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आखिरकार कौन किसको चलाएगा: 2026 एआई की परीक्षा का साल हो सकता है, आने वाला समय ही बताएगा हम एआई को चला रहे या..
Thu, 01 Jan 2026 07:57 AM IST
पवन पांडेय
गेल मार्कोविट्ज, कंटेंट हेड, विश्व आर्थिक मंच
गेल मार्कोविट्ज, कंटेंट हेड, विश्व आर्थिक मंच
Published by: पवन पांडेय
Updated Thu, 01 Jan 2026 07:57 AM IST
सार
2025 एआई की उम्मीदों का साल था, लेकिन 2026 इसकी परीक्षा का साल हो सकता है। आने वाला वर्ष ही बताएगा कि हम एआई को चला रहे हैं या वह हमें?
एआई को अपना सहायक मानें, तो कोई मुश्किल नहीं। लेकिन अगर जेन-जी अपनी आंख बंद कर चलेगी, तो मैनहोल में गिरने से एआई थोड़े बचाएगा।
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एआई
- फोटो : AI
विस्तार
अगर 2025 एआई के शोर और उम्मीदों का साल था, तो 2026 शायद एआई के नतीजों का साल साबित होगा। 2026 में लगभग सभी के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी एआई की दौड़ में आगे बढ़ना। लेकिन इसके लिए एआई से जुड़े उन विरोधाभासों की पहचान जरूरी है, जो तकनीक के बारे में कम, और इन्सानी खूबियों और कमजोरियों से ज्यादा जुड़ी हैं।
एआई की भूमिका बढ़ेगी और आपकी भी
विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) की फ्यूचर ऑफ जॉब्स 2025 रिपोर्ट बताती है कि आने वाले समय में नई नौकरियों की जरूरत बढ़ेगी। अगले पांच साल में करीब 17 करोड़ नौकरियां पैदा होने वाली हैं। यह बात सच है कि अलग-अलग क्षेत्रों में जिस तरह के बदलाव आ रहे हैं और एआई का असर बढ़ रहा है, उससे कई नौकरियां स्वचालित होंगी, लेकिन इससे इन्सान की भूमिका कम नहीं होगी। एआई आपकी राह आसान बना सकता है, लेकिन चलना तो आपको ही पड़ेगा। एआई के नए-नए उत्साह में इन्सान भले ही हर चीज में एआई का उपयोग करने की सोचे, लेकिन गंभीर योजनाओं के निर्माण और उनके क्रियान्वयन को मशीन के हाथों में तो नहीं छोड़ा जा सकता। मशीनों से रचनात्मकता की उम्मीद नहीं कर सकते।
इतनी मेहनत तो करनी ही होगी
एमआईटी स्लोन के शोध के अनुसार, एआई अपनाने की शुरुआत में प्रदर्शन थोड़ा घटता है, पर लंबे समय में नतीजे बेहतर होते हैं, क्योंकि इंफ्रास्ट्रक्चर, प्रशिक्षण और कार्यप्रवाह बदलने में समय लगता है, जिससे तालमेल बिठाना मुश्किल होता है। यह पैटर्न ‘एआई एडॉप्शन जे-कर्व’ कहलाता है। इसीलिए यह पाया गया कि एआई अपनाने वाली कंपनियां दीर्घकाल में इसका इस्तेमाल न करने वाली कंपनियों से बेहतर प्रदर्शन करने लगीं। कुछ कर्मचारी भले ही कहें कि कम गुणवत्ता वाले एआई-जनित काम की वजह से उन्हें उसे सुधारने में अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है, लेकिन इतनी मेहनत तो करनी ही होगी।
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तभी तो बढ़ेगा भरोसा
बड़े लैंग्वेज मॉडल और जेनरेटिव एआई उपकरण भी अब इन्सानों जैसे कन्टेंट बना सकते हैं। इसके अलावा, इंटरनेट पर इन्सानों की तुलना में एआई द्वारा लिखे लेख ज्यादा हो चुके हैं, जिससे औसत, दोहराव या गलत सामग्री बढ़ने का जोखिम है। एक अध्ययन में पाया गया कि इन्सान अब चार में से सिर्फ एक बार ही उच्च-गुणवत्ता वाले डीपफेक वीडियो पहचान पाते हैं। यही कारण है कि ऑनलाइन भरोसे को बनाए रखने पर जोर दिया जा रहा है। इसके लिए इन्सानी निगरानी जरूरी है। एआई का क्षेत्र जितना बढ़ेगा, उसके समांतर इन्सानी हस्तक्षेप भी उसी मात्रा में बढ़ता जाएगा।
जेन-जी अब तो सोचना शुरू करे
