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विश्वकर्मा जयंती विशेष: 'इंजीनियरिंग दिवस' के रूप में भी मनाया जाता है यह दिन

Sat, 17 Sep 2022 12:29 PM IST
Mohan singh मोहन सिंह
Updated Sat, 17 Sep 2022 12:29 PM IST
सार

वैदिक ऋषियों की एक विशेषता रही है कि ऐसे देवता, जिनकी भूलोक से स्वर्गलोक तक व्याप्ति है,उनकी प्रतिष्ठा में हवि प्रदान करना, उन्हें प्रसन्न करने हेतु प्रार्थना निवेदित करना ऋषि अपना अहोभाग्य मानते हैं और दूसरों के कल्याण के लिए किये उपाय के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं।

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vishwakarma puja 2022 Vishwakarma Jayanti is also celebrated as Engineering Day
भगवान विश्वकर्मा ने भव्य और सुरक्षित महलों के साथ देवताओं के उड़ने वाले रथों का निर्माण भी किया था। - फोटो : istock

विस्तार

विश्वकर्मा किसे कहते हैं? "विश्वं कृत्यस्नं वयापारो वा यस्य सः" अर्थात् जिसकी सम्यक सृष्टि व्यापार है, वहीं विश्वकर्मा है। विश्कर्मा वैदिक देवता हैं, पर उनका पौराणिक कथाओं में जो वर्णन मिलता है, वह कुछ अलग है। ऋग्वेद में ग्यारह ऋचाओं में विश्कर्मा की स्तुति मिलती है। यजुर्वेद के सत्रहवें अध्याय में सोलह से इक्कतीस ऋचाओं में उसका दुहराव है। इस अध्याय के अठारहवीं ऋचा में बतया गया है कि-परमात्मा किस अधिष्ठान पर आरम्भ में अधिष्ठित थे? इनकी उत्पत्ति की क्या कथा है? वह भूमि पर उत्पन्न हुआ। विश्वकर्मा सारे विश्व के द्रष्टा है। स्वर्गलोक तक व्याप्त है।

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वैदिक ऋषियों की एक विशेषता रही है कि ऐसे देवता, जिनकी भूलोक से स्वर्गलोक तक व्याप्ति है,उनकी प्रतिष्ठा में हवि प्रदान करना, उन्हें प्रसन्न करने हेतु प्रार्थना निवेदित करना ऋषि अपना अहोभाग्य मानते हैं और दूसरों के कल्याण के लिए किये उपाय के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं। यजुर्वेद के सत्रहवें अध्याय के बाइसवें ऋचा में कहा गया है-
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विश्वकर्मन् हविषा वावृधान: स्वयं यजस्व पृथ्वीमुत घाम्
मुह्यन्त्वन्ये अभित: सपत्नाs इहास्माकं मघवा सुरिरस्तु..


(हे विश्वकर्मा! हम हवि से आपकी बढ़ोतरी करते हैं। आप स्वंम यज्ञ कीजिए। आप पृथ्वी के हित के लिए यज्ञ कीजिए। आप हमारे शत्रुओं को मोहित कीजिए। आप यहां ज्ञानवान सूर्य स्वरूप है।)

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उसी अध्याय के चौबीसवीं ऋचा में विश्वकर्मा को विश्व का रचयिता बताते हुए ऋष गण विश्कर्मा के प्रति प्रणति निवेदन करते हैं-
 

विश्वकर्मन् हविषा वर्धनेन त्रातारमिन्दरकृणोरवध्यम्
तस्मै विश: समनमन्त पूर्वीरयमुग्रो विहव्यो यथा सत्..


(आप विश्व के रचयिता हैं। आपने हवियों से इंद्र देव की बढ़ोतरी किया। आपने इंद्र देव को संसार का रक्षक बनाया। आपने इंद्रदेव को अवध्य बनाया। इन्द्र देव को मन से नमस्कार करते हैं।हम उन्हें( झुककर) नमस्कार करते हैं। इंद्र देव अपूर्व, उग्र और सर्वसमर्थ हैं।)

सात ऋषियों का अद्धितीय सहयोग

अगली ऋचा में विश्वकर्मा के बारे में बताया गया है कि- आपने जग की रचना में सृष्टि के रचयिता के साथ सात ऋषियों ने अद्धितीय सहयोग किया। वह परम शक्ति एक है। धाता हैं, विधाता हैं। पोषक हैं, सर्वश्रेष्ठ हैं। उनकी कृपा से सभी इष्ट काम पूर्ण होते हैं। वे हवि से प्रसन्न होते हैं। उपरोक्त वैदिक ऋचाओं के वर्णन से एक बात साफ होती है कि हमारे ऋषियों ने सृष्टि के सृजनकर्ता- शिल्पकार के रूप में भगवान विश्वकर्मा के प्रति प्रणति निवेदन किया है। 

प्राचीन काल से ब्रम्हा-विष्णु और महेश के साथ विश्कर्मा की पूजा-आराधना का प्रावधान हमारे ऋषियों-मुनियों ने किया हैं। हर साल 17 सितंबर को अपने देश में विश्कर्मा की पूजा- अर्चना" देवौ सौ सूत्रधार: जगदखिलहित: ध्यायते सर्वस्तवै" के द्वारा की जाती है। 'विश्वकर्माप्रकाश' जिसे वास्तुतंत्र भी कहा गया है, विश्वकर्मा को वास्तु के अठारह उपदेष्टाओं में प्रमुख देवता माना गया है। 

