बंगाल विधानसभा चुनाव 2021: कभी लाल किला रहे जादवपुर की सीट बचा सकेगी माकपा?
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
क्या माकपा पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में दशकों तक अपना लाल किला रहे जादवपुर सीट को बचा सकेगी? चौथे चरण में 10 अप्रैल को इस सीट के लिए मतदान से पहले राजनीतिक हलकों में यही सवाल पूछा जा रहा है। इस इलाके में स्थित जादवपुर विश्वविद्यालय को कोलकाता को जेएनयू कहा जाता है। यह विवि वामपंथियों का गढ़ रहा है और अब भी यहां उसकी पकड़ ही ज्यादा मजबूत है।
साठ के दशक के बाद ही यह इलाका वामपंथियों का मजबूत किला रहा है। वर्ष 2011 में मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य का इस सीट से हारना एक अपवाद था। उसके बाद वर्ष 2016 में माकपा ने दोबारा इस पर कब्जा कर लिया था। अब चुनाव के मौके पर एक बार फिर यह सवाल उठ रहा है कि क्या पार्टी अपने इस मजबूत किले को बचा सकेगी जिसे किसी दौर में कोलकाता का लेनिनग्राद कहा जाता था।
माकपा इस एकमात्र सीट को बचाने के लिए मैदान में
माकपा जहां कोलकाता में अपनी इस एकमात्र सीट को बचाने के लिए मैदान में है वहीं तृणमूल कांग्रेस उससे यह सीट छिनने का प्रयास कर रही है। वर्ष 2016 में माकपा ने यहां जीत हासिल की थी, लेकिन वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल की मिमी चक्रवर्ती को इस विधानसभा क्षेत्र में 12 हजार से ज्यादा वोटों की बढ़त मिली थी। दूसरी ओर, भाजपा भी माकपा और तृणमूल के बीच वोटों के विभाजन से फायदा उठा कर इस सीट पर कब्जा करने का सपना देख रही है।
जादवपुर कोलकाता की उन चंद सीटों में से है जहां मुकाबला तितरफा है। वर्ष 2016 में पूर्व मुख्य सचिव और तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार मनीष गुप्ता को हरा कर यह सीट जीतने वाले माकपा के सुजन चक्रवर्ती ने अबकी बेरोजगारी, ईंधन की बढ़ती कीमतों और राज्य में कानून व व्यवस्था की स्थिति को अपना प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया है। वह कहते हैं, “राज्य के दूसरे हिस्सों की तरह जादवपुर के लोग भी राजनीतिक तौर पर काफी जागरूक हैं। लोगों को भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के खतरे का अहसास है। इसलिए वे इस बार भी संयुक्त मोर्चा का ही समर्थन करेंगे।” चक्रवर्ती के मुताबिक, आम वोटर यह समझ गया है कि राज्य में राजनीतिक माहौल काफी प्रदूषित हो चुका है। लोग बेहतर भविष्य चाहते हैं। खेला होबे का नारा देने वाले पहले ही अपनी हार कबूल कर चुके हैं।
करीब 2.69 लाख वोटरों वाले जादवपुर में ऐसे लोगों की बहुतायत है जिनके पूर्वज देश की आजादी के बाद तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान और फिर बांग्लादेश से आकर यहां बसे हैं। सीमा पार से आने वाले शरणार्थियों में उपेक्षा के अहसास ने ही उनको वाममोर्चा के करीब पहुंचाया था। वर्ष 1967 में संयुक्त मोर्चा की पहली सरकार को भी इलाके के वोटरों का भारी समर्थन मिला था। उसके बाद से ही यह इलाका वाममोर्चा का गढ़ बन गया। पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य यहां से पांच बार जीत चुके हैं।
यहां से हार गए थे बुद्धदेव भट्टाचार्य
वर्ष 2011 में बदलाव की लहर पर सवार होकर पूर्व मुख्य सचिव मनीष गुप्ता ने तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को यहां 16 हजार वोटों को अंतर से पराजित किया था। लेकिन पांच साल बाद ही वे माकपा के सुजन चक्रवर्ती से 15 हजार वोटों के अंतर से हार गए थे। तृणमूल कांग्रेस ने इस बार यहां पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट देवब्रत मजुमदार को मैदान में उतारा है जो चार बार कोलकाता नगर निगम के पार्षद रह चुके हैं।
मजुमदार कहते हैं, “20 साल तक पार्षद रहने के दौरान मैंने इलाके में कई विकास योजनाएं लागू की हैं। स्थानीय लोगों से मेरा नजदीकी संबंध हैं। मुझे अपने काम के आधार पर जीत का भरोसा है।” दूसरे इलाकों की तरह जादवपुर में भी पार्टी अपनी सरकार की तमाम योजनाएं और उपलब्धियां गिना रही हैं। उनका कहना है कि पहले जो लोग इलाके में माकपा के साथ थे वही अब भाजपा में शामिल हो गए हैं। वाम अब यहां राम हो गया है। लोग उसका चाल-चरित्र समझ चुके हैं।
भाजपा ने माकपा छोड़ कर पार्टी में शामिल होने वाली रिंकू नस्कर को यहां टिकट दिया है। रिंकू कहती हैं-“बंगाल के लोगों ने इस बार बदलाव का मन बना लिया है। मैं इस इलाके में दस साल तक पार्षद रही हूं। लोग मेरा काम जानते हैं।” उनका कहना है कि इन चुनावों में बेरोजगारी और विकास ही सबसे बड़ा मुद्दा है। राज्य में नए उद्योग नहीं लग सके हैं और सरकारी नौकरियों के लिए लोगों को मोटी कट मनी देनी पड़ती है।
पांच साल से विपक्ष का विधायक होने की वजह से इलाके में विकास परियोजनाओं की गति धीमी हुई है और लोगों को पेय जल जैसी कई गंभीर समस्याओं से जूझना पड़ रहा है। यही वजह है कि इलाके के वोटरों में माकपा के प्रति सहानुभूति साफ झलकती है।
जादवपुर विश्वविद्यालय के सामने फुटपाथ पर एक स्टाॅल चलाने वाले मनोज दास कहते हैं, “सुजन चक्रवर्ती ने लॉकडाउन के दौरान इलाके के लोगों की काफी सहायता की थी। उस दौरान पार्टी की ओर से शुरू की गई श्रमजीवी कैंटीन के जरिए गरीबों को मामूली कीमत पर भरपेट भोजन मुहैया कराया गया था।” एक रिटार्यड शिक्षक मोहन दलुई कहते हैं, “वाममोर्चा सरकार के दौर में इलाके में तेजी से विकास हआ था। खुद मुख्यमंत्री इस सीट से विधायक थे। लेकिन बीते एक दशक से तमाम परियोजनाएं या तो ठप हैं या फिर बहुत धीमी गति से चल रही हैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।