ईरान-अमेरिका तनाव के बीच नई मुश्किल में भारत
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अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ रहे तनाव का असर हिंदुस्तान के हितों पर भी दिखाई देने लगा है। दोनों देशों से बेहतर रिश्ते होते हुए भी भारत उनका लाभ नहीं ले पा रहा है और न उन्हें लाभ पहुंचा पा रहा है। आज दुनिया की धुरी कारोबार पर आकर टिक गई है। कारोबार की इस मशीन में विचार और सद्भावना के ग्रीस की फ़िलहाल कोई गुंजाइश नज़र नहीं आती।
दरअसल, मुश्किल यह है कि द्विपक्षीय कारोबार बढ़ाना ही बेहतर संबंधों का पैमाना नहीं रहा है। अब प्रतिद्वंद्वी को कारोबारी झटका देने के लिए भी रिश्तों का बख़ूबी इस्तेमाल किया जा रहा है। अमेरिका ऐसा ही करना चाहता है। लेकिन इसमें वह भारत को होने वाले नुकसान से आंखें मूंदे बैठा है। रिश्तों के ऐसे वन वे ट्रैफ़िक को कोई कैसे स्वीकार कर सकता है? रौब डालकर संसार का चौधरी बनने की अमेरिकी चाहत अब अधिक दिन तक नहीं चलने वाली नहीं है।
भारत को लेकर बदला अमेरिका का नजरिया
भारत को लेकर भी अमेरिका ने कुछ समय से अपना रंग बदला है। व्यापार में छूट समाप्त करने के अलावा हालिया दिनों में उसने ऐसे अनेक फ़ैसले लिए हैं, जिनके साथ क़दमताल भारत के लिए ज़ोख़िम भरा है, लेकिन अमेरिका भारतीय चिंताओं का कोई सम्मान करता नहीं दिखाई देता।
ईरान के साथ परमाणु क़रार अचानक समाप्त करने का समर्थन तो उसके अनेक यूरोपीय मित्र देशों- ब्रिटेन,जर्मनी और फ्रांस तक ने नहीं किया था। पड़ोसी कनाडा और प्रतिद्वंद्वी चीन व रूस ने भी इस फ़ैसले से अपने को अलग कर लिया था।
अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी भी इससे हैरत में थी। उसका कहना था कि ईरान ईमानदारी से समझौते की शर्तों का पालन कर रहा है। ज़ाहिर है पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा समेत अमेरिकी प्रतिपक्ष भी इसके ख़िलाफ़ सामने आए थे।
वास्तव में इस संधि से सभी खुश थे। लेकिन अपनी कंपनी की तरह देश चला रहे ट्रंप पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। दूसरी ओर भारत ने कच्चे तेल का आयात न्यूनतम कर दिया, चाबहार बंदरगाह से मिलने वाले आर्थिक फ़ायदे नियंत्रित हो गए। अफ़ग़ानिस्तान, पुराने सोवियत संघ में शामिल देशों तथा मध्य पूर्व के मुल्क़ों से हमारा व्यापार आधा रह गया।
इसके अलावा ईरान के साथ खड़े होने से सऊदी अरब और पाकिस्तान पर जो कूटनीतिक शिकंजा कसा था, वह थोड़ा ढीला पड़ गया। भारतीय कंपनियों ने ईरान में क़रीब एक लाख करोड़ रूपए का निवेश किया है। उनको भी झटका लगा है। भारत ने अफ़ग़ानिस्तान में 600 करोड़ रुपए की लागत से ईरान सीमा तक सड़क बनाई है और चाबहार से अफगानिस्तान सीमा तक ईरान ने सड़क बना दी है। इससे माल लाने ले जाने की मुश्किल आसान हो गई।
भारत और ईरान के संबंध समझने होंगे अमेरिका को
सड़क निर्माण में तालिबान और पाक समर्थित आतंकवादियों ने बाधा पहुंचाई और 130 भारतीय मजदूरों की हत्या कर दी थी। इतनी क़ुर्बानियों के बाद भारत अमेरिका से क्यों कर डरे? पाकिस्तान नहीं चाहता कि अफगानिस्तान के बाद ईरान में भी भारत का प्रभाव बढे़।
भारत ईरान में अंदरुनी रेल नेटवर्क बिछाने का काम भी कर रहा है। इसका लाभ भारत भारत-ईरान दोनों को लंबे समय तक मिलने वाला है, इसलिए भारत और ईरान के सामने मधुर रिश्तों के अलावा कोई विकल्प ही नहीं है। मौजूदा तनाव की स्थिति में अमेरिका को भारत के हित क्यों नहीं समझने चाहिए? इसके अलावा पाकिस्तान के बलूचिस्तान और अफगानिस्तान से चाबहार बंदरगाह बहुत पास है। पाकिस्तान ने चीन को 43 साल के लिए ग्वादर बंदरगाह लीज़ पर दिया है। भारत के लिए यह बड़ी चिंता थी। चाबहार ने ग्वादर से बने दबाव को संतुलित कर दिया है।
इधर, मुंबई से चाबहार सिर्फ़ 850 नॉटिकल मील है और चाबहार से ग्वादर केवल 72 किलोमीटर। यानी की चीन और पाकिस्तान के लिए ग्वादर अब चुनौती है। यह स्थिति अमेरिका क्यों नहीं समझना चाहता?
भारत और ईरान को हर हाल में एक दूसरे का साथ चाहिए। अविभाजित हिन्दुस्तान के सदियों से ईरान के साथ अच्छे रिश्ते रहे हैं। ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संबंधों के अलावा मज़बूत कारोबारी इतिहास है। अमेरिका की भूमिका एक चतुर बनिए की है। एक सीमा के बाद उसे भारत के हितों से कोई लेना-देना नहीं है। यह बात भारतीय विदेश नीति के नियंताओं को ध्यान में रखनी पड़ेगी।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।