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जहां पहाड़ों से आती है दही-माखन की खुशबू

Thu, 12 Mar 2026 07:36 AM IST
Nitin Gautam अमित मुद्गल
अमित मुद्गल Published by: Nitin Gautam Updated Thu, 12 Mar 2026 07:36 AM IST
सार

बरसाना के सांकरी खोर के बारे में कहा जाता है कि यहां लोग चट्टानों पर हाथ घिसकर दही व माखन की खुशबू का एहसास करते हैं।

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Where the aroma of curd and butter comes from the mountains
जहां पहाड़ों से आती है दही-माखन की खुशबू - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जैसलमेर से लगभग 40-50 किलोमीटर दूर एक गांव है हाबूर। कहा जाता है कि यहां ऐसे पत्थर पाए जाते हैं, जिन्हें ‘हाबूर स्टोन’ कहा जाता है। स्थानीय भाषा में इन्हें ‘हाबूरिया भाटा’ या ‘स्वर्णगिरी पत्थर’ भी कहते हैं। बताया जाता है कि यदि इन्हें दूध में डाल दिया जाए, तो दूध बिना जामन (स्टार्टर) के ही जमकर दही बन जाता है। इधर मथुरा में तो ऐसा पर्वत ही है, जिसकी चट्टानों पर हथेलियां रगड़ने से माखन व दही की खुशबू का एहसास होने का दावा किया जाता है।
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बरसाना में एक स्थान है सांकरी खोर। ब्रह्मांचल पर्वत पर एक बेहद संकरी-सी गली है। इसी से इसका नाम पड़ा है सांकरी खोर। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, द्वापर युग में इसी गली से होते हुए ब्रज की गोपियां दही और माखन आदि लेकर बाजार जाती थीं। उसी समय बालकृष्ण अपने सखाओं के संग यहां उनसे माखन मांगते थे। कभी छीना-झपटी भी होती थी। इससे दही, माखन शिलाओं पर बिखर जाता था। मान्यता है कि आज भी इस स्थान की चट्टानों से माखन व दही की खुशबू महसूस की जा सकती है। लोग यहां जाते हैं और हथेलियों को रगड़ते हैं और उसे सूंघकर इस खुशबू का दावा करते हैं। इस गली के दोनों ओर की शिलाओंं में से एक ओर का रंग काला है और दूसरी ओर का गोरा। श्रद्धालु मानते हैं कि श्रीकृष्ण जिन शिलाओं पर बैठते थे, वे श्याम और राधा जिन पर बैठती थीं, वे गोरी हो गईं। हालांकि, विज्ञान इसे नहीं मानता है।
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इस पर्वत की चर्चा 16वीं शताब्दी में हुई, पर गोवर्धन पर्वत की तरह ही इसे भी बहुत प्राचीन माना जाता है। सांकरी खोर और आसपास के पत्थरों पर कई महत्वपूर्ण चिह्न और नक्काशी पाई गईं हैं। बरसाना के मंदिरों और कुछ पहाड़ी रास्तों पर मध्यकाल (16वीं-17वीं शताब्दी) के शिलालेख मिलते हैं, जो ब्रज भाषा व देवनागरी लिपि में हैं। बरसाना से मात्र तीन किमी दूर स्थित हथिया गांव में एक स्थल पर पुरातात्विक सर्वेक्षण किए गए हैं। यहां पेंटेड ग्रे वेयर (चित्रित धूसर मृदभांड) संस्कृति के अवशेष मिले हैं। पुरातत्वविदों के अनुसार, यह स्थल लगभग 1200-800 ईसा पूर्व या उससे भी पुराने ऐतिहासिक काल का हो सकता है। यह वही समय है, जिसे महाभारतकाल होने का दावा भी किया जाता है। गोवर्धन के पास ही बहज गांव में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने अपनी अब तक की सबसे गहरी खोदाई कराई। यहां से लगभग 4,500 वर्ष पुरानी सभ्यता के अवशेष मिले हैं। गणेश्वर सभ्यता व पाषाण काल के पत्थर के औजार मिले हैं, जो साबित करते हैं कि यह क्षेत्र लाखों वर्षों से मानव सभ्यता का केंद्र रहा है।
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