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नजरिया: टैरिफ की उथल-पुथल भरी यात्रा, ट्रंप की जिद में सीमित दिखते हैं भारत के विकल्प

Sun, 01 Mar 2026 08:34 AM IST
Palaniappan Chidambram पी. चिदंबरम
Updated Sun, 01 Mar 2026 08:34 AM IST
सार

भारत-अमेरिका के बीच टैरिफ विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है। ट्रंप की जिद को देखते हुए ऐसा लगता है कि भारत के पास सीमित विकल्प हैं। ऐसे में हमें एक उतार-चढ़ाव भरी यात्रा के लिए तैयार रहना होगा।

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Viewpoint: India's options appear limited by Trump's stubbornness, amid a turbulent tariff journey.
टैरिफ की उथल-पुथल भरी यात्रा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 2 अप्रैल, 2025 को अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियां अधिनियम (आईईईपीए) के तहत लगाए गए 'प्रतिशोधात्मक' टैरिफ को रद्द कर दिया। अदालत के इस फैसले पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने क्रोध में तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की आलोचना की। ऐसा काम अगर भारत में किया जाता तो उस व्यक्ति पर सुप्रीम कोर्ट में अवमानना की कार्यवाही की जा सकती थी। लेकिन अमेरिका में प्रथम संशोधन के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की शपथ ली जाती है, जिस वजह से न्यायाधीश अविचलित रहे।
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ट्रंप सिर्फ दुर्व्यवहार तक ही सीमित नहीं रहे। उन्होंने अन्य मौजूदा कानूनों का उपयोग करते हुए कमोबेश वही शुल्क लागू करने में जरा भी देर नहीं की:
  • व्यापार विस्तार अधिनियम, 1962 की धारा 232;
  • व्यापार अधिनियम, 1974 की धारा 301 (जिसका हवाला देते हुए राष्ट्रपति ने कई देशों के निर्यात की जांच शुरू करने की धमकी दी थी) और
  • स्मूट-हॉली टैरिफ अधिनियम, 1930 की धारा 338।
  •  

                                जहां तक भारत की बात है, फैसले के बाद लगभग सभी वस्तुओं पर लगाया गया टैरिफ 2 फरवरी, 2026 को घोषित 18 प्रतिशत के बजाय 15 प्रतिशत कर दिया गया। व्यापार विस्तार अधिनियम की धारा 232 के तहत इस्पात, एल्युमिनियम, सेमीकंडक्टर और कुछ ऑटो-पुर्जों पर 50 प्रतिशत टैरिफ लागू है। ये दरें अब भी ऊंची हैं और भारत के निर्यात को प्रभावित करेंगी। भारत सरकार ने कहा कि वह फैसले के बाद की स्थिति की समीक्षा कर रही है। हालांकि इसका तत्काल परिणाम यह हुआ कि अंतरिम समझौते के मसौदे को अंतिम रूप देने और हस्ताक्षर करने की वार्ता बिना किसी निश्चित तिथि के स्थगित कर दी गई।
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सभी असहाय
इस बात को लेकर यूएस कांग्रेस में आवाजें भी उठीं। जब तक अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप करके आईईईपीए टैरिफ को रद्द नहीं किया, तब तक कार्यपालिका द्वारा कराधान शक्तियों पर कब्जा करने के खिलाफ कांग्रेस असहाय थी। हालांकि फैसले के बाद भी स्थिति बहुत नहीं बदली, क्योंकि ट्रंप कांग्रेस से अनुमति लेने को तैयार नहीं हैं। वह यह मानते हैं कि उन्हें पहले से ही अधिकार प्राप्त हैं। कई विशेषज्ञों के अनुसार, फैसले के बाद राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा लगाए गए टैरिफ पर मुकदमे हो सकते हैं, पर उन्हें नए कानून की आवश्यकता नहीं।
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                                  हाल में समझौता करने वाले अमेरिका के व्यापारिक साझेदार भी असहाय हैं। 2 फरवरी को संयुक्त वक्तव्य पर हस्ताक्षर करने वाला भारत भी इसी स्थिति में है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमीसन ग्रीर ने संकेत दिया कि किसी देश ने समझौते से हटने की इच्छा नहीं जताई, क्योंकि ट्रंप ने चेतावनी दी है कि समझौता तोड़ने वाले देशों को कड़े टैरिफ का सामना करना पड़ेगा। राष्ट्रपति ट्रंप के लिए टैरिफ केवल कर नहीं, बल्कि हथियार हैं।

