प्रॉपर्टी बाजार में भ्रष्टाचार: लूट और शोषण की इमारतें ढहीं, लेकिन न जाने कितनी अब भी खड़ी हैं..!
नोएडा का सबसे ऊंचा ट्विन टॉवर इस बात का प्रतीक था कि कैसे उत्तर प्रदेश में बिल्डर, अफसर और नेताओं के गठजोड़ से जनता को लूटा गया है।
नोएडा का सबसे ऊंचा ट्विन टॉवर इस बात का प्रतीक था कि कैसे उत्तर प्रदेश में बिल्डर, अफसर और नेताओं के गठजोड़ से जनता को लूटा गया है।
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13 साल में बनकर तैयार हुई 32 और 29 मंजिल की दो इमारतें जिन्हें ट्विन टावर के नाम से मीडिया ने हमारी स्मृति में ठूंस दिया महज 9 सेकेंड में ढह गईं। उप्र सरकार इस ध्वंस का उत्सव चाहती थी और मीडिया ने ऐसा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कई दिन से मंच माहौल तैयार किया जा रहा था और पर्दा गिरा दिया गया।
लूट और भ्रष्टाचार का टावर
नोएडा का सबसे ऊंचा ट्विन टॉवर इस बात का प्रतीक था कि कैसे उत्तर प्रदेश में बिल्डर, अफसर और नेताओं के गठजोड़ से जनता को लूटा गया है। साल 2004 में नोएडा अथॉरिटी ने सेक्टर-93 ए स्थित प्लॉट नंबर-4 एमराल्ड कोर्ट के लिए आवंटित किया। इस जगह पर 9 मंजिला इमारत बनाने के लिए मंजूरी दी गई। फिर 2006 में इसमें संशाधन करके 11 मंजिला कर दिया गया। पहले यहां पर कुल 14 टॉवर बनने थे, लेकिन यह संख्या भी बदल दी गई और दो बार में इसे बदल कर 16 किया गया।
इसमें 2009 में फिर बदलाव हुआ और टॉवर की संख्या 17 हो गई। एक बार फिर 2012 में इसमें बदलाव हुआ और दो टॉवर्स को 40 मंजिल तक ऊंचा करने की मंजूरी दे दी गई। इन अनगिनत संशोधनों में टॉवर की ऊंचाई, दो टॉवरों के बीच की दूरी, पार्किंग एरिया, लॉन वगैरह को लेकर नियमों का उल्लंघन किया गया। इस भयंकर भ्रष्टाचार के परिणामस्वरूप 32 और 29 मंजिल के दो टॉवर तैयार हुए थे। इस सोसायटी में रहने वाले लोगों ने नोएडा अथॉरिटी से इस बाबत शिकायत की तो उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई। आखिरकार हार कर वे लोग कोर्ट पहुंचे तो इसमें भारी भ्रष्टाचार पाया गया। 9 साल लंबी सुनवाई के बाद कोर्ट को इसे ध्वस्त करने का आदेश देना पड़ा।
कौन थे वो अधिकारी, मंत्री जो फाइलें पास करते रहे? कहां गए वो बिल्डर? मंत्रालयों और विभागों की टेबलों और कंप्यूटरों से पैसा पैसा चिल्लाती निकली वो फाइलें कहां हैं?
आखिर कहां जाकर थमेगी भ्रष्टाचार की बेल?
प्रॉपर्टी में भ्रष्टाचार की बीमारी कितनी बड़ी है इसे ऐसे समझिए कि अकेले नोएडा-ग्रेटर नोएडा में तकरीबन दो लाख से ज्यादा ऐसे फ्लैट खरीदने वाले लोग हैं जिन्होंने पैसा चुका दिया है और सालों से रजिस्ट्री के लिए भटक रहे हैं। दूसरी तरफ नेताओं, अफसरों और बिल्डरों की बंदरबांट ने नोएडा-ग्रेटर नोएडा में फ्लैट इतने महंगे कर दिए हैं कि लोग खरीदना ही नहीं चाहते। यहां के रीयल स्टेट कारोबारियों का कहना है कि लोगों को 22-25 लाख में घर चाहिए, जबकि घरों की कीमत इसके डेढ़ गुने से शुरू होती है।
एक तरफ प्रॉपर्टी बाजार का यह भ्रष्टाचार है जिसमें जाने कितना कालाधन खप रहा है और दूसरी तरफ वे आम मध्यवर्गीय लोग हैं जो जिंदगी भर में एक-एक पाई जोड़कर घर खरीदने का सपना देखते हैं। इस भ्रष्टाचार को खुला छोड़ देने का नतीजा है कि करोड़ों की संख्या में लोगों को घर चाहिए, लाखों की संख्या में घर बनकर तैयार हैं लेकिन उन्हें खरीददार नहीं मिल रहे हैं।
कुछ समय पहले ही यूपी भू-संपदा विनियामक प्राधिकरण (यूपी रेरा) ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था-
नोएडा और ग्रेटर नोएडा में आवासीय कॉलोनियों का कोई भी नया प्रोजेक्ट रजिस्टर्ड नहीं हो रहा है, जबकि महामारी के बाद छोटे शहरों नए प्रोजेक्ट खूब शुरू हो रहे हैं। रेरा के बाद संपत्ति मामलों की सलाहकार संस्था एनरॉक ने एक रिपोर्ट दी जिसमें कहा गया कि दिल्ली-एनसीआर में प्रॉपर्टी बाजार की हालत बेहद खस्ता है। यहां 1.81 लाख करोड़ की प्रापर्टी को खरीदार नहीं मिल रहे हैं। इसमें से लगभग 70 फीसदी प्रॉपर्टी नोएडा में है।
एनरॉक की रिपोर्ट कहती है-
देश के सात बड़े शहर- दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, हैदराबाद, बेंगलुरु और पुणे में आवासीय प्रोजेक्ट जो ठप हो चुके हैं या देरी से चल रहे हैं, उनकी कुल कीमत 4.48 लाख करोड़ है। इनमें वे प्रोजेक्ट शामिल हैं जो 2014 से पहले और उसके बाद शुरू हुए। इन्हें खरीदार नहीं मिल रहे हैं।
लोगों को घर चाहिए, बिल्डर को खरीदार चाहिए। दोनों मौजूद हैं फिर मुसीबत कहां है? मुसीबत है अफसरों और नेताओं का भ्रष्टाचार। उनको दिया जाने वाला कमीशन जनता से वसूला जाता है और बढ़ती प्रचंड महंगाई और भयानक बेरोजगारी में जनता अब इनता पैसा देने की हालत में नहीं है और इसलिए रीयल एस्टेट का कारोबार एक तरह से ढह गया है। इसी नोएडा में अगर जांच हो तो ऐसे जाने कितने भ्रष्टाचार के स्मारक खड़े मिलेंगे।
ट्विन टॉवर के मामले में इस प्रवृत्ति ने सीमा पार कर दी। उत्तर प्रदेश की भ्रष्ट सरकारों ने इस प्रोजेक्ट में इतनी लूट मचाई कि आखिरकार सोसायटी के रहवासियों को कोर्ट की शरण लेनी पड़ी। कोर्ट को न्याय का कुछ ऐसा रास्ता निकालना चाहिए था जिससे उत्तर प्रदेश के लोग देखते कि कैसे उन्हें लूटकर भ्रष्टाचार का यह सबसे ऊंचा स्मारक खड़ा किया गया और कैसे हमारी अदालतों ने उन्हें न्याय दिलाकर अपनी महानता फिर से साबित की। अफ़सोस ऐसा नहीं हुआ।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।