{"_id":"6982acfc48f86f965402443a","slug":"travel-history-opinion-on-fatehpur-sikri-a-forgotten-capital-2026-02-04","type":"story","status":"publish","title_hn":"फतेहपुर सीकरी: भूली-बिसरी राजधानी का वह नायाब नगीना, जो बसते ही उजड़ गया","category":{"title":"Blog","title_hn":"अभिमत","slug":"blog"}}
फतेहपुर सीकरी: भूली-बिसरी राजधानी का वह नायाब नगीना, जो बसते ही उजड़ गया
Wed, 04 Feb 2026 07:50 AM IST
नितिन गौतम
भूपेंद्र कुमार, अमर उजाला
भूपेंद्र कुमार, अमर उजाला
Published by: नितिन गौतम
Updated Wed, 04 Feb 2026 07:50 AM IST
सार
फतेहपुर सीकरी का निर्माण 1571 से 1585 के बीच किया गया था। यह स्थान पहले सीकरी के नाम से जाना जाता था। अकबर की सभी इमारतों में यह सबसे सुंदर और समृद्ध है। इतनी अलंकृत इमारत कोई नहीं। अबुल फजल ने लिखा है, छैनी-हथौड़े ने वह कमाल कर दिया, जो लकड़ी पर की गई नक्काशी भी नहीं कर सकती थी।
विज्ञापन
फतेहपुर सीकरी
- फोटो : पीटीआई
विस्तार
ऐसा लगता ही नहीं कि यह सदियों पुरानी भूली-बिसरी दास्तां है। एक ऐसी राजधानी, जो बसने के साथ ही उजड़ गई। फतेहपुर सीकरी पत्थरों पर लिखी एक ऐसी रुबाई है, जिसे सुनने के लिए वक्त चाहिए। थोड़ा ठहरकर हवा में गूंजती सरगोशियों को सुनेंगे, तो कही-अनकही दास्तानें महसूस कर पाएंगे। तब आप देख पाएंगे कि पत्थरों पर कितनी नाजुक-सी शायरी लिखी गई है। तो क्या है तुर्की सुल्ताना की दास्तां, जिसे आज भी कोई नहीं जानता? इस वीरान बस्ती की ऐसी कहानी, जो अनकही रह गई।
सदियों पहले एक वक्त था, जब अकबर की बनाई राजधानी फतेहपुर सीकरी की इमारतें गुलजार थीं। पहले थोड़ा फतेहपुर सीकरी के बारे में जान लेते हैं। इसका निर्माण 1571 से 1585 के बीच किया गया था। यह स्थान पहले सीकरी के नाम से जाना जाता था, जो सिकरवार राजपूतों से निकला शब्द था। अकबर के दादा बाबर ने यहां एक उद्यान बनाने का निर्देश दिया था। बाद में सूफी संत शेख सलीम चिश्ती के आशीर्वाद से जब शहजादे सलीम, यानी जहांगीर का जन्म 1569 ईस्वी में हुआ, तो अकबर ने यहां पूरा शहर बनवाना तय किया। तब अकबर ने गुजरात में जीत हासिल की थी, तो नई राजधानी को फतेहपुर-सीकरी नाम दिया गया। यहीं तुर्की सुल्ताना का अनोखा महल भी है, जैसे पत्थर पर लिखी कलात्मक कविता हो। इमारत की दीवारों पर लाल पत्थर पर जंगल के ऐसे दृश्य उकेरे गए हैं, जो कागज पर भी उकेरने असंभव से हैं। इतिहासकारों के अनुसार, तुर्की सुल्ताना कोई एक महिला नहीं थी, बल्कि यह अकबर की दो तुर्क बेगमों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द था, रुकैया सुल्ताना बेगम और सलीमा सुल्ताना बेगम।
रुकैया अकबर की पहली पत्नी थीं, जो निःसंतान रहीं, जबकि सलीमा पहले बैरम खान की पत्नी थीं और बाद में उन्होंने अकबर से शादी की। पर दो बेगम एक कमरे के आवास में कैसे रह सकती थीं, इसका जवाब कहीं नहीं मिलता। अकबरकालीन इतिहासकार बदायूंनी ने लिखा है कि इस जगह 1571 में मजहबी चर्चा हुआ करती थी। इसे ही आज हम तुर्की सुल्ताना का महल कहते हैं। इसमें केवल एक कमरा है। इतिहासकार फर्ग्यूसन के अनुसार, अकबर की सभी इमारतों में यह सबसे सुंदर और समृद्ध है। इतनी अलंकृत इमारत कोई नहीं। अकबर के नवरत्नों में शुमार अबुल फजल ने लिखा है, छैनी-हथौड़े ने वह कमाल कर दिया, जो लकड़ी पर की गई नक्काशी भी नहीं कर सकती थी। इतिहासकार पर्सी ब्राउन ने अपनी चर्चित पुस्तक इंडियन आर्किटेक्चर-द इस्लामिक पीरियड में लिखा है, वास्तुकला का नायाब नगीना। देखा जाए, तो इतिहास की धुमावदार गलियों में कई बार सवालों के जवाब सीधे-सीधे नहीं मिलते, तुर्की सुल्ताना भी शायद ऐसा ही सवाल है।
विज्ञापन
विज्ञापन
सदियों पहले एक वक्त था, जब अकबर की बनाई राजधानी फतेहपुर सीकरी की इमारतें गुलजार थीं। पहले थोड़ा फतेहपुर सीकरी के बारे में जान लेते हैं। इसका निर्माण 1571 से 1585 के बीच किया गया था। यह स्थान पहले सीकरी के नाम से जाना जाता था, जो सिकरवार राजपूतों से निकला शब्द था। अकबर के दादा बाबर ने यहां एक उद्यान बनाने का निर्देश दिया था। बाद में सूफी संत शेख सलीम चिश्ती के आशीर्वाद से जब शहजादे सलीम, यानी जहांगीर का जन्म 1569 ईस्वी में हुआ, तो अकबर ने यहां पूरा शहर बनवाना तय किया। तब अकबर ने गुजरात में जीत हासिल की थी, तो नई राजधानी को फतेहपुर-सीकरी नाम दिया गया। यहीं तुर्की सुल्ताना का अनोखा महल भी है, जैसे पत्थर पर लिखी कलात्मक कविता हो। इमारत की दीवारों पर लाल पत्थर पर जंगल के ऐसे दृश्य उकेरे गए हैं, जो कागज पर भी उकेरने असंभव से हैं। इतिहासकारों के अनुसार, तुर्की सुल्ताना कोई एक महिला नहीं थी, बल्कि यह अकबर की दो तुर्क बेगमों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द था, रुकैया सुल्ताना बेगम और सलीमा सुल्ताना बेगम।
विज्ञापन
रुकैया अकबर की पहली पत्नी थीं, जो निःसंतान रहीं, जबकि सलीमा पहले बैरम खान की पत्नी थीं और बाद में उन्होंने अकबर से शादी की। पर दो बेगम एक कमरे के आवास में कैसे रह सकती थीं, इसका जवाब कहीं नहीं मिलता। अकबरकालीन इतिहासकार बदायूंनी ने लिखा है कि इस जगह 1571 में मजहबी चर्चा हुआ करती थी। इसे ही आज हम तुर्की सुल्ताना का महल कहते हैं। इसमें केवल एक कमरा है। इतिहासकार फर्ग्यूसन के अनुसार, अकबर की सभी इमारतों में यह सबसे सुंदर और समृद्ध है। इतनी अलंकृत इमारत कोई नहीं। अकबर के नवरत्नों में शुमार अबुल फजल ने लिखा है, छैनी-हथौड़े ने वह कमाल कर दिया, जो लकड़ी पर की गई नक्काशी भी नहीं कर सकती थी। इतिहासकार पर्सी ब्राउन ने अपनी चर्चित पुस्तक इंडियन आर्किटेक्चर-द इस्लामिक पीरियड में लिखा है, वास्तुकला का नायाब नगीना। देखा जाए, तो इतिहास की धुमावदार गलियों में कई बार सवालों के जवाब सीधे-सीधे नहीं मिलते, तुर्की सुल्ताना भी शायद ऐसा ही सवाल है।
विज्ञापन