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प्रदूषण कथा-3: हवा ही जहरीली नहीं, नाश्ते-लंच की प्लेट में भी मिलावट है.!

Thu, 15 Nov 2018 02:18 PM IST
Updated Thu, 15 Nov 2018 02:18 PM IST
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water and air pollution adulterated food items Delhi pollution
प्रकृति का एक नियम है कि हम उसे जो देंगे, वह हमें किसी न किसी रूप में उसे लौटा देगी। - फोटो : File Photo

प्रकृति का एक नियम है कि हम उसे जो देंगे, वह हमें किसी न किसी रूप में उसे लौटा देगी। जो खायेंगे, पखाने के रूप में वही तो वापस मिट्टी में मिलेगा। सभी जानते हैं कि हमारे उपयोग की वस्तुएं जितनी कुदरती होंगी, हमारा पर्यावरण उतनी ही कुदरती बना रहेगा; बावजूद इसके दिखावट, सजवाट और स्वाद के चक्कर में हम अपने खपत सामग्रियों में कृत्रिम रसायनों की उपस्थिति बढ़ाते जा रहे हैं।

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गौर कीजिए कि कुदरती हवा को हम सिर्फ धुआं उठाकर अथवा शरीर से बदबूदार हवा छोड़कर खराब नहीं करते; ऐसी हज़ारों चीजें और प्रक्रियाएं हैं, जिनके जरिये हम कुदरती हवा में मिलावट करते हैं। जिस भी चीज में नमी है; तापमान बढ़ने पर वह वाष्पित होती ही है। वाष्पन होता है तो उस चीज की गंध तथा अन्य तत्व हवा में मिलते ही हैं। होठों पर लिपस्टिक, गालों में क्रीम-पाउडर, बालों में मिनरल ऑयलयुक्त तेल-शैंपू-रंग, शरीर पर रासायनिक इत्र..अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में कृत्रिम रसायन की ऐसी चीजों की सूची बनाइये। फिर सोचिए कि धुएं के अलावा हम कितनी चीजों के जरिये भी हवा में मिलावट करते हैं। 

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दूध-घी तो छोड़िए, जानवरों का चारा तक प्राकृतिक नहीं रहा। - फोटो : File Photo

कुदरती की गारंटी देना मुश्किल
भोजन पर निगाह डालिए। नाश्ते-लंच के हमारे मीनू में तसल्ली से बने घर के भोजन से ज्यादा 'रेडी टु ईट' शामिल हो गया है। घर में बनायें तो भी गारंटी नहीं। सब्जी है तो रंगी हुई; दवा छिड़कर कीड़ों से बचाई हुई। दाल है तो पॉलिश की हुई; आम है तो कार्बेट से पकाया हुआ, तेल है तो रसायन डालकर रिफाइंड किया हुआ। दूध-घी तो छोड़िए, जानवरों का चारा तक प्राकृतिक नहीं रहा।

अंग्रेजी दवा पद्धति ने बाजार के साथ मिलकर देशी-कुदरती भारतीय दवा पद्धतियों से हमें दूर कर दिया है। नैचुरल और हर्बल टेग के साथ आ रहे बाजारू सामान ही नहीं, खुद अपने खेतों के बोई फसल को अब आप पूरी तरह प्राकृतिक नहीं कह सकते। हरित क्रांति ने भारत के गोदाम भरे, लेकिन उपज के प्राकृतिक होने की गारंटी छीन ली। हमने मिट्टी तो मिट्टी, जल-वायु तक में मिलावट की है। 


इधर, नदियों, तालाबों और धरती की शिराओं में जल के कुदरती होने की गारंटी तो हम कब की छिन चुके। इस छीन ली गई गारंटी का नतीजा यह है कि अब हम इस बात की गारंटी कतई नहीं दे सकते कि ताकत और पौष्टिकता के नाम पर खाया-खिलाया गया पदार्थ हमें सेहतमंद ही बनायेगा। फलों-मेवों में छिपकर बैठे कृत्रिम रसायन हमारे शरीर में घुसकर हमारे शरीर का खेल बिगाड़ देंगे; यह आशंका अब हरदम है। खुली हवा में सांस लेना अब स्वस्थ बनाने से ज्यादा, बीमार बनाने का नुस्खा हो गया है। 

