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बंगाल विधानसभा चुनाव 2021: कभी लाल किला रहे जादवपुर की सीट बचा सकेगी माकपा?

Prabhakar Mani Tewari प्रभाकर मणि तिवारी
Updated Fri, 09 Apr 2021 10:28 AM IST
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जादवपुर कोलकाता की उन चंद सीटों में से है जहां मुकाबला तितरफा है।
जादवपुर कोलकाता की उन चंद सीटों में से है जहां मुकाबला तितरफा है। - फोटो : ANI- File Photo

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क्या माकपा पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में दशकों तक अपना लाल किला रहे जादवपुर सीट को बचा सकेगी? चौथे चरण में 10 अप्रैल को इस सीट के लिए मतदान से पहले राजनीतिक हलकों में यही सवाल पूछा जा रहा है। इस इलाके में स्थित जादवपुर विश्वविद्यालय को कोलकाता को जेएनयू कहा जाता है। यह विवि वामपंथियों का गढ़ रहा है और अब भी यहां उसकी पकड़ ही ज्यादा मजबूत है।
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साठ के दशक के बाद ही यह इलाका वामपंथियों का मजबूत किला रहा है। वर्ष 2011 में मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य का इस सीट से हारना एक अपवाद था। उसके बाद वर्ष 2016 में माकपा ने दोबारा इस पर कब्जा कर लिया था। अब चुनाव के मौके पर एक बार फिर यह सवाल उठ रहा है कि क्या पार्टी अपने इस मजबूत किले को बचा सकेगी जिसे किसी दौर में कोलकाता का लेनिनग्राद कहा जाता था।


माकपा इस एकमात्र सीट को बचाने के लिए मैदान में
माकपा जहां कोलकाता में अपनी इस एकमात्र सीट को बचाने के लिए मैदान में है वहीं तृणमूल कांग्रेस उससे यह सीट छिनने का प्रयास कर रही है। वर्ष 2016 में माकपा ने यहां जीत हासिल की थी, लेकिन वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल की मिमी चक्रवर्ती को इस विधानसभा क्षेत्र में 12 हजार से ज्यादा वोटों की बढ़त मिली थी। दूसरी ओर, भाजपा भी माकपा और तृणमूल के बीच वोटों के विभाजन से फायदा उठा कर इस सीट पर कब्जा करने का सपना देख रही है।

जादवपुर कोलकाता की उन चंद सीटों में से है जहां मुकाबला तितरफा है। वर्ष 2016 में पूर्व मुख्य सचिव और तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार मनीष गुप्ता को हरा कर यह सीट जीतने वाले माकपा के सुजन चक्रवर्ती ने अबकी बेरोजगारी, ईंधन की बढ़ती कीमतों और राज्य में कानून व व्यवस्था की स्थिति को अपना प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया है। वह कहते हैं, “राज्य के दूसरे हिस्सों की तरह जादवपुर के लोग भी राजनीतिक तौर पर काफी जागरूक हैं। लोगों को भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के खतरे का अहसास है। इसलिए वे इस बार भी संयुक्त मोर्चा का ही समर्थन करेंगे।” चक्रवर्ती के मुताबिक, आम वोटर यह समझ गया है कि राज्य में राजनीतिक माहौल काफी प्रदूषित हो चुका है। लोग बेहतर भविष्य चाहते हैं। खेला होबे का नारा देने वाले पहले ही अपनी हार कबूल कर चुके हैं।

करीब 2.69 लाख वोटरों वाले जादवपुर में ऐसे लोगों की बहुतायत है जिनके पूर्वज देश की आजादी के बाद तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान और फिर बांग्लादेश से आकर यहां बसे हैं। सीमा पार से आने वाले शरणार्थियों में उपेक्षा के अहसास ने ही उनको वाममोर्चा के करीब पहुंचाया था। वर्ष 1967 में संयुक्त मोर्चा की पहली सरकार को भी इलाके के वोटरों का भारी समर्थन मिला था। उसके बाद से ही यह इलाका वाममोर्चा का गढ़ बन गया। पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य यहां से पांच बार जीत चुके हैं।
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