फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Whatever you cooking, I will eat

मल्काइन को लाख समझाया, जो तुम बनाओगी वही ठूंस लेंगे

Sat, 08 Sep 2018 08:58 PM IST
Updated Sat, 08 Sep 2018 08:58 PM IST
विज्ञापन
Whatever you cooking,  I will eat

मल्काइन को लाख समझाया के देखो ये सावन है। ठीक है मान लिया, ये भी मान लिया के जो तुम बनाओगी वही ठूंस लेंगे। यह भी माना कि आमलेट। हड्डा बोटी सब कुछ अब रक्षाबंधन के बाद जो बुधवार आएगा यानी 29 अगस्त को उस दिन खाएंगे।

विज्ञापन


सब कुछ तो मान लिया पर अब ये क्या नया झाम फैला रही हो के आज सावन का पहला सोमवार है और बाकी के तीन सोमवार भी व्रत रखना है हमें। हमने लाख समझाया के भई तुम और दीपू रख लो हम बाप पूत को फिफ्टी परसेन्ट तो अपने आप ही मिल जाएगा, पर बंदी मानी नहीं। टस्स से मस्स नहीं हुई इसलिये भी के मेजराइन भी सपोर्ट कर रही थी।
विज्ञापन


हां मम्मी, हां मम्मी कर कर के, और उसमे अपने घर के भी उदाहरण जोड़े जा रही थी के हमारी मम्मी भी शादी से पहले हम सब को और पापा को भी ऐसे ही रखवाती थी। मानना पड़ा हमको। कुछ देर पहले सबको गाड़ी से ले कर गया फौजी 'सर्व धर्म स्थल' (फौज में मन्दिर को यही कहते है) कसम से पहली बार लाइन में लग कर भोलेनाथ को जलाभिषेक करना पड़ा।
विज्ञापन
विज्ञापन

 
लाइन में खड़े-खड़े याद आ रहा था अपना नरही वाला ज्ञानेश्वर ॐ मन्दिर के कित्ती भी भीड़ होती मल्काइन को लेकर दन्न से आगे पहुंच जाते के हटो भई हमको भी जल चढ़ाना है तो वहां की बात और है। वहां मन्दिर में अपनी चलती है पर यहां तो पूरे फौजी एटिकट और मैनर्स फॉलो करने है, तो जब नम्बर आया तभी जलार्पण किया।
 
खैर घर आये तो दस मिनट में ही एक गिलास बादाम शेक दे गयी। हमने कहा ये क्या तो बोली पी लो बाबू कमजोरी न आ जाय क्योकि नाश्ता और लंच एक साथ मिलेगा करीब दो बजे तक। इस बात का जवाब तो सटीक था हमारे पास लेकिन मन मसोस के चुप रह गए क्योंकि सामने ही दीपू जो बैठी थी। अभी कुछ देर पहले ये साबूदाने की खिचड़ी ब्रन्च के रूप में मिली। हम खाने लगे तो बोली शाम को चाय के साथ भी कुछ फलहारी बना दूंगी। 

और रात में

रात में तो बस वही कुटू के आटे की पूड़ी और सब्जी। जाते-जाते धीरे से पास आ के कह गई अच्छे बच्चे ज्यादा जिद नही करते बी अ गुड ब्वाय। सादर। आप सब बहना लोगों ने मटर को लेकर इतना भौकाल बना दिया कि हम अपराध बोध से ग्रसित से हो गए और लगा के ऊपर से हमें मटर नही डलवानी चाहिए थी और जैसी दीपू ने कढ़ाही से निकाल कर दी थी वही खानी थी। और उससे भी कहीं ज्यादा हमारी फूँक सरक रही थी कि अगर इस महारानी ने रात में फ्री हो कर देख लिया तो हमारी जो दशा होगी वो सोच-सोच कर सिहर रहे थे हम।

