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विश्व सामाजिक न्याय दिवस विशेष: सामाजिक परिवर्तन के सूत्रधार बनते बच्चे, दिखा रहे हैं दुनिया को राह

Rohit shrivastav रोहित श्रीवास्तव
Updated Sat, 19 Feb 2022 12:34 PM IST
सार

वैश्विक स्तर पर 20 फरवरी को विश्व सामाजिक न्याय दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसकी शुरुआत 2009 में हुई थी। तब से हर साल समाज को दीमक की तरह खोखला बनाने वाली सामाजिक कुरीतियों, भेदभाव और असमानता समाप्त करने के सामूहिक प्रयास के प्रतीक के रूप में इसे मनाया जाने लगा।

यक्ष प्रश्न यह है कि क्या वैश्विक समुदाय अपने कृत्यों से ऐसे समाज का निर्माण करने की ओर वाकई अग्रसर है जिससे सामाजिक न्याय की परिकल्पना चरितार्थ होती है? सच तो यह है कि अभी भी हम इस लक्षित उद्देश्य से कोसों दूर हैं।

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World Day of Social Justice 2022 Special How Children are becoming the harbingers of social change
विश्व सामाजिक न्याय दिवस 2022 - फोटो : Rohit Srivastava

विस्तार

वैश्विक स्तर पर 20 फरवरी को 'विश्व सामाजिक न्याय दिवस' के रूप में मनाया जाता है। इसकी शुरुआत 2009 में हुई थी। तब से हर साल समाज को दीमक की तरह खोखला बनाने वाली सामाजिक कुरीतियों, भेदभाव और असमानता को समाप्त करने के सामूहिक प्रयास के प्रतीक के रूप में इसे मनाया जाने लगा। यक्ष प्रश्न यह है कि क्या वैश्विक समुदाय अपने कृत्यों से ऐसे समाज का निर्माण करने की ओर वाकई अग्रसर है जिससे सामाजिक न्याय की परिकल्पना चरितार्थ होती है?

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सच तो यह है कि अभी भी हम इस लक्षित उद्देश्य से कोसों दूर हैं। सामाजिक न्याय की परिकल्पना यथार्थ में तब तब्दील होगी जब समाज के हर वर्ग का व्यक्ति भय, शोषण, अन्याय और भेदभाव मुक्त होगा। उसके पास बेहतर आजीविका और सामाजिक सुरक्षा होगी। ऐसा तभी संभव है जब हम अपने  ऐसे सामूहिक और अकेले प्रयासों में तेजी लाएंगे जो समाज को प्रेरित करते हैं।
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ऐसे ही प्रयास हमारे देश के बच्चे कर रहे हैं जो न केवल एक उदाहरण स्थापित कर रहे हैं बल्कि समाज को राह भी दिखा रहे हैं। इन बच्चों की जिंदगी संघर्षमय रही। लेकिन इन सभी ने परिस्थितियों के आगे घुटने नहीं टेके, बल्कि और सशक्त होकर सकरात्मकता के प्रकाश को फैलाने में जुट गए। आज हम आगे ऐसे ही कुछ बच्चों की प्रेरणादायक कहानियों की बात करेंगे।

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सामाजिक परिवर्तन की मिसाल हैं खुशबू

खुशबू शर्मा राजस्थान के अलवर जिले के बाल मित्र ग्राम (बीएमजी), गोपालपुरा की बाल नेता हैं। बाल मित्र ग्राम (बीएमजी) कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन्स फाउंडेशन का एक फ्लैगशिप कार्यक्रम है जिसके तहत हर बीएमजी गांव में कोई भी बच्चा बाल मजदूर नहीं होता है और हर बच्चा स्कूल जाता है।


17 वर्षीय खुशबू के पिता एक किसान हैं और 4 भाई-बहनों के परिवार में वह अकेले कमाने वाले हैं। तमाम कठिनाइयों के बावजूद, खुशबू हमेशा आगे बढ़ने और समाज के लिए कुछ करने के लिए तैयार रहती हैं। इसकी तसदीक इस बात से होती है कि जब उसके गांव में पानी और सड़क जैसे गंभीर मुद्दों को कोई उठाने वाला नहीं था तब खुशबू ने इसके लिए आवाज उठाई थी। यह उनके प्रयासों का ही नतीजा था कि ग्राम प्रधान को इन मुद्दों का हल निकालने के लिए तात्कालिक कदम उठाने पड़े। अब उसके गांव में बेहतर स्थिति है।

एक बाल अधिकार कार्यकर्ता के रूप में, वह सुनिश्चित करती हैं कि उसके गांव और आसपास के गांवों के बच्चे स्कूल जाएं। इसके लिए वह लोगों को जागरूक करते हुए शिक्षा के महत्व को भी बताती हैं। बात चाहे स्वास्थ्य की हो या फिर पर्यावरण की, इस दिशा में खुशबू के अभियानों से समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं। सामाजिक विकास के प्रति अपने समर्पण और एक बाल कार्यकर्ता के रूप में अपनी सक्रियता से वह बच्चों के लिए एक आदर्श के रूप में स्थापित हुई हैं।

World Day of Social Justice 2022 Special How Children are becoming the harbingers of social change
विश्व सामाजिक न्याय दिवस 2022 - फोटो : Rohit Srivastava