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सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हम चाहकर भी अपने खान-पान, सांस-हवा को कुदरती नहीं बना पा रहे। - फोटो : File Photo

क्यों मुश्किल है कुदरती हवा?
सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हम चाहकर भी अपने खान-पान, सांस-हवा को कुदरती नहीं बना पा रहे। ऐसा क्यों है ? ऐसा इसलिए है क्योंकि हम न इलाज पर ठीक से ध्यान दे रहे है और न रोकथाम पर। मीडिया में  कहा गया कि सबसे बड़ा खतरा तो फसलों के अवशेष जलाने से है। फसल कटने के बाद अवशेष को जलाने पर रोक भी लगा दी गई। किसान कहते हैं कि हाथ से कटाई मंहगी, मुश्किल और अधिक समय खाने वाली होती जा रही है। 

डिजायन करने वालों ने कटाई मशीनें ऐसी डिजायन की हैं, जिनसे भूसा-पुआल कम मिलता है और धान-गेहूं की ज्यादा डंठल खेत मे ज्यादा छूट जाती है। उसे सड़ाने के लिए पर्याप्त पानी भी चाहिए और समय भी। यदि धान की फसल देर से तैयार हो और उसी खेत में अगली फसल बोने का समय निकला जा रहा हो, तो बचे हुए को खेत में सड़ाना संभव नहीं होता, इसलिए फसलों के बचे हुए को जलाने की मजबूरी है।

दूसरी मज़बूरी समझिए। खेतों में नये-नये तरह के खर-पतवार ज्यादा पैदा हो रहे हैं। किसान या तो उन्हे जलाये या फिर रसायन छिड़क कर नष्ट कर दे। दोनो ही तरीके कुदरती नहीं हैं। तीसरी मज़बूरी यह है कि अलाव जलाये बगैर गांव मे ठंड काटना मुश्किल है। चूल्हे के लिए सबसे सहज, सुलभ और स्वावलंबी ईंधन अभी भी लकड़ी-उपला ही हैं। इसे अचानक रोका नहीं जा सकता। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.
 

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पूरी दुनिया इस वक्त बढ़ते प्रदूषण से परेशान है। दिल्ली हो या बीजिंग। - फोटो : Getty

यह सही है कि ये सब हवा में मिलावट के काम हैं। कुदरती होना ही गांवों का गुण है और शक्ति भी। गांव की इस शक्ति का क्षरण होना शुरू हो चुका है। इसे नकार नहीं सकते। किंतु यहां यह भी सही है कि गांववासी हवा में जितनी मिलावट करते हैं, उससे कहीं ज्यादा उसकी कुदरती तत्व अपनी हरी-हरी फसलों और बागीचों के जरिये हवा को लौटा देते है। अतः जरूरी है कि गांव क्या कर सकता है; उसे बतायें, लेकिन इस उपदेश की आड़ में एयरकंडीशनर, फ्रिज, गर्म धुंआ छोड़ते वाहनों, उद्योगों, नदियों-झीलों में मिलावट के जरिये हवा में मिलावट करने वाली बजबजाती नालियों, ठोस कचरायुक्त नालों और बांधों के जलाश्यों जैसे बड़े मिलावटखोरों को भूल न जायें। इन ज्यादा खतरनाक मिलावटखोरों पर रोक का दिखावा ज्यादा है, संजीदा कोशिश कम। यही वजह है कि हवा को हम कुदरती बनाने की दिशा में आगे नहीं बढ़ पा रहे। 

हमारे बाज़ार, हमारी जीवनशैली, हमारी तात्कालिक जरूरतें, हमारी सरकारें, हम खुद.....निस्संदेह, चुनौतियां बहुत हैं। खेती, माटी, जल, हवा को फिर से 100 फीसदी कुदरती बनाना इतना आसान नहीं है। आदम युग में लौटा नहीं जा सकता। किंतु किसी एक पहलू से व्यापक शुरुआत तो की जा सकती है। सिक्किम ने पहल कर दी है; हम भी करें। किसानों को भी चाहिए कि वे सरकार की ओर ताकने की बजाय, 'अपना बीज, अपनी खाद, अपनी दवाई, अपना चारागाह, अपना तालाब' बचाने के काम खुद शुरु करे। पंचायतों  को इसके सामूहिक प्रयास शुरू करने चाहिए।

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