फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Will Oli leave the chair after so much trouble?

क्या इतनी ज़लालत के बाद अब कुर्सी छोड़ेंगे ओली?  

Wed, 24 Feb 2021 02:07 PM IST
Atul sinha अतुल सिन्हा
Updated Wed, 24 Feb 2021 02:07 PM IST
विज्ञापन
Will Oli leave the chair after so much trouble?
केपी शर्मा ओली - फोटो : ANI

आखिरकार नेपाल में प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली को सुप्रीम कोर्ट ने तगड़ा झटका दे दिया और मनमाने तरीके से भंग की गई संसद को फिर से बहाल कर दिया। इस फैसले से जनता में ये सीधा संदेश गया है कि खुद को संविधान से भी ऊपर समझने वाले और पार्टी में खुद को स्वयंभू और सर्वेसर्वा मानने वाले ओली के लिए अब खुद को सही साबित करने का कोई रास्ता नहीं बचा है। ओली पार्टी में पहले ही खुद को अलग थलग कर चुके थे। कुर्सी बचाने के लिए आखिरी रास्ते के तौर पर ओली ने 20 दिसंबर को संसद के निचले सदन यानी प्रतिनिधि सभा भंग कर राष्ट्रपति बिद्यादेबी भंडारी से दस्तखत करवा लिए। तमाम विरोधों के बावजूद इस फैसले से खुद को छह महीने तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री के तौर पर बरकरार रख पाने की उनकी कोशिश भी कम से कम दो महीने तक उन्हें सत्ता सुख जरूर देती रही।

विज्ञापन

यह नहीं माना जा सकता कि इतने सालों से सियासत के धुरंधर खिलाड़ी रहे ओली अपने इस तानाशाही फैसले के इस पहलू के बारे में न सोचा हो। जिस तरह उनके खिलाफ विद्रोह पार्टी से निकल कर नेपाल की सड़कों पर उतर आया था और पिछले दो महीनों से जिस तरह नेपाली जनता इस अलोकतांत्रिक रवैये को लेकर गोलबंदी की कई मिसालें देती रही, उससे ओली भीतर ही भीतर इस फैसले के लिए तैयार भी थे। लेकिन उन्हें अपने चीनी आकाओं पर कुछ ज्यादा ही भरोसा हो गया था। उन्हें लग रहा था कि चीन अपनी कूटनीतिक रास्तों से उन्हें बचा ले जाएगा। लेकिन फिलहाल ऐसा नहीं हो सका।

विज्ञापन

नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के सह अध्यक्ष पुष्प कमल दहल अदालत के इस फैसले से बेशक बेहद उत्साहित हैं और इसे लोकतंत्र की जीत मान रहे हैं, लेकिन अब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती ओली को तत्काल प्रधानमंत्री की कुर्सी से उतारना है। 20 दिसंबर के बाद से नेपाल में सियासी घटनाक्रम और तेजी से बदले। कम्युनिस्ट पार्टी के दहल गुट ने प्रस्ताव पास कर ओली को पार्टी से निकाल दिया तो ओली खुद को असली नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का नेता बताते रहे और दहल को अपनी पार्टी से निकाल देने का दावा करते रहे। लड़ाई सड़कों पर उतरी। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। पार्टी के मुख्य सचेतक देव प्रसाद गुरुंग ने सुप्रीम कोर्ट में ओली के फैसले को चुनौती दी। ऐसी 13 और याचिकाएं दायर हुईं और सुप्रीम कोर्ट से संसद बहाली की मांग की गई। मंगलवार को सर्वोच्च अदालत ने फैसला सुना दिया और सदन बहाल करते हुए 13 दिनों के भीतर सत्र बुलाने का आदेश दे दिया।

विज्ञापन
विज्ञापन

जाहिर है अब सदन में शक्ति परीक्षण होगा और जो मौजूदा स्थितियां हैं, उसमें ओली का कुर्सी बचा पाना नामुमकिन लग रहा है। 275 सदस्यों वाली नेपाली संसद में ओली और प्रचंड गुट ने मिलकर बहुमत हासिल किया था और सरकार बनाई थी। बार बार ये कोशिश होती रही कि मामले को पार्टी के भीतर ही सुलझा लिया जाए। लेकिन ओली की मनमानियों और अड़ियल रवैये की वजह से हालात बिगड़ते चले गए।