'मत्स्य पुराण' में उन्हें प्रभाष का पुत्र, शिल्प प्रजापति, मन्दिर, भवन, देवमूर्ति, जेवर, तालाब बावड़ी और कुएं के निर्माण का देव कहा गया है। जातक कथाओं से हमें जानकारी प्राप्त होती हैं कि-नाई, बढ़ई, धोबी, रंगरेज, जाल बुनने वाले पेशेवर लोगों की गणना शिल्पियों के रूप में की गयी हैं और उनके कार्य को शिल्प कहा गया है। यह समुदाय आज भी विश्कर्मा की पूजा शिल्पकार रूप में करता हैं।

vishwakarma puja 2022 Vishwakarma Jayanti is also celebrated as Engineering Day
विश्कर्मा जयन्ती 'श्रमशील समुदाय' की प्रतिष्ठा स्थापित करने की भी जयन्ती है। - फोटो : istock

वास्तुकला का प्रमुख स्थान

अपने शास्त्रीय ग्रंथों में जिन चौसठ कलाओं की चर्चा की गई है, उसमें वास्तुकला का भी प्रमुख स्थान है। यह कला भवन निर्माण से सम्बंधित है। मूर्ति कला में मां लक्ष्मी की मूर्ति और भगवान शिव की नटराज की मूर्ति को आज भी मूर्ति कला का सर्वश्रेष्ठ नमूना माना जाता है। इतिहासविद और कला विशेषज्ञ कुमार आनंद स्वामी कहते है कि" कला जीवन का अभिन्न अंग है। कला का आसन बहुत ही ऊंचा है और उतना जरूरी भी जितना साहित्य, धर्म, आधात्म और दर्शन का।"
 

इसलिए हम कला की उपासना के बहाने दरअसल कलाकार की ही उपासना कर रहें होते हैं, जिसकी वे कृतियाँ हैं। भगवान विश्वकर्मा का स्मरण भी इस लिहाज से भी हर साल 'श्रमशील संस्कृति' की ही उपासना है। मनीषी इतिहासकार वासुदेव शरण अग्रवाल बताते है कि-"एक चतुर शिल्पी जिस पाषाण खंड को अपने कौशल से छू देता है वही सौंदर्य का प्रतीक बन जाता है और उसी में से रस का अक्षय सोता फूट जाता है।


भौतिक उपकरणों को ऐसे रूप में ढ़ालना कि वे प्रतिक्षण सौंदर्य और रमणीयता के अर्थ हमारे सामने प्रकट करते रहें संस्कृति का स्वाभाविक अंग और सभ्यता की अनिवार्य विशेषता मानी गयी है।" इसी अर्थ में बाणभट्ट ने अजंता की कला को त्रिलोक का संपुंजन कहा है, अर्थात् तीनों लोक में जितने चर-अचर प्राणी हैं उन सबके लिए कला का द्वार खुला है।

परवर्ती काल में ऐसे हर उस कलाकार के शिल्प इंजीनियरिंग और डिजाइन को 'विश्वकर्मा की कृति' बताया जाने लगा जो अपने अनुपम सौंदर्य और जनकल्याण में बेजोड़ साबित हुआ है। आधुनिक काल में ऐसा ही एक नाम है- मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का। भारत सरकार ने देश के लिए उनकी इंजीनियरिंग के क्षेत्र में किये गये योगदान के लिए सर्वोच्च सम्मान 'भारत रत्न'से नवाजा। वे ऐसे इंजीनियर थे जिन्होंने बिना सीमेंट का उपयोग किये पूरा बांध तैयार कर दिया।

'इंजीनियरिंग दिवस'

उनकी जयंती 15 सितम्बर को 'इंजीनियरिंग दिवस' के रूप में मनाया जाता है। वे सचमुच आधुनिक भारत के 'विश्वकर्मा' है। सन् 1932 में उन्होंने 'कृष्ण राजा सागर' बांध के निर्माण में बड़ी भूमिका निभाई। विशश्वरैया ने सन् 1903 में पुणे के खड़कवासला जलाशय के 'ऑटोमेटिक फ्लडगेट' तैयार किया। 

इसके अलावा ग्वालियर, भोपाल, नागपुर ,गोवा कोल्हापूर, सांगली, पूरे बिहार और उड़ीसा की जल आपूर्ति प्रणालियां तैयार करवाया। आधुनिक युग में होमी भाभा, विक्रम साराभाई, जैसे न जाने कितने इंजीनियरों ने 'विश्वकर्मा रूप' में देश की उन्नति में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। आज भी दे रहे हैं। विश्कर्मा जयंती उन वैज्ञानिकों, इंजीनियरों आविष्कारकों और अनुसंधानकर्ताओं को भी स्मरण करनी की भी जयंती होनी चाहिए, जिनके बदौलत आज भारत मंगलग्रह पर जाने के उपक्रम में कामयाबी हासिल करने की स्थिति में पहुंच चुका है। 

साथ ही विश्कर्मा जयन्ती 'श्रमशील समुदाय' की प्रतिष्ठा स्थापित करने की भी जयन्ती है। आज समाज की भौतिक, नैतिक, आधात्मिक और ग्राहस्तिक इज्ज़त भी इस समुदाय के श्रम की वजह से ही बची है। यहीं नहीं कलाओं का चिरकालिक सौंदर्य भी हमारे बीच श्रमिक समुदाय की उन्नति और प्रतिष्ठा से ही कायम रह सकती है। इस अर्थ में विश्कर्मा जयन्ती को 'श्रम शक्ति सम्मान' दिवस के रूप में मनना सर्वथा उपयुक्त होगा।

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण):
यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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