उत्तर प्रदेश चुनाव 2022: यूपी इलेक्शन में जाट फेक्टर का रहेगा कितना योगदान?
आप आराम से ये समझ सकते हैं कि जाट समुदाय खुद को मिलने वाली इस अटैंशन का, चुनावों में किंग मेकर माने जाने का, आनंद ले रहा है। मीडिया के बहुत ध्यान देने के अलावा केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह के जाट नेताओं से मिलने और जयंत को तबज्जो महसूस करवाने से भी उनके उत्साह में बढ़ोत्तरी हुई है।
इससे सवाल उठता है- क्या जाट इस चुनाव में किंग मेकर हैं या फिर ‘जाट फैक्टर’ को मीडिया और राजनीतिक दलों ने जरुरत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है?
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शामली के ऐलम गांव में कुछ लोग, जिनमें कुछ बुजुर्ग भी शामिल थे, जाड़ों की दोपहर के बाद की धूप में मजे से खाट पर रखे तकिए पर ताश के पत्ते फेंट रहे थे। उन्हें अपने बीच किसी बाहरी का आना और उभरते राजनीतिक परिदृश्य पर चर्चा करना बुरा नहीं लगा।
जयवीर सिंह कहते हैं, “जयंत चौधरी आदमी अच्छा है, लेकिन उसने गलत जगह हाथ मिला लिया है”। जब तक वो आगे कुछ कहता, उससे पहले ही वहां बैठे दो और बोल उठे कि ये चुनाव जयंत के अच्छे और बुरे होने के बारे में नहीं हैं बल्कि उनकी प्राथमिकताएं कहां हैं? उनके लिए इन चुनावों में बीजेपी उनकी प्राथमिकताओं में नहीं है। वो आपस में बहस करने लगे कि जयंत के नए साझीदार में गलत क्या है और सही क्या है?
गन्ने और सरसों के लहलहाते खेतों के बीच ताश खेल रहे इन ग्रामीणों के पास हालांकि जयंत की राजनीति के बारे में ज्यादा अच्छी बातें बताने के लिए थी नहीं, सिवाय उन भावनाओं के जो जयंत के दादा ‘चौधरी चरण सिंह साहब’ से लगातार जुड़ी रही हैं। चरण सिंह की मौत 1987 में हुई थी और इस बात को 35 साल बीत चुके लेकिन अभी भी जाट समुदाय के ऐसे लोगों की अच्छी खासी तादाद है, जो उनसे भावनात्मक रूप से जुड़ी हुई है और भावनात्मक प्रतिक्रिया ही देती है।
इस तरह की प्रतिक्रिया ऐलम गांव के खेतों में बैठे, बतियाते केवल यही लोग नहीं देते बल्कि जाट समुदाय के तमाम लोग ऐसा ही महसूस करते हैं, जिन लोगों ने बीजेपी के खिलाफ नकारात्मक वोटिंग का रुख अपना लिया है, वो आक्रामक तरीके से उन लोगों को चुप करवाने की कोशिश करते हैं, जो बीजेपी को वोट देने के बारे में बात कर रहे होते हैं।
कई वजहों से, उनका एक तबका बीजेपी से नाराज है। वो नहीं बताएंगे कि ऐसा क्यों हैं, लेकिन वो नाराज हैं। वो बहुत सारे मुद्दों को सामने लाते हैं, जिनमें महंगाई, बेरोजगारी, छुट्टा जानवरों से समस्या, गन्ने के भुगतान में देरी, बिजली की ऊंची दरें, खाद की खरीद में लम्बा इंतजार और किसान आंदोलन। ये भी खासा दिलचस्प था कि किसान आंदोलन उनकी नाराजगी या चिंता का मुख्य मुद्दों में शामिल नहीं था बल्कि बाद के मुद्दों में आता है।
मोटे तौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ज्यादातर इलाकों जैसे बागपत, शामली, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर और मेरठ, जहां जाटों का सामाजिक प्रभुत्व है, में यही पैटर्न देखने में आता है।
ये भी स्पष्ट है कि मुख्यमंत्री पद के लिए अखिलेश यादव उनकी पहली पसंद नहीं थे और उनके बारे में बातें करने में ये ज्यादा सहज भी महसूस नहीं करते। मुजफ्फरनगर दंगों के घाव अभी पूरे तरह भरे नहीं है लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी के प्रति अपनाए गए अपने ताजे रवैये की वजह से वो इसको भूलने की कोशिश कर रहे हैं।
वो इसे कहते नहीं है लेकिन कोई भी इसे भांप सकता है कि उन्हें या उनके साथियों को जिन्होंने कि पार्टी के लिए काम किया, इतना अटैंशन मिला जितना कि बीजेपी के पिछले पांच साल की सरकार में उनको मिलना चाहिए था।
बागपत के सरपुरकलां में हरपाल सिंह कहते हैं, “राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) से जितना प्रेम नहीं उससे ज्यादा नाराजगी बीजेपी से है”। लेकिन ये बीजेपी के लिए एकदम हारा हुआ केस भी नहीं है जैसा कि सतह पर लग सकता है। चाय, ताश या हुक्का पर होने वाले हर जमावड़ें या चर्चा में बीजेपी के लिए बोलने वाले कुछ समर्थक भी मिल ही जाते हैं, भले ही उनके साथी बीजेपी के विरुद्ध कितने भी तर्क क्यों ना दें? साथ में, जिन जिन सीटों पर आरएलडी के बजाय समाजवादी पार्टी के कैंडिडेट चुनाव में उतरे हैं, वहां ये देखना भी बाकी है कि जाट वहां आखिर वोट कैसे देंगे?