मन ही मन कैलाशपति को याद कर रहे थे कि एक विचार आया के मंदिर चल कर भूल की क्षमा याचना कर लें तो कुछ गिल्ट कम होगा। तुरंत चेंज कर के निकलने लगे तो किचन से प्रगट हुई और पंजे को दो बार घुमा कर बिना बोले पूछा कहां? हमने भी जल्दी से अपना पंजा वर्टिकल किया दो बार आगे पीछे किया मतलब सबर करो अभी आता हूं।

गाड़ी निकाल कर सीधे मन्दिर। अब तक सूर्य देव विश्राम को जा चुके थे और मन्दिर में भी भीड़ नही थी। पुजारी जी अपनी पूजा अर्चना में लगे थे। हम सीधे महादेव के समक्ष नी डाउन मुद्रा में होकर अपनी भूल दोहरा रहे थे कि कानों में आवाज आयी कैसे हो भक्त? अब क्यों आये हो सुबह तो सपरिवार जलाभिषेक कर गए हो।  

सर उठा कर आँखें खोलीं तो देखा साक्षात त्रिलोकीनाथ खड़े है। हमने कहा हे नागेश्वर मुझसे दिन में एक भूल हो गयी है उसी की क्षमा याचना हेतु आया हूं आपके द्वार। तो इस पर पशुपतेश्वरनाथ प्रभु बोले कि तुम्हारी भूल हमें दिन में ही पता लग गयी थी पर सुबह तुमने एक कर्म इतना सुंदर किया कि हम प्रसन्न हो गए और तुम्हें दर्शन दिए। इस पर मेरी प्रश्नवाचक दृष्टि को देखते हुए चन्द्रधर बोले कि तुमने जो बिल्व पत्र हमे सुबह अर्पित किये वो एकदम शुद्ध थे और सब अखण्डित थे। 

उससे भी कहीं अधिक हम प्रसन्न हुए तुम्हारे उस कर्म से जो तुमने पंक्ति में लगे उन सब भक्तों को दिए जिनके पास नहीं थे बिल्वपत्र। हमने कहा हे नीलकण्ठ महादेव प्रभु वो तो हमने बेल का पेड़ दो दिन लगा कर चिन्हित कर लिया था और ये भी सत्य है कि एक फौजी जवान को पेड़ पर चढ़ा कर खूब सारे तुड़वा लिए थे और फिर बैठ कर शुध्द व अखण्डित अलग कर लिये।

अब गिरिजापति बोले तुम्हारे इस कर्म से हम प्रसन्न हैं और तुम्हारी इस भूल का क्षमादान देते हैं तुम्हें और भविष्य में सचेत रहना वत्स अब तुम जाओ मेरी आरती का समय हो रहा है और मुझे हर मंदिर में कम से कम एक पल तो रहना ही है। 

बस हे आशुतोष प्रभु एक छोटी सी विनय और है आपसे कि आपके आशीर्वाद से ही जो हमें गौरा माता रूपी उषा मिली है वो बहुत गरियायेगी हमें हमारी इस भूल पर तो बस उसका निवारण भी कर दो हे मनकामनेश्वर।

तो शूलपाणि प्रभु बोले वो हमने अपनी घरैतिन से कह दिया था और उसने दिन में ही तुम्हारी वो क्या बुलाते हो तुम उसे हां मल्काइन तो उसको भी समझा दिया है। जाओ कल्याण हो तुम्हारे परिवार का।


हम जल्दी से चलने लगे और मुड़े ही थे कि महाकालेश्वर प्रभु बोले वत्स थैंक्यू तो बोलते जाओ। हमने कहा प्रभु खुशी में फिर भूल हो गयी आप मेरा साष्टांग दन्डवत स्वीकार करो। उठे तो देखा त्रिपुरारी प्रभु अन्तर्ध्यान हो चुके थे। पुनः दण्डवत कर हमने गाड़ी सीधी घर दबाई। भूख की सीमा चरम पर थी तड़ातड़ ये कुटु की पूड़ी सब्जी छ्क के खाई। अरे अब छक के खा लिए हो अब तो बता दो कहां गए थे तुम ?

सादर।

लेखक लखनऊ फूडीज ग्रुप के सक्रिय सदस्य हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed