फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   This start-up is providing funeral services, know all about its impact

बाजारवाद का दौर: क्या अब अंतिम संस्कार भी स्टार्टअप कंपनियां कराएंगी?

सार

क्या हम पूरे जीवन में ऐसे चार लोग भी नहीं बना सकते जो हमसे कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहें और अंत में कांधा दे सकें? वास्तविक जिंदगी में जो अपनत्व और विश्वास की नींव बनती है, वह अटूट होती है लेकिन आज सोशल मीडिया व आभासी दुनिया के रिश्तों में, हम सभी चैटिंग, फोटो शेयरिंग और कमेंट्स में सुकून खोज रहे हैं।

विज्ञापन
This start-up is providing funeral services, know all about its impact
अंतिम संस्कार कराएंगे स्टार्ट अप कंपनियां - फोटो : Pixabay

विस्तार

पिछले दिनों दिल्ली में हुए ट्रेड फेयर में एक खास स्टॉल चर्चा विषय बन गया है। दरअसल, यह स्टॉल अंतिम संस्कार (फ्यूनरल प्लानिंग) से जुड़ी थी। यहां पर वो सभी वस्तुएं उपलब्ध हैं जो किसी इंसान के मौत के बाद काम आती हैं। अभी तक हमने अंतिम संस्कार का स्टॉल नहीं देखा था बदला समय वो भी दिखा रहा है। 

विज्ञापन

 

"तुम्हारे शहर में मय्यत को सब कांधा नहीं देते, हमारे गांव में छप्पर भी सब मिल कर उठाते हैं"

 


वेडिंग प्लानर से लेकर फ्यूनरल प्लानिंग तक

किसी शायर की ये लाईनें अब हकीक़त बनती जा रही हैं। हमने वेडिंग प्लानर या इवेंट प्लानर तो सुने थे लेकिन अब डिजाइन थिंकिंग व आर्टिफिशियल इंटिलिजेंस के इस दौर में फ्यूनरल प्लानिंग कंपनियां भी आ गई हैं। लॉकडाउन के समय सेवा भाव से आए ये विचार अब बाज़ारवाद के युग में पक्के बिजनेस स्टार्टअप बनते जा रहे हैं।

विज्ञापन


वास्तव में ये ऐसी कंपनियां बनी हैं जो अंतिम क्रिया करवाएंगी, जिसकी सदस्यता की फीस बीस हज़ार से पांच लाख रुपये तक है। कम्पनी के पास बाकायदा सेल्स मार्केटिंग, टेलीकॉलर्स की पूरी टीम है। सोलह संस्कारों पर टिका हमारा समाज आज अंतिम संस्कार भी किराए के लोगों से करा रहा। यह स्टार्टअप कम्पनियां भी जानती हैं की एकल व आत्म केंद्रित हो चुके समाज में रिश्ते निभाने का समय किसी के पास नही होगा, ना बेटे के पास न भाई के पास। 

विज्ञापन
विज्ञापन

यह फ्यूनरल प्लानिंग स्टार्टअप कम्पनियां श्मशान की बुकिंग, पंडित की व्यवस्था और शव को श्मशान तक ले जाने के लिए गाड़ी की व्यवस्था भी मुहैया कराती हैं। गोमूत्र, अगरबत्ती, गोबर की उपलें, बांस की सीढ़ी, मिट्टी का घड़ा, अंतिम संस्कार के लिए अर्थी की व्यवस्था, कंधा देने वालों की व्यवस्था व राम-नाम सत्य बोलने वाले, चिता जलाने वाले सब कंपनी के होंगे।


अस्थि विसर्जन भी वहीं करवाएगी। अलग-अलग सेवाओं की कीमत भी अलग-अलग है। बजट के हिसाब से अर्थी तैयार करा सकते हैं। मरने के बाद शव को जिस चीज़ की ज़रूरत होती है वो सब मुहैया कराएगी, मतलब मरने के बाद की मैनेजमेंट कम्पनी है। वास्तव में यह अंतिम संस्कार के लिए वन स्टॉप सर्विस है।


