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जब अपराध-बोध बन जाए बोझ: खुद को दोष देने की आदत से कैसे निकलें
Sun, 15 Feb 2026 07:34 AM IST
देवेश त्रिपाठी
जैंसी डन, द न्यूयॉर्क टाइम्स
जैंसी डन, द न्यूयॉर्क टाइम्स
Published by: देवेश त्रिपाठी
Updated Sun, 15 Feb 2026 07:34 AM IST
सार
अपराध-बोध की भावना हमें रिश्ते सुधारने के लिए भी प्रेरित करती है। पर जब यह बढ़ जाए, तो संकट पैदा होता है।
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अपराध बोध सताए तो क्या करें
- फोटो : Freepik
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विस्तार
कभी-कभी लगता है कि हम किसी-न-किसी मोर्चे पर चूक गए हैं। कभी किसी करीबी दोस्त का जन्मदिन भूल जाते हैं, कभी समय पर माता-पिता का फोन नहीं उठा पाते, तो कभी बच्चे के स्कूली कार्यक्रम में नहीं पहुंच पाते हैं। गिल्ट फ्री: रिक्लेमिंग योर लाइफ फ्रॉम अनरीजनेबल एक्सपेक्टेशंस की लेखिका व मनोचिकित्सक डॉ. जेनिफर रीड कहती हैं कि गिल्ट, यानी अपराध बोध होना रोज का अनुभव बन चुका है। कई बार अपराध-बोध की भावना हमें रिश्ते सुधारने या बेहतर बदलाव के लिए भी प्रेरित करती है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब यह जरूरत से ज्यादा बढ़ जाए। तब यह बेचैनी, गुस्सा और मानसिक थकान का कारण बन सकता है।
तो जब अपराध-बोध उदास करे, तो क्या करें? अक्सर हम अपनी गलती को अपने व्यक्तित्व से जोड़ लेते हैं। मान लीजिए, आपने आज कुछ खास काम नहीं किया, तो तुरंत मन में ख्याल आता है कि मैं आलसी हूं। डॉ. रीड बताती हैं कि यह सोच गलत है, जिसका मानसिक सेहत पर बुरा असर पड़ता है। यदि आपको अपने किए किसी काम के लिए बुरा लगता है, तो अपने काम पर ध्यान दें, अपने ऊपर संदेह न करें। वह कहती हैं कि अपराध-बोध एक ऐसी भावना
है, जो धीरे-धीरे आदत बन सकती है। लेकिन आप उससे उबर सकते हैं। उससे निपटने के लिए सबसे जरूरी है आत्म-करुणा का होना।
खुद को दोषी मानने के बजाय यह स्वीकार करना ज्यादा मददगार होता है कि हालात हमारे नियंत्रण में नहीं थे और हमने अपनी क्षमता के अनुसार कोशिश की। न्यूयॉर्क की मनोवैज्ञानिक और आई एम ओके, यू आर माई पेरेंट्स की लेखिका डेल एटकिंस कहती हैं कि जिस दिन अपराध-बोध बहुत ज्यादा महसूस हो, उस दिन आपने जो अच्छा किया, उस पर ध्यान देकर इससे मुकाबला करें। यह अपराध-बोध को पूरी तरह खत्म नहीं करता, पर उसकी तीव्रता जरूर
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कम करता है।
यह समझना भी बेहद जरूरी है कि जीवन के हर क्षेत्र में सबको खुश रखना असंभव है। अगर हम काम को प्राथमिकता देते हैं, तो परिवार या दोस्तों को समय कम मिल सकता है और इससे कुछ लोग निराश भी हो सकते हैं। कई विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने से बचने के बजाय, अपने फैसले की जिम्मेदारी खुद लें, और उस व्यक्ति की भावनाओं को जगह दें। अगर किसी गलती की वजह से अपराध-बोध हो, तो जरूरी यह नहीं है कि आप खुद को सजा दें या नुकसान की भरपाई करें, बल्कि यह सोचना है कि आपने क्या किया, न कि आगे बढ़ने का कोई तरीका सोचें।
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तो जब अपराध-बोध उदास करे, तो क्या करें? अक्सर हम अपनी गलती को अपने व्यक्तित्व से जोड़ लेते हैं। मान लीजिए, आपने आज कुछ खास काम नहीं किया, तो तुरंत मन में ख्याल आता है कि मैं आलसी हूं। डॉ. रीड बताती हैं कि यह सोच गलत है, जिसका मानसिक सेहत पर बुरा असर पड़ता है। यदि आपको अपने किए किसी काम के लिए बुरा लगता है, तो अपने काम पर ध्यान दें, अपने ऊपर संदेह न करें। वह कहती हैं कि अपराध-बोध एक ऐसी भावना
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है, जो धीरे-धीरे आदत बन सकती है। लेकिन आप उससे उबर सकते हैं। उससे निपटने के लिए सबसे जरूरी है आत्म-करुणा का होना।
खुद को दोषी मानने के बजाय यह स्वीकार करना ज्यादा मददगार होता है कि हालात हमारे नियंत्रण में नहीं थे और हमने अपनी क्षमता के अनुसार कोशिश की। न्यूयॉर्क की मनोवैज्ञानिक और आई एम ओके, यू आर माई पेरेंट्स की लेखिका डेल एटकिंस कहती हैं कि जिस दिन अपराध-बोध बहुत ज्यादा महसूस हो, उस दिन आपने जो अच्छा किया, उस पर ध्यान देकर इससे मुकाबला करें। यह अपराध-बोध को पूरी तरह खत्म नहीं करता, पर उसकी तीव्रता जरूर
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कम करता है।
यह समझना भी बेहद जरूरी है कि जीवन के हर क्षेत्र में सबको खुश रखना असंभव है। अगर हम काम को प्राथमिकता देते हैं, तो परिवार या दोस्तों को समय कम मिल सकता है और इससे कुछ लोग निराश भी हो सकते हैं। कई विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने से बचने के बजाय, अपने फैसले की जिम्मेदारी खुद लें, और उस व्यक्ति की भावनाओं को जगह दें। अगर किसी गलती की वजह से अपराध-बोध हो, तो जरूरी यह नहीं है कि आप खुद को सजा दें या नुकसान की भरपाई करें, बल्कि यह सोचना है कि आपने क्या किया, न कि आगे बढ़ने का कोई तरीका सोचें।