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क्या विलुप्त हो जाएंगी हिमालय की वनस्पतियां: बिगड़ता हिमालय का संतुलन

Wed, 11 Mar 2026 07:37 AM IST
Nitin Gautam जयसिंह रावत
जयसिंह रावत Published by: Nitin Gautam Updated Wed, 11 Mar 2026 07:37 AM IST
सार

हिमालय में पौधों की प्रजातियां  ‘अल्पाइन ट्रैप’ की ओर बढ़ रही हैं, जहां एक निश्चित ऊंचाई तक पहुंचने के बाद वे विलुप्त हो जाएंगी।
 

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Will the Himalayan flora become extinct balance of the Himalayas is deteriorating
हिमालय में बढ़ता संकट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

धरती पर हरियाली या वनस्पतियों का विस्तार अच्छा माना जाता है, पर जब वही हरियाली प्रकृति द्वारा तय सीमाओं को लांघ कर दूसरे क्षेत्र में अतिक्रमण करने लगे, तो उसके नतीजे विनाशकारी भी हो सकते हैं। ऐसी ही चेतावनी एरीज, नैनीताल के वैज्ञानिकों के नए शोध में सामने आई है। वैज्ञानिकों के अनुसार, उच्च हिमालयी क्षेत्रों में वनस्पतियों का यह विस्तार प्राकृतिक आपदाओं और जल चक्र के असंतुलन का गंभीर संकेत है।
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गूगल अर्थ इंजन के माध्यम से वर्ष 2001 से 2022 तक के उपग्रहीय आंकड़ों के अनुसार, हिमालयी क्षेत्र की वनस्पतियां जलवायु परिवर्तन के प्रति बेहद संवेदनशील हो चुकी हैं। यह पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के असंतुलन का संकेत है। शोध में आधुनिक रिमोट सेंसिंग तकनीकों, नॉर्मलाइज्ड डिफरेंस वेजिटेशन इंडेक्स (एनडीवीआई) और एन्हांस्ड वेजिटेशन इंडेक्स (ईवीआई) का उपयोग कर यह समझने की कोशिश की गई कि हिमालय की वनस्पति किस दिशा में जा रही है। एनडीवीआई को आप ‘वनस्पति का थर्मामीटर’ कह सकते हैं। यह तकनीक इस सिद्धांत पर काम करती है कि स्वस्थ पौधे सूर्य की रोशनी के एक खास हिस्से को सोख लेते हैं और दूसरे हिस्से को परावर्तित कर देते हैं। ईवीआई एनडीवीआई का ही आधुनिक रूप है, जो वातावरण में मौजूद धूल के कणों व धुंध के प्रभाव को हटाकर जमीन की असली हरियाली को देखता है।
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उपग्रह आंकड़े बताते हैं कि ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों में अब घास और झाड़ियों का तेजी से विस्तार हो रहा है। यह इस बात का प्रमाण है कि ग्लेशियर लगातार पीछे हट रहे हैं। वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के शोध बताते हैं कि उत्तराखंड के कई ग्लेशियर हर वर्ष पांच से 20 मीटर की दर से पीछे हट रहे हैं। इसी तरह, काठमांडो स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट की रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंदूकुश हिमालय में पौधों की प्रजातियां लगातार ऊंचाई की ओर पलायन कर रही हैं। वैज्ञानिक इसे ‘अल्पाइन ट्रैप’ की स्थिति बताते हैं, जहां एक स्तर के बाद पौधों के पास ऊपर जाने की कोई जगह नहीं बचेगी और वे विलुप्त हो जाएंगे। वैज्ञानिक मानते हैं कि वनस्पतियों के असंतुलन से मिट्टी की पकड़ लगातार कमजोर होती जा रही है।
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एरीज का अध्ययन साफ संकेत देता है कि हिमालय की सहनशीलता कमजोर हो गई है। हिमालय में हो रहा यह बदलाव केवल वैज्ञानिक आंकड़ों का विषय नहीं है। यह उन करोड़ों लोगों के जीवन से जुड़ा है, जिनका पानी, भोजन और भविष्य इन पहाड़ों पर निर्भर करता है। अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम चेतावनी को समझकर समय रहते कदम उठाते हैं या इसे आने वाली किसी बड़ी प्राकृतिक त्रासदी की भूमिका बनने देते हैं।      
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