एक अमेरिकी सर्वे के अनुसार, 47 फीसदी जेन-जी हर हफ्ते जेनरेटिव एआई का इस्तेमाल करते हैं, जिनमें 41 प्रतिशत चिंतित हैं कि इससे उनकी सोचने की क्षमता कमजोर हो सकती है। एमआईटी के एक अध्ययन में भी पाया गया कि एआई पर ज्यादा निर्भरता दिमाग की सक्रियता, याददाश्त और मौलिक सोच को कम कर सकती है। किसी भी चीज की अति तो बुरी होती ही है। दोष एआई के इस्तेमाल में नहीं, बल्कि इस्तेमाल के तरीके में है। एआई को अपना सहायक मानें, तो कोई मुश्किल नहीं होगी, लेकिन अगर जेन-जी अपनी आंख बंद कर चलेगी, तो मैनहोल में गिरने से एआई थोड़े बचाएगा।
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एआई की भूमिका बढ़ेगी और आपकी भी
विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) की फ्यूचर ऑफ जॉब्स 2025 रिपोर्ट बताती है कि आने वाले समय में नई नौकरियों की जरूरत बढ़ेगी। अगले पांच साल में करीब 17 करोड़ नौकरियां पैदा होने वाली हैं। यह बात सच है कि अलग-अलग क्षेत्रों में जिस तरह के बदलाव आ रहे हैं और एआई का असर बढ़ रहा है, उससे कई नौकरियां स्वचालित होंगी, लेकिन इससे इन्सान की भूमिका कम नहीं होगी। एआई आपकी राह आसान बना सकता है, लेकिन चलना तो आपको ही पड़ेगा। एआई के नए-नए उत्साह में इन्सान भले ही हर चीज में एआई का उपयोग करने की सोचे, लेकिन गंभीर योजनाओं के निर्माण और उनके क्रियान्वयन को मशीन के हाथों में तो नहीं छोड़ा जा सकता। मशीनों से रचनात्मकता की उम्मीद नहीं कर सकते।
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इतनी मेहनत तो करनी ही होगी
एमआईटी स्लोन के शोध के अनुसार, एआई अपनाने की शुरुआत में प्रदर्शन थोड़ा घटता है, पर लंबे समय में नतीजे बेहतर होते हैं, क्योंकि इंफ्रास्ट्रक्चर, प्रशिक्षण और कार्यप्रवाह बदलने में समय लगता है, जिससे तालमेल बिठाना मुश्किल होता है। यह पैटर्न ‘एआई एडॉप्शन जे-कर्व’ कहलाता है। इसीलिए यह पाया गया कि एआई अपनाने वाली कंपनियां दीर्घकाल में इसका इस्तेमाल न करने वाली कंपनियों से बेहतर प्रदर्शन करने लगीं। कुछ कर्मचारी भले ही कहें कि कम गुणवत्ता वाले एआई-जनित काम की वजह से उन्हें उसे सुधारने में अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है, लेकिन इतनी मेहनत तो करनी ही होगी।
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तभी तो बढ़ेगा भरोसा
बड़े लैंग्वेज मॉडल और जेनरेटिव एआई उपकरण भी अब इन्सानों जैसे कन्टेंट बना सकते हैं। इसके अलावा, इंटरनेट पर इन्सानों की तुलना में एआई द्वारा लिखे लेख ज्यादा हो चुके हैं, जिससे औसत, दोहराव या गलत सामग्री बढ़ने का जोखिम है। एक अध्ययन में पाया गया कि इन्सान अब चार में से सिर्फ एक बार ही उच्च-गुणवत्ता वाले डीपफेक वीडियो पहचान पाते हैं। यही कारण है कि ऑनलाइन भरोसे को बनाए रखने पर जोर दिया जा रहा है। इसके लिए इन्सानी निगरानी जरूरी है। एआई का क्षेत्र जितना बढ़ेगा, उसके समांतर इन्सानी हस्तक्षेप भी उसी मात्रा में बढ़ता जाएगा।
जेन-जी अब तो सोचना शुरू करे
एक अमेरिकी सर्वे के अनुसार, 47 फीसदी जेन-जी हर हफ्ते जेनरेटिव एआई का इस्तेमाल करते हैं, जिनमें 41 प्रतिशत चिंतित हैं कि इससे उनकी सोचने की क्षमता कमजोर हो सकती है। एमआईटी के एक अध्ययन में भी पाया गया कि एआई पर ज्यादा निर्भरता दिमाग की सक्रियता, याददाश्त और मौलिक सोच को कम कर सकती है। किसी भी चीज की अति तो बुरी होती ही है। दोष एआई के इस्तेमाल में नहीं, बल्कि इस्तेमाल के तरीके में है। एआई को अपना सहायक मानें, तो कोई मुश्किल नहीं होगी, लेकिन अगर जेन-जी अपनी आंख बंद कर चलेगी, तो मैनहोल में गिरने से एआई थोड़े बचाएगा।