विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: मिस्र का सिनेमा- पूर्व का हॉलीवुड
चालीस से साठ के काल को मिस्र के सिने-इतिहास में स्वर्ण काल के नाम से पुकारा जाता है। जिस तरह से मिस्र फिल्म निर्माण कर रहा था और जिस तरह दुनिया भर में उसकी फिल्में दिखाई जा रही थीं, जल्द ही मिस्र के सिनेमा को ‘पूर्व का हॉलीवुड’ कहा जाने लगा।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
मिस्र में सिनेमा का प्रारंभ 1896 में ही हो गया जब लुमियर भाइयों ने अपने पेरिस शो के ठीक एक साल बाद एलेक्जान्ड्रिया में एक लघु फिल्म दिखाई। इस शुरुआती सफलता ने फटफटा वहाँ छोटे-छोटे सिनेमा हाल खुलवा दिए। तब से अब तक इजिप्ट में करीब 4,000 से ऊपर फिल्में बनी हैं। 1906 तक वहां लुमियर भाइयों राज रहा। इसके बाद वहां फ्रांस की पाथे तथा इटली की इर्नापोरा कंपनी पहुंच गई। जल्द ही वहां नई तकनीक यानी साउंड एफेक्ट्स, लोकेशन पर शूटिंग, सबटाइटिल्स आदि पहुंच गए।
शुरु में भले ही मिस्र के सिनेमा पर विदेशी दबदबा रहा हो, लेकिन शीघ्र ही वहां सिनेमा का ‘मिस्रीकरण’ (इजिप्टीनाज्ड) हो गया। मिस्र के स्थानीय लोग सिने-दर्शक और सिनेमा से जुड़े लोग हो गए। मोहम्मद बय्युमी एक बैंकर तलत हर्ब से मिला और नतीजा हुआ मिस्र स्टूडियो। 1923 में स्थापित यह पूरे अरब जगत का पहला स्टूडियो है। इसी समय सिने-जरनल ‘अमोन जरनल’ प्रारंभ हुआ, इसीलिए मोहम्मद बय्युमी को मिस्री सिनेमा का जनक कहा जाता है।
मिस्र के त्रिस्तरीय मूवी थियेटर
सिनेमा समाज की संरचना को दिखाता है। मिस्र में मूवी थियेटर के तीन स्तर हैं। तीनों की टिकट दर अलग होती हैं। प्रथम श्रेणी के थियेटर की टिकट दर 10 से 14 पैस्ट्रेस थी, द्वितीय श्रेणी की 7 और तृतीय श्रेणी की टिकट का मूल्य 3 होता। तृतीय श्रेणी को आज भी सिनेमा टेर्सो (3 के लिए इटैलियन शब्द टेर्सो की तर्ज पर) कहा जाता है। टेर्सो के प्रोग्राम और उपकरण भिन्न होते। ये कोई नई रिलीज नहीं दिखाते ये मिस्री, विदेशी फिल्मों का मिश्रण प्रस्तुत करते और कई दिन तक एक ही फिल्म दिखाते रहते हैं।
औरतें शायद ही थियेटर जाती मगर पुरुष लंबी लाइन लगा कर टिकट लेते और फिल्म देखते। फिल्म ‘नेगमत टेर्जो’ और ‘द किंग ऑफ टेर्सो’ के लिए खूब भीड़ जुटी थी। इन फिल्मों में सामान्य आदमी के स्वप्न ‘अमीरों को हराना’ का चित्रण था, एक्शन था।
मूक फिल्मों के दौर में 1927 में इब्राहिम लामा की फिल्म ‘किस इन द डेजर्ट’ पहली फुल लेन्थ फीचर फिल्म थी। इसी साल वेदाद ओर्फी की ‘लैला’ आई। 1930 की मुहम्मद हुसैन हैकल के मिस्री उपन्यास ‘जेनब’ पर आधारित इसी नाम की फिल्म किसान-जीवन का मेलोड्रामा होते हुए भी इस काल के सिनेमा का प्रतिनिधित्व करती है, क्योंकि इस दौरान अधिकतर मेलोड्रामा फिल्में ही बनीं।
अगले साल 1931 में मिस्र में पहली सवाक फिल्म ‘अनशुदात अल-फाउद’ (सॉन्ग ऑफ द हार्ट) बनी। दो साल बाद मिस्र की पहली म्युजिकल फिल्म ‘अल वर्दाह अल-बैदा’ (द व्हाइट रोज) बनी और एक नई तरह की फिल्म, म्युजिकल फिल्म का दौर प्रारंभ हुआ। इसके निर्देशक मोहम्मद करीम थे और नायक की भूमिका अब्देल वहाब ने की थी। यह फिल्म पूरे अरब जगत में दिखाई गई और खूब सफल रही।
कई साल तक इसी संगीत और डॉन्स फार्मूले पर मिस्र में फिल्में बनती और सफल होती रहीं। इस दौरान अरब संगीत खूब लोकप्रिय हुआ। उम कुल्थुम, फरीद एल अत्रास, अब्देल हलेम, लैला मुराद, शादिया, सबाह आदि इस काल के प्रसिद्ध गायक थे।
सिने-इतिहास में स्वर्ण काल
चालीस से साठ के काल को मिस्र के सिने-इतिहास में स्वर्ण काल के नाम से पुकारा जाता है। जिस तरह से मिस्र फिल्म निर्माण कर रहा था और जिस तरह दुनिया भर में उसकी फिल्में दिखाई जा रही थीं, जल्द ही मिस्र के सिनेमा को ‘पूर्व का हॉलीवुड’ कहा जाने लगा। असल में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिकी और यूरोपियन फिल्में आयात करना कठिन हो गया, अत: मिस्र में धड़ाधड़ फिल्में बनने लगीं।
1952 की क्रांति के दौरान किंग फारुक को हटा कर इजिप्शियन फिल्म इंडस्ट्री की स्थापना हुई, जो प्रतिवर्ष 50 फिल्में बनाने लगी, लेकिन नासेर के मिस्र में करीब दो दशकों (1952-1970) तक स्थानीय सिनेमा को अपनी स्क्रिप्ट सेंसरशिप विभाग से पास करवानी होती थी। इन फिल्मों में चुंबन, धर्म, सेक्स की अनुमति थी मगर राजनीति निषिद्ध थी। दर्शक मजे में परदे पर चुम्बन की संख्या गिना करते। 1961 में फिल्म इंड्रस्ट्री का राष्ट्रीयकरण हो गया।
किंग फारुक के समय जो फिल्में प्रतिबंधित थीं, वे तत्काल रिलीज हुईं। देशप्रेम और उपनिवेश विरोधी फिल्में बनने लगीं। इसी तरह की एक फिल्म है, ‘देयर इस ए मैन इन अवर हाउस’ (निर्देशन: हेनरी बरकत)। इसमें नायक प्रसिद्ध अभिनेता ओमर शरीफ हैं। कमेडियन इस्माइल यसिन को लेकर कॉमेडी शृंखला बनी। साहित्यिक कृतियों पर भी फिल्में बनीं। नोबेल पुरस्कृत प्रसिद्ध साहित्यकार नजीब महफूज के उपन्यास पर हुसैन कमाल ने ‘अड्रिफ्ट ऑन द नाइल’ बनाई।
115 मिनट की यह फिल्म 1967 के छ: दिन के युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी है और पलायन, सामान्य-फ्रस्ट्रेटेड मिस्री लोगों को दिखाती है।
प्रसिद्ध सिने-निर्देशक यौसेफ शाहीन की ‘कैरो स्टेशन’ ऑस्कर के लिए भेजी जाने वाली पहली मिस्री फिल्म थी। ओमर शरीफ को ‘लॉरेन्स ऑफ अरेबिया’ तथा ‘डॉक्टर जिवागो’ के लिए गोल्डेन ग्लोब पुरस्कार प्राप्त हुआ। फतेह हमामा इस काल की प्रसिद्ध अभिनेत्री थी, उसे ‘स्टार ऑफ द सेंचुरी’ का खिताब प्राप्त हुआ। 1955 में हमामा तथा ओमर शरीफ ने शादी कर ली।
इक्कीसवीं सदी की फिल्में
इक्कीसवीं सदी की बात करें तो राष्ट्रपति सदात के जीवन पर मोहम्मद खान ने 165 मिनट की ऐतिहासिक फिल्म बनाई। निली करीम, बुशरा आदि को लेकर मोहम्मद दिआब ने 2010 में ‘कैरो 678’ बनाई। इसी साल कॉमेडी ‘बिटरस्वीट’ भी बनी। मिस्र के 2011 के विद्रोह को लेकर दस भिन्न निर्देशओं ने दस अलग-अलग कहानियां लेकर प्रयोगात्माक फिल्म ’18 डेज’ बनाई। हम जीवन में जो विकल्प अपनाते हैं, उसी से हमारा जीवन बनता है, इस कथानक पर अहमद अब्दाला ने 2014 में 105 मिनट की ‘डेकोर’ बनाई।
2016 में हादी एल बगौरी ने ‘हेप्टा: द लास्ट लेक्चर’ बनाई। डॉक्टर शुक्री मोख्तार एक जाना-माना सामाजिक मनोवैज्ञानिक है। वह सामान्य प्रश्नों का उत्तर भी बड़ी कुशलता से देता है। ‘हम कैसे प्यार करते हैं?’ इस सरल प्रश्न पर वह एक अंतिम लेक्चर देना तय करता है।
2014 में मिस्र से प्रसिद्ध फिल्म ‘द ब्लू एलिफेंट’ आई। 170 मिनट की यह हॉरर-रहस्य-हत्या की फिल्म एक मनोचिकित्सक डॉक्टर येहिया (करीम अब्देल अजीज) की कहानी है। वह पागल अपराधियों के इलाज वाले विभाग में काम करता है। उसने 5 साल के लिए काम छोड़ा हुआ है, फिर जब वह अस्पताल लौटता है। उसे जो पता चलता है, उसके साथ जो होता है, वह उसने कभी ख्वाब में भी न सोचा था। जटिल फिल्म ‘ब्लू एलिफेंट’ को 2015 का कैरो नेशनल फेस्टिवल फॉर इजिप्शियन सिनेमा का सर्वोत्तम अभिनेता (करीम अब्देल अजीज) तथा सर्वोत्तम अभिनेत्री (निली करीम) पुरस्कार प्राप्त हुआ।
मिस्री सिनेमा से सिने-जगत को बहुत उम्मीदें हैं।
------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।