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वाल्धुनी का मौन: जैव विविधता और नदी के प्राकृतिक इतिहास पर शहरीकरण के प्रभाव

Pradeep namdev chogle प्रदिप नामदेव चोगले
Updated Tue, 04 Aug 2026 04:03 PM IST
सार

Valdhuni River Kalyan Pollution: यह लेख कल्याण की ऐतिहासिक 'वाल्धुनी नदी' के समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्र और पक्षियों की विविधता को दर्शाता है। साथ ही कपड़ा उद्योगों, अवैध निर्माण और शहरीकरण के कारण हो रहे इसके भयंकर प्रदूषण और संरक्षण की जरूरत पर ध्यान आकर्षित करता है।

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Valdhuni River: A Journey from Rich Ecology and Historic Roots to Severe Chemical Pollution
वाल्धुनी नदी कल्याण - फोटो : प्रदीप नामदेव चोगले

विस्तार

Kalyan Birdwatching Ecological Indicators: 2022 में, हमने मुंबई शहर के बाहर एक शांत और बड़े घर की तलाश में, और सेवानिवृत्ति के बाद अपने माता-पिता के लिए एक शांत परिवेश की चाह में, कल्याण (पूर्व) के 'चिंचपाड़ा' में एक घर लिया। वहां रहने जाने के बाद, अपनी स्वाभाविक प्रेरणा और रुचि के कारण मैं पक्षी अवलोकन के लिए प्रतिदिन घर से बाहर निकलता था। ऐसे ही एक दिन भ्रमण के दौरान, तेजी से कंक्रीट के जंगल में बदलते और ऊंची इमारतों के निर्माण वाले इस शहर में, मुझे अपने घर से मात्र 15 मिनट की दूरी पर एक छोटी सी जलधारा दिखी, जो आगे जाकर हरे-भरे खेतों के बीच से रास्ता बनाते हुए एक बड़ा आकार लेकर प्रवाहित हो रही थी।
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कल्याण के चिंचपाड़ा, नंदिवली और माणेरे गांव की सीमाओं से होकर बहने वाली 'वाल्धुनी' नदी से यह मेरी पहली मुलाकात थी। 2022 से लेकर अब तक, जब मैं यह लेख लिख रहा हूं, मैंने इसके विविध रूपों को अनगिनत बार अनुभव किया है।
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Valdhuni River: A Journey from Rich Ecology and Historic Roots to Severe Chemical Pollution
कुछ प्रजातियां यहां की प्रकृति और नदी की स्थिति के संकेतक (indicators) के रूप में दिखाई देती हैं। - फोटो : प्रदीप नामदेव चोगले

कल्याण शहर न केवल मुंबई के पास स्थित सबसे लोकप्रिय उपनगरीय शहरों में से एक है, बल्कि इसका 2000 वर्षों से भी अधिक का एक लंबा इतिहास है। पहली शताब्दी के एक ग्रीक हस्तलेख (manuscript) 'पेरिल्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी' (Periplus of the Erythraean Sea) में इस शहर का बेहतरीन दस्तावेजीकरण किया गया है। लेकिन इस ऐतिहासिक दस्तावेज़ के अलावा, पक्षी अवलोकन (birding) और सुबह की सैर के लिए मेरे सबसे पसंदीदा स्थानों में से एक 'वाल्धुनी नदी' का किनारा है, जो प्राकृतिक इतिहास का एक छिपा हुआ खजाना है। लगभग 33 किमी लंबी यह 'वाल्धुनी नदी' उल्हास नदी की एक सहायक नदी (tributary) है, जिसका उद्गम अंबरनाथ शहर की काकोला पहाड़ियों में होता है। यह नदी विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों और जीवों को आधार प्रदान करती है।

अब तक मैंने यहां पक्षियों की लगभग 23 प्रजातियों को दर्ज किया है। उनमें से कुछ प्रजातियां यहां की प्रकृति और नदी की स्थिति के संकेतक (indicators) के रूप में दिखाई देती हैं। 'कौआ', 'कॉमन मैना' और 'कबूतर ' जैसे मानवीय बस्तियों के निकट रहने वाले पक्षियों की बड़ी संख्या शहरीकरण के बढ़ते प्रभाव को दर्शाती है। हालांकि, 'करछिया बगुला', 'जलमुर्गि' और 'ग्रीन सैंडपाइपर' जैसे जलचर पक्षियों का अस्तित्व यह सूचित करता है कि नदी का पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) अभी भी कुछ हद तक जीवित है और विभिन्न जीवों को आवास प्रदान कर रहा है। 'लाल मुनिया' और 'येलो-आइड बैबलर' जैसी प्रजातियां नदी के किनारे के प्राकृतिक घास के मैदानों के महत्व को रेखांकित करती हैं। संक्षेप में कहें तो, यह जैविक विविधता नदी के संरक्षण की तत्काल आवश्यकता को दर्शाने वाला एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिक संकेतक (Ecological Indicator) है।

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Valdhuni River: A Journey from Rich Ecology and Historic Roots to Severe Chemical Pollution
अंबरनाथ, उल्हासनगर, कल्याण और शहाड जैसे शहरों के MIDC क्षेत्रों के कई उद्योग अपना प्रदूषित पानी इसी नदी में छोड़ते हैं। - फोटो : प्रदीप नामदेव चोगले

जींस पैंट" आज की पीढ़ी का एक ऐसा पसंदीदा पहनावा है, जो लगभग हर किसी के पास होता है। लेकिन जब हम देश भर में मिलने वाली इन सस्ती जींस का उपयोग करते हैं, तो अक्सर हमें उनके मूल (origin) और निर्माण की प्रक्रिया का अंदाज़ा नहीं होता। यदि हम वाल्धुनी नदी के उद्गम से लेकर कल्याण की खाड़ी तक इसके किनारे पैदल चलें, तो हमें पुराने कपड़ों और विशेष रूप से जींस को रंगने वाले कई छोटे-बड़े लघु उद्योग और कारखाने दिखाई देंगे। मानसून में लबालब भरने वाली यह नदी, बाकी समय अक्सर डाइ (dyes) के कारण रंगीन या स्याह काली धाराओं के रूप में प्रवाहित होती है।

अंबरनाथ, उल्हासनगर, कल्याण और शहाड जैसे शहरों के MIDC क्षेत्रों के कई उद्योग अपना प्रदूषित पानी इसी नदी में छोड़ते हैं। बेला एम. नाबर और अन्य शोधकर्ताओं के 2011 के शोध पत्र के अनुसार, इस नदी के पानी में BOD (बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड) और COD (केमिकल ऑक्सीजन डिमांड) का स्तर सुरक्षित मानकों से बहुत अधिक पाया गया है। इसके साथ ही, नदी के पात्र में किए जा रहे भराव और किनारों पर होने वाले अवैध निर्माणों के कारण इसमें भारी मात्रा में मानव मल और गंदा पानी (sewage) सीधे बहाया जा रहा है। यही कारण है कि नदी में ई-कोलाई (E. coli) जैसे बैक्टीरिया का स्तर भी बहुत अधिक हो गया है, जो इस जल को स्वास्थ्य के लिए अत्यंत खतरनाक बनाता है।

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Valdhuni River: A Journey from Rich Ecology and Historic Roots to Severe Chemical Pollution
इस नदी के किनारे लहलहाती हरी-भरी धान और सब्जियों की खेती सर्दियों के कोहरे में कितनी सुखद दिखाई दे रही है। - फोटो : प्रदीप नामदेव चोगले

नदी का उद्गम, इसके आसपास की गतिविधियां, प्रदूषण और मेरे द्वारा देखी गई पक्षियों की विविधता - इन सबके बारे में अब तक आपने इस लेख में पढ़ा। अब सवाल यह है कि आगे क्या?

प्रगति और विकास के नाम पर अब हमारे गांव और शहर 'स्मार्ट' होने लगे हैं। हर जगह कंक्रीट और पेवर ब्लॉक बिछाकर हमने ज़मीन की प्राकृतिक मिट्टी की परत को लगभग नष्ट कर दिया है। शहरों और गांवों की खुली जगहों का इस्तेमाल अब केवल ऊंची इमारतें बनाने के लिए किया जा रहा है। नदी का स्वरूप अब नालों और गटर जैसा हो गया है। लेकिन यदि बढ़ते विकास के साथ मनुष्य के रूप में हमने प्रकृति के साथ अपना नाता तोड़ लिया, तो क्या हम प्रसन्नता, आनंद और ऊर्जा के लिए इस नदी को सुरक्षित रख पाएंगे?

इस लेख के साथ मैं कुछ छायाचित्र जोड़ रहा हूं, जिनमें आप देख सकते हैं कि इस नदी के किनारे लहलहाती हरी-भरी धान और सब्जियों की खेती सर्दियों के कोहरे में कितनी सुखद दिखाई दे रही है। इसी नदी के किनारे विकसित एक 'वेटलैंड' (आर्द्रभूमि) क्षेत्र है, जहां सुंदर जल-स्रोतों के साथ प्लास्टिक भी बिखरा पड़ा है। साथ ही, नदी के पात्र के पास कमल जैसी वनस्पतियों से ढकी छोटी-छोटी सुंदर तलैयां भी हैं। और अंत में, मानसून के दौरान अपने साथ तेजी से स्याह काला पानी लेकर बहती वाल्धुनी नदी।

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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