आप आराम से ये समझ सकते हैं कि जाट समुदाय खुद को मिलने वाली इस अटेंशन का, चुनावों में किंग मेकर माने जाने का, आनंद ले रहा है। मीडिया के बहुत ध्यान देने के अलावा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के जाट नेताओं से मिलने और जयंत को तवज्जो महसूस करवाने से भी उनके उत्साह में बढ़ोत्तरी हुई है। इससे सवाल उठता है- क्या जाट इस चुनाव में किंग मेकर हैं या फिर ‘जाट फैक्टर’ को मीडिया और राजनीतिक दलों ने जरूरत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है?
कुछ तथ्यों पर विचार करें: जाट पूरे उत्तर प्रदेश की कुल आबादी का लगभग 1.5 फीसदी हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कुल 113 विधानसभा सीटें आती हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में उनकी जनसंख्या 18 फीसदी तक है। मोटे तौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कुल 113 सीटों में से जाट प्रभुत्व के अगर वास्तविक असर को देखें तो ये ज्यादा से ज्यादा 25 सीटों तक सीमित है, इससे ज्यादा नहीं। इस चुनाव के पहले दो चरण के चुनाव जो 10 और 14 फरवरी को होने हैं, इन्हीं इलाकों में होने हैं।
2012 में जब यूपी में समाजवादी पार्टी सत्ता में आई थी, इसने 113 में से 41 सीटें जीती थीं, जबकि बीएसपी ने 35 और बीजेपी ने 18 सीटें जीती थीं। आरएलडी और कांग्रेस ने 8-8 सीटें जीती थीं। 2017 में आरएलडी (जिसे जाटों की, जाटों के लिए और जाटों द्वारा बनाई गई पार्टी माना जाता है), 403 सीटों की विधानसभा में केवल 1 ही सीट जीत पाई थी। वो इकलौता विधायक भी पार्टी बदलकर इनका साथ छोड़ गया था। बाद में आरएलडी ने ये कहकर अपनी इज्जत बचाई थी कि हमने उसे पार्टी से निकाल दिया।
2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी के सत्यपाल सिंह ने बागपत से जयंत चौधरी को और बीजेपी के ही संजीव बाल्यान ने मुजफ्फरनगर में उनके पिता अजीत सिंह को शिकस्त दी थी। दोनों सीटें भारी मुस्लिम और जाट बाहुल्य मानी जाती हैं। ये तब था जब आरएलडी ना केवल सपा बल्कि बसपा के साथ भी गठजोड़ में थी। कांग्रेस ने भी अजीत सिंह की उम्मीदवारी को समर्थन देते हुए अपना कैंडिडेट नहीं उतारा था।
आरएलडी पार्टी का जब से गठन हुआ है, हर पार्टी के साथ इसने समझौता किया है, चाहे वो बीजेपी हो, एसपी हो, बीएसपी हो या फिर कांग्रेस। दूसरे शब्दों में, ऐसी कोई पार्टी नहीं जिसके साथ आरएलडी ने गठबंधन ना किया हो, फिलहाल सपा के साथ है। जयंत चौधरी केवल एक बार लोकसभा चुनाव जीते हैं, 2009 में मथुरा सीट से जब वो बीजेपी के साथ गठबंधन में थे।
आरएलडी का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 2002 को विधानसभा चुनावों में था, जब इसने 14 सीटें जीती थीं, दिलचस्प बात ये है कि तब ये बीजेपी के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ी थी। जाट एक प्रभावशाली मुखर समुदाय है और आक्रामक तरीके से वोटिंग करते हैं, लेकिन और भी समुदाय हैं, जो खामोशी से वोटिंग करते हैं।
(सहयोग- विष्णु शर्मा)
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