नेपाल के सियासी उठापटक के बीच जानकार मानते हैं कि इस पूरी स्थिति पर नेपाली कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी पार्टियां नजर बनाए हुए हैं और कम्युनिस्टों की इस आपसी लड़ाई को वो अपने हक में देख रहे हैं। उन्हें लगता है कि ओली और प्रचंड की आपसी जंग और कम्युनिस्ट पार्टी में टूट से आखिरकार उन्हें फायदा होगा और अगर पहले से घोषित तारीखों 30 अप्रैल और 10 मई को चुनाव होते हैं तो वो इस मुद्दे को ही अपना सबसे मजबूत चुनावी हथियार बनाएंगी। नेपाली कांग्रेस, समाजवादी पार्टी समेत तमाम विपक्ष साझा रणनीति बनाने के बारे में भी सोच रहे हैं। सबकी निगाह सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर लगी थी। अब संसद बहाल करने के आदेश के बाद से नेपाल में तेजी से राजनीतिक बैठकों का दौर शुरू हो गया है।

गौरतलब है कि 20 दिसंबर को संसद भंग करने के फैसले के बाद ही ओली और प्रचंड गुटों ने अलग अलग पार्टी पर अपना दावा पेश किया था और नेपाल निर्वाचन आयोग के सामने अपनी अपनी दावेदारी पेश की थी। पार्टी के चुनाव चिन्ह सूर्य पर भी दोनों ने अपना दावा पेश किया था। लेकिन आयोग ने दोनों ही गुटों के दावे को खारिज कर दिया और साफ कह दिया कि दोनों ही गुटों का दावा पार्टी संविधान के खिलाफ है और पार्टी संविधान से आयोग कोई छेड़छाड़ नहीं कर सकता।

2018 में चुनाव में जीत के बाद प्रचंड की पार्टी सीपीएन (माओवादी सेंटर) और ओली की पार्टी सीपीएन-यूएमएल का विलय हो गया था और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी अस्तित्व में आई थी। ओली को प्रधानमंत्री बनाया गया और दहल को पार्टी का सह अध्यक्ष। तय ये भी हुआ कि आधे कार्यकाल के बाद यानी ढाई साल बाद ओली पार्टी की जिम्मेदारी संभालेंगे और दहल को पीएम की कुर्सी मिल जाएगी। लेकिन सत्ता में आते ही ओली ने अपने तरीके से सरकार चलानी शुरू की, पार्टी से तालमेल नहीं रखा, मनमाने फैसले करने लगे और पार्टी के भीतर ही अपने गुट के जरिये सियासत करने लगे।

इन्ही स्थितियों का असर हुआ कि नेपाल में एक बार फिर राजशाही समर्थक एकजुट होने लगे और देश में एकबार फिर राजतंत्र की वापसी का आंदोलन भी जोर पकड़ने लगा। देश के तमाम हिस्सों में राजा के समर्थक सड़कों पर आने लगे और मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था की खामियां गिनवाने लगे। ओली के विवादास्पद बयान, भारत विरोधी रवैया और नक्शे को लेकर अनायास विवाद के साथ साथ ही चीन से उनकी बढ़ती नजदीकियां और चीन के आगे घुटने टेकने जैसी स्थिति ने ओली को बेहद विवादास्पद बना दिया है।

लेकिन अब स्थितियां एक बार फिर करवट ले चुकी हैं और सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने सत्ताधारी पार्टी के लिए भी ये चुनौती खड़ी कर दी है कि अब वो किसी भी तरह देशहित  की सोचे, न कि व्यक्तिगत महात्वाकांक्षाओं में उलझी रहे। जाहिर है ओली के लिए ये मुश्किल समय है और सबकी नजर उनकी अगली रणनीति पर है
 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed