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ओबीसी आरक्षण: आखिर सबक क्यों नहीं लेती सरकारें?

Thu, 29 Dec 2022 04:45 PM IST
Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Thu, 29 Dec 2022 04:45 PM IST
सार

सवाल यह है कि आखिर योगी सरकार ओबीसी आरक्षण को लेकर इतनी जल्दबाजी में क्यों है? इसका कारण असल में 2024 के लोकसभा चुनाव हैं। दिल्ली के तख्त पर तीसरी बार काबिज होने के लिए भाजपा इस राज्य से अधिकाधिक सीटें जीतना चाहती है, जो पिछड़ा वर्ग के भरपूर समर्थन के बगैर संभव नहीं है।

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Uttar Pradesh OBC Reservation, Explained: Why courts keep striking down OBC reservation
ओबीसी आरक्षण - फोटो : amarujala

विस्तार

उत्तर प्रदेश में नगरीय चुनावों में ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) आरक्षण के मुद्दे पर योगी सरकार की किरकिरी और इस बारे में सरकारों द्वारा सुप्रीम कोर्ट के फैसले की बार-बार अनदेखी से यह सवाल उठ रहा है कि ओबीसी आरक्षण देने के पीछे असल मकसद क्या है? चुनावी टोटकेबाजी या फिर सचमुच पिछड़े वर्ग को उनका राजनीतिक हक देना है।

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यूपी के पहले ऐसे ही मामले महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, झारखंड और बिहार में हुए। वहां भी राज्य सरकारों को अंतत: सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुपालन में ट्रिपल टेस्ट फार्मूला अपनाकर ही आरक्षण देना पड़ा या चुनाव टालने पड़े। यह बात योगी सरकार भी जानती थी, फिर भी उसने वही दुस्साहस किया।
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मुद्दा यह है कि आखिर सरकारें ऐसा क्यों करती हैं? क्या वे न्यायपालिका को अनदेखा करना चाहती हैं या फिर अपने क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ के लिए अपनी मर्जी के उसूल पर चलना चाहती हैं? 
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यूपी के 762 नगरीय निकायों के चुनाव के लिए जिस जल्दबाजी में ओबीसी आरक्षण देते हुए चुनावी अधिसूचना जारी की गई, उसी से साफ है कि सरकार इस संदर्भ में कानूनी हवालों को भी नजरअंदाज कर यह दिखाना चाहती थी कि वह राज्य में पिछड़े वर्ग की कितनी हितैषी है।
 

यूपी में जिन 762 नगरीय निकायों में चुनाव होने हैं, ये वो निकाय हैं,जिनका कार्यकाल 12 दिसंबर 2022 से लेकर 19 जनवरी 2023 के बीच समाप्त हो रहा है। सरकार ने 5 दिसंबर को अधिसूचना जारी कर नगरीय निकायों में ओबीसी आरक्षण लागू कर दिया। इसके मुताबिक 4 नगर निगम, 54 नगर पालिकाएं तथा 147 नगर पंचायतों में ओबीसी आरक्षण लागू हुआ। इस आरक्षण का सरकार के पास कोई ठोस आधार नहीं था।


इस अधिसूचना के खिलाफ कोर्ट में 93 याचिकाएं दायर हुईं और इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने सरकार की इस अधिसूचना को रद्द करते हुए बिना ओबीसी आरक्षण के ही नगरीय निकाय चुनाव कराने के निर्देश दिए। अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कह रहे हैं कि राज्य में बिना ओबीसी आरक्षण के चुनाव नहीं होंगे। जबकि विपक्षी दलों ने योगी सरकार को पिछड़ा वर्ग विरोधी बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

ट्रिपल टेस्ट फार्मूला आसान नहीं

अब अगर सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक ट्रिपल टेस्ट फार्मूला लागू करती है तो उस पर अमल में काफी वक्त लगेगा। ट्रिपल टेस्ट के मानी तीन सूत्री फार्मूला है, जिसका मकसद ओबीसी के लिए राजनीतिक आरक्षण के प्रावधान के पहले उनकी जनसंख्या का सत्यापन है। इसके तहत हर राज्य में पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन, हर नगरीय निकाय ओबीसी आबादी का आकलन  और इस आकलित जनसंख्या का राज्य सरकार द्वारा सत्यापन।

वैसे यूपी  में पिछड़ा वर्ग आयोग 1993 से है, लेकिन इस आयोग का काम मूलत: ओबीसी जातियों में शैक्षणिक पिछड़ेपन का आकलन करना है न कि राजनीतिक आरक्षण देना। 

दरअसल यूपी में इस कानूनी झटके से बचा जा सकता था। ऐसा झटका जो कानूनी से ज्यादा राजनीतिक है और योगी सरकार के ओबीसी के प्रति सियासी धारणा का संदेश देने वाला है। योगी सरकार के सामने महाराष्ट्र, मप्र, बिहार और झारखंड राज्यों के उदाहरण सामने थे।

इन राज्यों में भी ओबीसी आरक्षण को कोर्ट ने खारिज कर दिया था। जब वहां सरकारों ने ट्रिपल टेस्ट फार्मूला लागू किया या फिर वैसा ही कोई तरीका खोजा, उसके बाद अदालत ने नगरीय निकायो में ओबीसी आरक्षण को मंजूरी मिली। 

Uttar Pradesh OBC Reservation, Explained: Why courts keep striking down OBC reservation
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ - फोटो : amar ujala


मसलन महाराष्ट्र में भी हाईकोर्ट के निर्णय के बाद तत्कालीन उद्धव ठाकरे सरकार ने राज्य में पूर्व मुख्य सचिव जयंत कुमार बांठिया की अध्यक्षता में आयोग का गठन किया। आयोग ने राज्य की मतदाता सूची को आधार बनाते हुए प्रयोग सिद्ध डाटा तैयार कर कोर्ट में प्रस्तुत किया, जिसको मान्य करते हुए प्रदेश में नगरीय निकायों में ओबीसी  को 27 फीसदी आरक्षण मंजूर किया गया।

मप्र में शिवराज सरकार ने राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के माध्यम से ऐसी रिपोर्ट तैयार करवाई और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण को स्वीकृति दी। बिहार में अति पिछड़ा वर्ग आयोग के जरिए ऐसी रिपोर्ट तैयार करवाई गई और झारखंड सरकार ने कहा है कि वो ट्रिपल टेस्ट फार्मूला लागू होने  के बाद ही नगरीय निकायों के चुनाव करवाएगी। 


लोकसभा चुनाव की हो रही है तैयारी

सवाल यह भी है कि आखिर योगी सरकार ओबीसी आरक्षण को लेकर इतनी जल्दबाजी में क्यों है? इसका कारण असल में 2024 के लोकसभा चुनाव हैं। दिल्ली के तख्त पर तीसरी बार काबिज होने के लिए भाजपा इस राज्य से अधिकाधिक सीटें जीतना चाहती है, जो पिछड़ा वर्ग के भरपूर समर्थन के बगैर संभव नहीं है।

राज्य में यूपी सामाजिक न्याय रिपोर्ट 2001 के मुताबिक ओबीसी आबादी कुल का लगभग 54 फीसदी यानी आधे से ज्यादा है, जबकि यूपी पिछड़ा वर्ग आयोग ने 79 जातियों को ओबीसी में शामिल किया है। सीएसडीएस सर्वे के मुताबिक ओबीसी में भी सर्वाधिक 19.4 फीसदी जनसंख्या यादवों की है। 
 

यादव बनाम गैर यादव का दांव

दूसरे नंबर पर कुर्मी हैं। 2014 के बाद से बीजेपी ने ओबीसी में यादव बनाम गैर यादव दांव सफलता से चला है। हालांकि भाजपा और सपा दोनों ही अति पिछड़ी जातियों को जोड़ने में लगे हैं। लेकिन हाईकोर्ट ने फैसले ने इस प्रक्रिया को भी झटका दे दिया है। योगी सरकार इस मामले में दो पाटों में फंसी है। अगर वह ट्रिपल फार्मूले को लागू कर चुनाव कराती है तो उस पर चुनाव टालने का आरोप लगेगा। अगर वह बिना ओबीसी आरक्षण चुनाव कराती है तो पिछड़ा वर्ग विरोधी होने का आरोप तो लगने ही लगा है। 

वैसे भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं अगड़ी जाति से आते हैं। हालांकि भाजपा अगले लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चेहरे पर ही लड़ेगी, जो खुद ओबीसी से आते हैं, लेकिन यूपी में अगर ओबीसी जातियां भाजपा से खफा हुईं तो चुनाव नतीजों पर असर पड़े बिना नहीं रहेगा, भाजपा की सबसे बड़ी परेशानी भी यही है।   


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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