व्यापार में अव्यवस्था
मराकेश समझौते ने जीएटीटी का स्थान लिया और विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के जन्म के कारण दुनिया के देशों को नियम-आधारित व्यापार की व्यवस्था का पालन करने के लिए बाध्य होना पड़ा। मतभेद और विवाद तो थे, लेकिन विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) ने विवादों के समाधान के लिए एक विश्वसनीय मंच प्रदान किया। 1 जनवरी, 1995 के बाद से डब्ल्यूटीओ ने विश्व व्यापार में अभूतपूर्व विस्तार किया, लेकिन ट्रंप की वजह से सब कुछ उलट-पुलट हो गया है। कठोर पारस्परिक टैरिफ के खतरे को देखते हुए कई देशों ने अमेरिका के साथ व्यापार समझौते किए, बड़ी प्रतिबद्धताएं जताईं और बदले में आंशिक टैरिफ राहत प्राप्त की। पारस्परिक शुल्क व्यवस्था भले ही समाप्त हो गई हो, लेकिन अन्य कानूनों के माध्यम से वही शुल्क लागू कर दिए गए हैं। परिणामस्वरूप, उन्हें मिली रियायतें व्यर्थ हो गईं, जबकि उनकी प्रतिबद्धताएं बनी रहीं।
       
 ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा ने सही कहा कि देशों को मिलकर अमेरिका का सामना करना चाहिए। चीन को छोड़कर कोई देश अकेले अमेरिका का मुकाबला नहीं कर सकता। यह एक असमान दुनिया है और दुनिया की सबसे शक्तिशाली अर्थव्यवस्था का नेता अस्थिर और अप्रत्याशित है। भारत ने सही मायनों में राष्ट्रपति ट्रंप की इच्छा के आगे घुटने टेक दिए हैं। जापान और दक्षिण कोरिया जैसे विकसित देशों सहित कई अन्य देशों ने भी ऐसा ही किया है।


घरेलू परिदृश्य
राष्ट्रपति ट्रंप अमेरिका में अलोकप्रिय हो गए हैं। उनकी लोकप्रियता घटकर 40 प्रतिशत या उससे कम रह गई है। रोजगार की कमी, महंगाई और अप्रवासन विरोधी नीति पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। ट्रंप का आप्रवासन विरोधी रुख अमेरिका में लोकप्रिय है, लेकिन इसने भारी विरोध को जन्म दिया है, क्योंकि यह रुख मानवाधिकारों, बच्चों के अधिकारों, राज्यों की स्वायत्तता और कानून की प्रक्रिया को पूरी तरह से दरकिनार करता है। अवैध आप्रवासन का विरोध करने वाले कई अमेरिकी संघीय सरकार, विशेष रूप से इमिग्रेशन एंड कस्टम एनफोर्समेंट (आईसीई) की ज्यादतियों से बेहद आहत हैं। इन घरेलू घटनाक्रमों की वजह से ट्रंप 2026 के चुनावों में रिपब्लिकन कांग्रेस में बहुमत खो सकते हैं, जिससे ट्रंप प्रशासन ‘लेम-डक’ बन सकता है। संभव है कि तब वह नियम-आधारित व्यापार और वैश्विक संस्थाओं के सम्मान की राह पर लौटें। तब तक भारत के पास सीमित विकल्प हैं और उसे एक उतार-चढ़ाव भरी यात्रा के लिए तैयार रहना होगा।
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