नशे की लत बर्बाद कर रही लोगों की जिंदगी, क्या यह हमारा सामाजिक पतन नहीं?
- एक गैर सरकारी रिपोर्ट बताती है जर्मनी में सिगरेट बेचने की 4 लाख ऑटोमैटिक मशीनें हैं, यह विश्व में अव्वल है।
- 2013 की एक सरकारी रिपोर्ट से पता चलता है कि भारत में नशे के आदी हर पांच में से एक व्यक्ति की उम्र 21 साल से कम है।
- देश में बढ़ते अपराध, बीमारियों व हिंसा में भी नशाखोरी की अहम भूमिका रहती है।
विस्तार
आज के समय में कोरोना महामारी के अलावा अगर कोई चीज दुनिया में सबसे ज्यादा फैल रही है तो वो है नशे की लत। यह एक रोग की तरह है, जो लोगों को धीरे-धीरे मौत की नींद सुला रहा है।
पंजाब की एक बेबस 70 वर्षीय महिला ने मीडिया को आपबीती सुनाते हुए कहा कि उसका बेटा नशे से मर गया, बेटी ने भी आत्महत्या कर ली, उसके दो नाती भी नशे के आदी हो चुके हैं। इस उम्र में मुश्किल से चलने वाली इस औरत पर बेटे के 3 व बेटी के 2 बच्चों का पालन-पोषण करने की जिम्मेदारी है और वह लोगों के घरों में बर्तन साफ करने का काम करती है।
नशे का धंधा करने वाले एक व्यक्ति के पांव तले उस समय जमीन खिसक गई जब उसे पता चला कि उसकी पत्नी और बेटी ने भी ड्रग्स लेना शुरू कर दिया है।
मेरे पास पैसे नहीं थे न ही मैं नशा करना चाहता था, लेकिन फिर भी मैं नशे का आदी बन गया। ये कहानी नशे के चंगुल में फंसे किसी एक युवक की नहीं, ऐसे असंख्य युवक हैंं जो पढ़ाई-लिखाई के दौरान इस जाल में फंस जाते हैं। दोस्तों के बीच में यदि कोई एक भी नशा करता है तो वह अन्य साथियों को भी इस दलदल में धकेल देता है।
शुरुआत में पैसे न होने पर भी अन्य साथी नशे की डोज दिला देते हैं तो कुछ इसलिए उकसाते हैं ताकि दूसरे के पैसों से खरीदे नशे से वे भी नशे की अपनी खुराक ले सकें। शुरू में नशा करने वाले दोस्त यही कहते हैं कि एक बार लेकर देख... सभी चिंताओं से मुक्ति मिल जाएगी, शरीर एकदम रिलैक्स हो जाएगा आदि।
ऐसी बातें ही युवाओं को नशेड़ी बना रही हैं। पहले दोस्त ही दोस्त का घर आबाद करने में फर्ज समझते थे, लेकिन अब दोस्त ही दोस्त का घर बर्बाद कर रहे हैं। क्योंकि दोस्तों की बात आजदिन तक किसी ने नहीं टाली अब तो फैशन व ग्लैमर की दुनिया में युवतियां, बच्चे व अधेड़ आयु के लोग भी नशे की लत के शिकार हो रहे हैं।
कुछेक वर्ष पहले तक केवल शराब, धूम्रपान व गुटखा आदि नशे ही चरम पर थे, लेकिन अब तो अफीम, चरस, कोकीन व सिंथेटिक ड्रग आदि जैसे मादक पदार्थों का धंधा बड़े पैमाने पर फलफूल रहा है।
संयुक्त राष्ट्र मादक पदार्थ एवं अपराध कार्यालय (यूएनओडीसी) के साल 2017 में जुटाए गए आंकड़ों के अनुसार 15 से 64 आयु वर्ग के 27 करोड़ से ज्यादा लोगों ने ड्रग्स का इस्तेमाल किया। इसी काल में ड्रग्स के इस्तेमाल से 5 लाख 85 हजार लोगों की मौत हुई और इसमें दो-तिहाई मौतों की वजह नशीले पदार्थो का सेवन था।
मादक दवाओं और पदार्थों के इस्तेमाल से होने वाली समस्याओं से साढ़े तीन करोड़ लोग पीड़ित हैं...
