन किया था। संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ.ए.पी सिंह जो कि संस्थान के परिसर में 1982 से पक्षियों का अवलोकन कर रहे हैं ने हाल ही में अपने एक शोध-पत्र में 328 पक्षी प्रजातियों की सूची प्रकाशित कि है जिनमें कुछ पक्षियां परिसर में साल भर ही पाई जाती हैं और कुछ प्रवासी हैं।
संस्थान में पक्षियों की विविधता का देखते हुए पक्षियों के शोध में कार्यरत् बर्डलाइफ इंटरनेशनल नामक एक अंतरराष्ट्रीय संस्थान ने परिसर का "इम्पोर्टेन्ट बर्ड एरिया " का दर्जा दिया है। किसी भी स्थान का यह दर्जा मिलना, उसके यहां पाए जाने वाले पक्षी समूह कि विविधता और अनूठेपन का परिचायक होता है।
इसी सन्दर्भ में पर्यावरण से एकात्म होना हो और रंग-बिरंगी अद्भुत पक्षियों से रूबरू होना हो तो देहरादून स्थित यह संस्थान किसी भी आगंतुक को एक बहुत ही सुन्दर अवसर देता है। जब आप इस संस्थान के मुख्य द्वार से प्रवेश करेंगे तो मुमकिन है कि आपको ट्रेवल मार्ग पर सर्वप्रथम भारतीय धूसर धनेश (ग्रे हार्नबिल) के दर्शन होंगे।
ऐसे पक्षी एक पेड़ से दूसरे की ओर उड़न भरते देखेंगे तो यह मालूम होगा की किसी ने कमान से तीर छोड़ी हो। हॉर्नबिल की ही एक और प्रजाति, ओरिएण्टल पाइड हार्नबिल भी इस परिसर में दिखती है, हालांकि कम अवसरों में ही दिखती है। बचपन में हम सबने रॉबिन (कालकण्ठ कलविङ्क) नामक पक्षी के बारे में सुना अवश्य है, किन्तु उसे बिल्कुल नजदीक से देखने का अवसर यहां मिल जाएगा। काले और सादे रंगो के इस पक्षी की पुकार एक मधुर सीटी जैसी प्रतीत होती है।
यूं तो हम तोते को हरे रंग का ही जानते हैं, किन्तु इस परिसर में लाल और ग्रे रंगो के माथे वाला तोता भी देखने का मिल जाता है। यह गौरतलब है कि भारत में तोता को असल में पैराकीट कहते हैं। हरे रंग के पक्षियों की बात हो और बसंत पक्षी की बात न हो, यह तो संभव नहीं। परिसर में 5 प्रकार के बसंतापक्षी पाए जाते हैं, जो अपनी अद्भुत बोली से पूरे परिसर का गुंजायमान रखते हैं।
फिलहाल गर्मियों का कहर सारे देश में है, किन्तु इस समय में भी संस्थान के परिसर में पक्षियों का एक बेहतरीन मेला देखा जा सकता है। गर्मियों में कुछ पक्षी मध्य भारत और दक्षिण भारत से हिमालय की ओर प्रवास करते हैं। ऐसे में, वें इस परिसर में पड़ाव डालते हुए भी जाते हैं, और कुछ यहीं तक की यात्रा करते हैं। इन्हे ग्रीष्मप्रवासी कहते हैं। और ऐसे पक्षी जो केवल कुछ ही समय के लिए परिसर में उपलब्ध होंगे, का देख पाने का एक अलग ही आनंद होता है।
इनमें से एक अत्यंत खूसूरत पक्षी है दूधराज या सुल्ताना बुलबुल, जिसे अंग्रेजी में एशियाई दिव्यलोकी कीटमार (एशियाई पैराडाइज़ फ्लाईकैचर) कहते हैं। इस पक्षी का नर सफ़ेद रंग का होता है और मादा चमकदार भूरे रंग की। नारंगी कस्तूरा (ऑरेंज हेडेड थ्रश) इस समय में चीड़ के जनगलों में देखा जा सकता है जो की बीजों के वितरण में योगदान भी देता है।
एक छोटे आकर का चमकदार नीले रंग का नीलकण्ठी कीटमार (ब्लू थ्रोटेड फ्लाईकैचर) भी इस समय परिसर में पाया जाता है। गर्मियों में प्रजनन करते कीटों का भक्षण करता है यह पक्षी।
पक्षियों का कार्य केवल अपनी बोली और सौंदर्य से हमारे मन को लुभाना नहीं है। बिना किसी धन की अपेक्षा के ये पक्षी हम मनुष्यों पर बहुतेरे उपकार करतीं हैं। एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष घूम घूमकर खाती पक्षियां अनजाने ही बीजों के वितरण करने को काम करती हैं, कुछ कीटों को सेवन कर कीटों की आबादी का नियंत्रण में रखती हैं, और कुछ बाज शिकरा जैसे पक्षी मूषक के भक्षण कर, उसकी आबादी भी नियंत्रित करतीं हैं।
वातावरण के संतुलन बरकरार रहे, और हमें प्राकृतिक सुखों के लाभ मिलता रहे, इसके लिए यह अनिवार्य है कि शहरों में वन अनुसंधान संस्थान के परिसर जैसे बाग बगीचे वाटिका एवं शहरी जंगलों के संरक्षण किया जाए।
यह श्रंखला 'नेचर कन्जर्वेशन फाउंडेशन (NCF)' द्वारा चालित 'नेचर कम्युनिकेशंस' कार्यक्रम की एक पहल है। इस का उद्देश्य भारतीय भाषाओं में प्रकृति से सम्बंधित लेखन को प्रोत्साहित करना है। यदि आप प्रकृति या पक्षियों के बारे में लिखने में रुचि रखते हैं तो ncf-india से संपर्क करें।
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