बंगाल चुनाव परिणाम 2021: ममता बनर्जी को सलाम तो बनता है !
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तो बंगाल ने यह साबित कर दिया कि वहां के लोग अपनी नेत्री की क्षमता पहचानते हैं और अपने वोट का इस्तेमाल करना जानते हैं। तीन दिन पहले ही मैंने अपने विश्लेषण में इसी मंच पर कहा था कि ममता तीसरी पारी खेलने जा रही हैं ,लेकिन अब उनकी चुनौतियां बढ़ जाएंगी। वे प्रतिपक्ष का एक राष्ट्रीय चेहरा बन कर उभरी हैं और समूचा देश अब उन्हें संयुक्त विपक्ष के एक मुखर स्वर के रूप में देख सकता है। फिर भी उनकी जीत के कारणों की एक पड़ताल तो बनती है।
यह सच है कि ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के लिए अब तक का यह बेहद कठिन चुनाव था। अगर बीजेपी ने अत्यंत धारदार, आक्रामक, उत्तेजक और निंदनीय प्रचार अभियान चलाया तो ममता बनर्जी को भी उसी तर्ज़ पर उतने ही निचले स्तर पर आकर जवाबी अभियान चलाना पड़ा।
बंगाल में बसे उत्तर प्रदेश और बिहार के मतदाताओं को लुभाने के लिए बीजेपी ने यदि राम का सहारा लिया तो ममता ने भी अपनी दुर्गा भक्ति दिखाने से गुरेज नहीं किया। इसके बाद दुश्मन का दुश्मन दोस्त वाले मुहावरे पर अमल करते हुए ममता ने कमोबेश सारे दलों से सहयोग की प्रार्थना भी कर डाली।
उन्होंने सीधे ही कांग्रेस और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी से बात की,जिन्होंने वाम दलों को भी इस घड़ी में परदे के पीछे से तृणमूल कांग्रेस का साथ देने के लिए मनाया। आपको याद होगा कि तीसरे चरण के बाद कांग्रेस और वामपंथी दलों ने अपने प्रचार अभियान में शिथिलता बरती और न के बराबर रैलियां कीं।
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने तो कोरोना के नाम पर अपनी पार्टी की सारी रैलियां ही रद्द कर दीं। इसके बाद मतदान और मतगणना के दरम्यान अनेक केंद्रों पर कांग्रेस वाम गठबंधन के प्रतिनिधि ही नदारद थे। ममता बनर्जी को यह राजनीतिक उपकार याद रखना ही होगा।
बीजेपी का अति नकारात्मक अभियान भी ममता के लिए शुभ संकेत था ।जिस दिन ममता के पैर में चोट लगी तो बीजेपी ने उसकी खिल्ली उड़ाई। यहां तक कि चुनाव आयोग भी इसमें कूद पड़ा। उसने भी अप्रत्यक्ष रूप से ममता पर ही वार किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी रैलियों में दीदी! ओ दीदी के मजाहिया अंदाज़ में जब अपनी रैलियां कीं तो उनका उल्टा असर पड़ा। आमतौर पर महिलाओं और युवा मतदाताओं के बीच नरेंद्र मोदी काफी लोकप्रिय माने जाते हैं। लेकिन उनके ममता बनर्जी के इस तरह अपमान से महिलाएं आहत हुईं। बीजेपी को यह भारी पड़ा।
भारतीय जनता पार्टी ने बंगाल प्रदेश के मूल चरित्र को समझने में भूल की। हिंदुस्तान विविध संस्कृतियों और आस्थाओं वाला मुल्क है । इस राष्ट्र के लोग भी संवेदनाओं के धरातल पर अलग-अलग भावुक संसार में निवास करते हैं। प्रचार की जो शैली गुजरात के मतदाता को लुभा सकती है, वह बंगाल के वोटर को नाराज़ कर सकती है। जो खांटी अंदाज़ उत्तर प्रदेश के देसी मतदाता को ठीक लग सकता है ,वह पुद्दुचेरी के मतदाता को खफा कर सकता है।
भारतीय जनता पार्टी के नियंताओं में इस सियासी परिपक्वता की कमी रही। उन्हें अब अटल बिहारी वाजपेई और लाल कृष्ण आडवाणी की शैली पर ही लौटना पड़ेगा।इसके अलावा बीजेपी को उधार के सिंदूर पर भरोसा करने का कुटैव छोड़ देना चाहिए ।किसी पार्टी के भीतर सेंध लगाकर या उसके नेताओं को ख़रीदकर अपनी पार्टी में लाने की आदत लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाती है ।प्रतिपक्ष में फूट डालो और अपनी ओर मिलाओ ,यही तो अंग्रेज करते थे। बांटो और राज करो वाली शैली अब बासी हो चुकी है।
कुल मिलाकर बंगाल का चुनाव सिर्फ़ राजनीतिक दलों के लिए एक सबक है, बल्कि लोकतंत्र की सेहत को भी एक चेतावनी है ।कोरोना काल में क्रूर तथा अमानवीय रवैया आम अवाम को पसंद नही आया। बंगाल के चुनाव ने बीजेपी को यह संदेश दे दिया है कि चौबीस घंटे चुनावी मोड में रहना किस हद तक खतरनाक हो सकता है।
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