कोरोना काल में जरूरतमंदों के लिए वरदान बनीं अर्चना

एक तरफ जब कोरोना काल में लोग अपने जीवन के लिए संघर्ष कर रहे थे, चारों तरफ अफरातफरी और संशय का माहौल था। ऐसे दौर में अर्चना का अपने लोगों के प्रति लगाव और समर्पण उन्हें समाज के लिए एक आदर्श बना गया। जब अर्चना ने अपने गांव के लोगों को महामारी से जूझते और मास्क खरीदने पर पैसे खर्च करने में असमर्थ देखा, तो उसने कुछ करने की ठानी। अपनी नियमित ऑनलाइन स्कूल कक्षाएं समाप्त करने के बाद मास्क सिलना शुरू कर दिया।

उन्होंने घर पर सिलाई सीखी थी। अपनी सिलाई पर ही कपड़े का प्रबंध करके सिलाई शुरू कर दी। 100 से अधिक मास्क खुद ही सिल दिए और घर-घर बांटना शुरू कर दिया। लेकिन जो बात इस कहानी को और खास बनाती है, वह यह है कि जल्द ही, उसके जैसे कई अन्य बच्चे उसके जुनून को देखकर प्रेरित हुए।

अर्चना की प्रेरणा से, यह उन बच्चों में करुणा भाव का जागृत होना ही था कि बाल पंचायत के सदस्यों के एक समूह द्वारा पिपलाई में 3000 से अधिक मास्क सिले गए और जरूरतमंदों को दिये गए। यह अर्चना की करुणा भावना ही थी कि उसने महसूस किया कि वह उन लोगों के लिए कुछ कर सकती है जो पीड़ित थे और कठिन समय में जिन्हें उसकी जरूरत थी। उसने लोगों को नियमित भोजन पाने के लिए संघर्ष करते देखा और वह जानती थी कि उनके लिए मास्क खरीदना संभव नहीं होगा।

कभी बाल श्रमिक थे राजेश, अब शिक्षा से रोशन है भविष्य

कभी चिलचिलाती गर्मी में 8 वर्ष की उम्र में भट्ठा मजदूरी करने को मजबूर रहे राजेश कुमार जाटव, आज दिल्ली विश्वविद्यालय से फ़िज़िकल साइन्स और इलेक्ट्रॉनिक्स में स्नातक कर रहे हैं। हाईस्कूल में अच्छे प्रदर्शन के लिए वह राजस्थान के मुख्यमंत्री से सम्मानित भी हो चुके हैं। राजेश को 'बचपन बचाओ आंदोलन' द्वारा मुक्त कराया गया। जिसके बाद उन्हें दीर्घकालीन पुनर्वास केंद्र बाल आश्रम भेज दिया गया।

वहीं से राजेश ने अपनी पढ़ाई पूरी की। राजेश के परिवार में सात सदस्य हैं। राजेश के साथ उसके परिवार के सभी लोग आजीविका के लिए एक ईंट भट्ठा पर काम करने के लिए विवश थे। भाई-बहनों में सबसे बड़े, राजेश को अक्सर मालिकों द्वारा शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता था और ज्यादा देर तक काम करने के लिए मजबूर किया जाता था। इस दौरान राजेश का शारीरिक और मानसिक शोषण किया गया।

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विश्व सामाजिक न्याय दिवस 2022 - फोटो : Rohit Srivastava

बाल विवाह को मिटाने का संकल्प लिए आगे बढ़ती कविता

कविता का जब 14 वर्ष की उम्र में बाल विवाह होने जा रहा था तो उसने अपने माँ बाप से पूछा “मैं तो अभी बच्ची हूँ”.....लेकिन उनका जवाब था “बच्ची नहीं हो तुम, बड़ी हो गई हो और लड़की हो ...तो पढ़ लिखके क्या करोगी”? कविता की तमाम कोशिशों के बाद भी उसका बाल विवाह हो गया, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी थी। अभी भी उसके अंदर शिक्षा पाने की ललक बची हुई थी। वो मानती थी बेशक पारिवारिक दबाव में उसका बाल विवाह हो गया हो लेकिन हर सूरत में वो स्कूल जाएगी।

उसने ससुराल जाने से मना कर दिया था और माँ-बाप के घर से ही रोजाना 14 किलोमीटर साईकिल चला कर स्कूल जाती थी। वास्तव में उसके इस कदम ने उन सामाजिक कुरीतियों की बेड़ियों को तोड़ने का काम किया था जिसने वर्षों से हमारी देश की बच्चियों को अभी भी कैद किए रखा है। कविता कहती हैं कि शुरू में तो मुझे डर लगता था। लेकिन आज मुझे पता है कि मुझे क्या करना है।

मैं वकील बनना चाहती हूं और जो सही है उसके लिए खड़ी होना चाहती हूं। एक वकील के रूप में मैं यह सुनिश्चित करना चाहती हूं कि सभी बच्चों के अधिकारों की रक्षा की जाए और बाल विवाह की प्रथा को हमेशा के लिए मिटा दिया जाए।
 
यह महज प्रेरणादायक कहानियाँ नहीं हैं। असल में यह बच्चे एक ऐसे सामाजिक परिवर्तन की आधारशिला को मजबूती के साथ रख रहे हैं जो आगे चल कर सामाजिक ढांचे में क्रांतिकारी परिवर्तन का आधार बनेगी। भविष्य में सभी बच्चों को न्याय सुनिश्चित हो पाएगा और आने वाली पीढ़ियों में इसका असर नजर आएगा।

 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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