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बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 : रिकॉर्ड मतदान की वजह और किसकी होगी फतह?
सार
बंगाल में आखिर रिकॉर्ड तोड़ मतदान के मायने क्या हैं? पहले दोनों मुख्य दलों के बयान पर नजर डालते हैं। टीएमसी ने प्रधानमंत्री मोदी के इस दावे का खंडन किया है कि बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में भारी मतदान, परिवर्तन के लिए शानदार जनादेश का संकेत है।
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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव
- फोटो : ANI
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विस्तार
बंगाल के 16 जिलों के 152 सीटों पर पहले चरण में 91.74 फीसदी मतदान से हर कोई चकित है। आम आदमी से लेकर राजनीतिक विश्लेषक और सत्तापक्ष से लेकर प्रतिपक्ष तक। हर कोई अंदाजा लगाने की कोशिश कर रहा है कि आखिर इसकी वजह क्या है? इसका लाभ किसको मिलेगा?
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मतदान के दौरान अक्सर देखा जाता है कि सुबह और देर शाम मतदान में तेजी आती है। दोपहर में मतदान धीमा होता है। बंगाल के पहले चरण में लेकिन यह किसी भी जिला में देखने को नहीं मिला। सुबह 7 बजे से मतदान शुरू होने के बाद हर 2 घण्टे के प्रतिशत पर गौर करें तो रफ्तार कमोबेश बराबर था। मतदान के रफ्तार में विशेष फर्क देखने को नहीं मिला।
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16 जिलों में दार्जीलिंग और कुर्सियांग इन दो जिलों को छोड़कर शेष सभी 14 जिलों में 90 फीसदी से अधिक मतदान हुआ है। कूचबिहार 95.5, दक्षिण दिनाजपुर 95.36, बीरभूम 94.42, जलपाईगुड़ी 94.37, उत्तर दिनाजपुर 93. 88, मालदा 93.74, मुर्शिदाबाद 93.47, झारग्राम 92.11, पश्चिम मिदनापुर 92.09, अलीपुरद्वार 92.00, बांकुड़ा 91.92, पूर्वी मिदनापुर 90.83, पुरुलिया 90.54 और पश्चिम बर्दवान में 90.20 फीसदी मतदान।
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2021 के विधानसभा चुनाव से यदि तुलना करें तो जंगल महल इलाके में 3.33 से 6.27 फीसदी, उत्तर बंगाल के जिलों में औसतन 10 फीसदी और मुस्लिम बहुल जिलों में 11.60 से 14.03 फीसदी अधिक मतदान हुआ है। बंगाल में जहां कुल 91.74 फीसदी मतदान हुआ है वहीं महिलाओं का मतदान प्रतिशत 92.69 है।
मतदान अधिक होने के मायने
मतदान का अधिक होने की एक वजह मतदाताओं की संख्या कम होना भी है। थर्ड जेंडर का मतदान फीसदी 56.79 है, इससे थर्ड जेंडर की संख्या बढ़ नहीं जाती है। बल्कि थर्ड जेंडर के कम मतदाता होने के कारण यह आंकड़ा देखने को मिल रहा है। मार्के की बात तो यह है कि चार अन्य राज्यों में भी मतदान फीसदी कम नहीं हुआ है। एसआईआर के बाद मतदान फीसदी बढ़ना वाजिब है। गुजरात और महाराष्ट्र के उपचुनावों में मतदान फीसदी कम है, इसकी वजह एसआईआर का अभी तक नहीं होना भी है।
बंगाल में आखिर रिकॉर्ड तोड़ मतदान के मायने क्या हैं? पहले दोनों मुख्य दलों के बयान पर नजर डालते हैं। टीएमसी ने प्रधानमंत्री मोदी के इस दावे का खंडन किया है कि बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में भारी मतदान, परिवर्तन के लिए शानदार जनादेश का संकेत है। टीएमसी का दावा है कि इसके बजाय यह मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी सरकार के विकास कार्यों के लिए जोरदार समर्थन है।
टीएमसी का मानना है कि मतदान प्रतिशत में हुई वृद्धि सत्तारूढ़ पार्टी के पक्ष में निर्णायक रूप से गई है और यह बीजेपी को स्पष्ट रूप से खारिज किये जाने का संकेत है। बीजेपी भारी मतदान को ठीक से नहीं समझ पा रही है। यह बदलाव के लिए वोट नहीं है, बल्कि ममता बनर्जी के शासन का जोरदार समर्थन है। बंगाल की जनता ने पहले चरण में ही बीजेपी की कमर तोड़ दी है।
पहले चरण में ट्रिब्यूनल द्वारा वैध घोषित मतदाताओं की संख्या मात्र 139 है। लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी के निपटारे के लिए जजों ने केवल 657 मामलों का निपटारा किया जिनमें 139 को मंजूरी दी और 8 के नाम हटाए गए। तार्किक विसंगतियों के कारण हटाए गए लोगों की कुल संख्या 27.10 लाख में से लगभग 14 लाख लोग पहले चरण के मतदाता थे।
क्या है विशेषज्ञों की राय
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मृत और स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाने सहित मतदाता सूचियों में सुधार के कारण मतदान में वृद्धि अपेक्षित थी। बिहार में भी हमने ऐसा ही पैटर्न देखा, जहां मतदान प्रतिशत में काफी वृद्धि हुई, लेकिन सरकार नहीं बदली।
एसआईआर के दौरान नाम हटाए जाने से मतदाताओं की संख्या में लगभग 12 प्रतिशत की कमी आई है, जो इसका सबसे बड़ा कारण है। विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा संकलित आंकड़ों के अनुसार हटाए गए लोगों में से लगभग 34 प्रतिशत मुस्लिम हैं।
दरअसल, एसआईआर के बाद बड़ी मशक्कत से अपने मताधिकार को हासिल करनेवालों ने हर कीमत पर ईवीएम तक अपनी पहुंच सुनिश्चित की। भारी गर्मी के बावजूद महिलाओं, प्रवासी मजदूरों समेत हर मतदाता ने अपने अधिकार का प्रयोग किया। यह चुनाव उनके लिए अपनी अस्मिता की रक्षा ही नहीं बल्कि अपने अधिकारों को बरकरार रखने का संघर्ष बन गया।
अल्पसंख्यक मतदाताओं की सोच
खासकर, मुस्लिम बहुल जिलों में भारी मतदान से भी पता चलता है कि अल्पसंख्यक मतदाता उत्साह के कारण नहीं बल्कि इस डर से टीएमसी के पीछे एकजुट हुआ है कि विभाजित वोट बीजेपी को फायदा पहुंचा सकता है। अल्पसंख्यक मतदाताओं में यह भावना बढ़ रही है कि वे टीएमसी से चाहे कितने भी असंतुष्ट क्यों न हों, वे अपने वोट को बंटने नहीं दे सकते, जिससे कि बीजेपी को फायदा हो।
बहरहाल, अल्पसंख्यक बहुल जिलों में एसआईआर ने न केवल चिंता पैदा की है, बल्कि समुदाय को एकजुट करने का भी काम किया है। बीजेपी के घोषणापत्र में सत्ता में आने के छह महीने के भीतर समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने के वादे के बाद असुरक्षा की भावना और गहरी हो गई है।
अल्पसंख्यक संगठनों ने इसे मुस्लिम पर्सनल लॉ और पहचान में हस्तक्षेप का प्रयास बताया है। एसआईआर में नाम को काटे जाने और यूसीसी के वादे के बाद मतदान में वृद्धि स्वाभाविक है। फ़तह किसकी होगी इसके लिए 4 मई तक इंतजार करना होगा!
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