1 करोड़ से ज्यादा लोगों ने ड्रग्स के इंजेक्शन लगाए, जिनमें से 14 लाख लोग एचआईवी और 56 लाख लोग हेपेटाइटिस-सी से पीड़ित रहे। रिपोर्ट यही भी बताती है कि मादक दवाओं और पदार्थों के इस्तेमाल से होने वाली समस्याओं से साढ़े तीन करोड़ लोग पीड़ित हैं लेकिन हर 7 में से एक पीड़ित का ही उपचार हो पाता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) कहता है कि शराब के हानिकारक उपयोग से हर साल 33 लाख लोगों की मौत हो जाती है। शराब पीने वाले व्यक्ति औसतन 17 लीटर सालाना शुद्ध शराब पी जाते हैं। भारत दुनिया में शराब का तीसरा सबसे बड़ा बाजार है।
अमेरिकी रिसर्च के मुताबिक स्मोकिंग को आजमाने वाले दो तिहाई लोग अंतत: सिगरेट के आदी हो जाते हैं। एक गैर सरकारी रिपोर्ट बताती है जर्मनी में सिगरेट बेचने की 4 लाख ऑटोमैटिक मशीनें हैं, यह विश्व में अव्वल है।
मारियुवाना यानी भांग का सेवन भी विभिन्न रूपों में होता आया है। बहुत बार मारियुवाना के उत्पादन को कानूनी मान्यता देने की बातें भी होती हैं विश्व स्तर पर सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली ड्रग मारियुवाना ही है। एक अनुमान के अनुसार 2017 में 18 करोड़ से ज़्यादा लोगों ने इसका इस्तेमाल किया।
2013 की एक सरकारी रिपोर्ट से पता चलता है कि भारत में नशे के आदी हर पांच में से एक व्यक्ति की उम्र 21 साल से कम है। विशेषज्ञों का मानना है कि अपने साथ के लोगों की देखा-देखी, साथियों के दबाव और पढ़ाई-लिखाई की चिंता के कारण कई बच्चे तो 11 साल की उम्र से ही ड्रग्स लेना शुरु कर देते हैं।
क्या यह हमारा सामाजिक पतन नहीं? बेघर बच्चों के बीच यह समस्या और भी गंभीर है। रिपोर्ट में पाया गया कि भारत के करीब 2 करोड़ बेघर बच्चों में से 40 से 70 फीसदी किसी ना किसी तरह के ड्रग्स के संपर्क में आते हैं, कईयों को 5 साल की उम्र से ही नशे की लत लग जाती है, ऐसे बच्चे आगे चलकर ड्रग पैडलर बन जाते हैं।
साधन सम्पन्न वर्ग के युवाओं में आधुनिक सिंथेटिक ड्रग ज्यादा तेजी से फैल रहा है क्योंकि यह नशा भारी कीमत अदा कर हासिल कर होता है। देश में बढ़ते अपराध, बीमारियों व हिंसा में भी नशाखोरी की अहम भूमिका रहती है।
एक समय था जब बच्चे अपने अभिभावकों व रिश्तेदारों के सामने कभी शराब तक नहीं पीते थे, लेकिन आज पारिवारिक व सामाजिक समारोहों में किशोरावस्था से ही युवा अपने माता-पिता के साथ बैठकर शराब पीते हैं।
संवाद किसी भी समस्या का प्रथम और अंतिम हल हो सकता है बशर्ते....
सरकार ने नशाखोरी के चलते बहुत सी दवाओं पर प्रतिबंध लगा दिया जबकि इस कारण बीमार व्यक्ति भी उन दवाओं से वंचित हो गया। नशे के इन दुष्परिणामों से शायद हम जानबूझकर अनभिज्ञ होने का आडम्बर कर रहे हैं या फिर बेबस होकर इसलिए मूकदर्शक बने हुए हैं कि मेरा कौन सा अपना नशाखोरी से जुड़ा है।
इस बुराई को समय रहते यदि दूर न किया गया तो यह देश को बर्बाद कर देगी। अधिकांशतः किशोर विद्यालयों में या विद्यालय के बाहर अपने साथियों से नशाखोरी सीखते हैं। देश भर के स्कूलों में नशीले पदार्थों के इस्तेमाल व इनके दुष्प्रभावों से जागरूक करने के लिए स्कूली पाठ्यक्रम को हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
संवाद किसी भी समस्या का प्रथम और अंतिम हल हो सकता है बशर्ते इसे समय रहते एकदूसरे से स्थापित किया जाए. बच्चों और अभिभावकों के बीच मज़बूत बंधन आपसी संवाद और उनकी देखभाल करने पर आधारित होता है। बच्चों के साथ बिताया थोड़ा सा समय भी वास्तव में उनकी मदद करता है। कार्य चाहे छोटा हो बड़ा माता-पिता को इसके लिए अपने बच्चे की प्रशंसा जरूर करनी चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय ने बच्चों के स्कूली पाठ्यक्रम में नशीले पदार्थों के इस्तेमाल और इसके दुष्परिणामों के बारे में जानकारी दिए जाने पर बल दिया है. बच्चों के विकास व आदतों के लिए एक शिक्षक बहुत बड़ी भूमिका अदा करता है, बच्चे भले ही अभिभावकों की बात न मानें लेकिन एक शिक्षक की बातों पर वह जरूर अम्ल करते हैं।
शिक्षकों के साथ बच्चों का संवाद जितना सकारात्मक होगा उनका मानसिक विकास उतना ही संतुलित होगा, नशा तो है ही मानसिक विकारों की उपज, मानसिक विकारों को दूर करने के लिए शिक्षकों की अहम भूमिका होती है।
नशाखोरी जैसे विषयों को शोध एवं पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाए जाने की जरूरत है। शिक्षा बोर्ड व विश्वविद्यालयों द्वारा इस क्षेत्र में प्रशिक्षित काउंसलर तैयार किए जाने चाहिए और ऐसे मामलों से निपटने के लिए संबंधित कानूनी एजेंसियों को भी विशेष प्रशिक्षण देना होगा तभी हम इस सामाजिक बुराई को जड़ से मिटा पाएंगे व देश की युवा पीढ़ी को नशे से बचा पाएंगे।
हमें बच्चों को समझाना होगा कि समस्याएं तो सभी को हैं लेकिन किसी भी समस्या का हल नशा नहीं हो सकता।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।