प्री-डेथ पैकेज भी उपलब्ध

अतिरिक्त चार्ज पर अंतिम यात्रा का लाइव प्रसारण भी कंपनी उपलब्ध करवा देगी, जिसे देखकर परिजन चाहे तो नकली आंसू भी बहा सकते हैं। कंपनियां यह दावा भी कर रही हैं कि हम गुणवत्ता, गरिमा और नवीनता का पूरा ख्याल रखते हैं। ये स्टार्टअप कम्पनियां फ्यूनरल प्लानिंग भी करती है।  “प्री-डेथ" पैकेज भी है, जिन्हें लगता है कि अगर उन्हें अचानक कुछ हो गया तो उनका अंतिम संस्कार कौन करेगा।

अंत्येष्टि की सर्विस के लिए फोन और ऑनलाइन मोबाइल ऐप या इसकी वेबसाइट के माध्यम से बुकिंग की जा सकती है। कुछ स्टार्टअप कंपनियां अंतिम क्रिया की किट ऑनलाइन उपलब्ध करा रही हैं।

वर्तमान में, भारत में यह उद्योग 2 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का हो गया है और सेवा क्षेत्र (सर्विस सेक्टर) का बड़ा भाग बनता जा रहा। तो क्या अब भारत में अंतिम संस्कार भी बिजनेस बन गया है?

मेरी नज़र में कुछ परिस्थियों को छोड़कर, यह नई संस्कृति नहीं बल्कि बाज़ारवाद है, जो हमारे ही कारण ऐसा हुआ है। बाज़ार का निजी जीवन में दखल इतना बेहिसाब बढ़ता जा रहा है कि पैदा होने से लेकर मृत्यु तक में बाज़ार शामिल हो गया है। ऐसा लगता है, दुनिया अकेली हो गई है। लोग भीड़ में अकेले घूम रहे हैं और आज हमारे पास चार सच्चे दोस्त भी नहीं हैं।  

आभासी दुनिया और खत्म होते रिश्ते

क्या हम पूरे जीवन में ऐसे चार लोग भी नहीं बना सकते जो हमसे कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहें और अंत में कांधा दे सकें? वास्तविक जिंदगी में जो अपनत्व और विश्वास की नींव बनती है, वह अटूट होती है लेकिन आज सोशल मीडिया व आभासी दुनिया के रिश्तों में, हम सभी चैटिंग, फोटो शेयरिंग और कमेंट्स में सुकून खोज रहे हैं।

हम सबकी पीड़ा यह है कि हमारे पास चार सच्चे दोस्त और मौके में काम आने वाले रिश्तेदार नहीं हैं। वास्तव में मजबूत रिश्ता निःस्वार्थ त्याग मांगता है, समय मांगता है। जब हम अपने रिश्तों को मान देते हैं ,तो बदले में हमें वहां से भी मान मिलता है। पर अब रिश्ते लाइक्स और कॉमेंट्स पर ज्यादा निर्भर नजर आते हैं। मजबूत रिश्ते और दोस्त तब बनते हैं जब हम सुख-दुख का साथी बनते हैं लेकिन हम तो अधिक से अधिक फॉलोवर्स, बड़े घर और बड़ी कार की होड़ में लगे हुए हैं।

संयुक्त से एकल और अब एकल परिवार में भी अकेले रहने वाले लोगों तथा ऐसे समाज के लिए, यह नया बाज़ारवाद, एक विकल्प माना जा सकता है। जहां आपके शव को कंधा देने के लिए चार लोग भी इकट्ठा नहीं हों तो इन फ्यूनरल प्लानिंग स्टार्टअप कम्पनियों से सम्पर्क कर सकते हैं।

कुछ अभागे लोगों और उम्र दराज़ लोगों के लिए यह कंपनियां मज़बूरी हैं परन्तु सनातन संस्कृति वाले देश में ऐसी कम्पनी खुलना बहुत ही विचारणीय है। वास्तव में यह मामला संवेदना और व्यक्तित्व का भी है। जीवन का अंतिम सत्य यही है कि जो आया है वो जाएगा जरूर।
 

अहमद फराज ने लिखा है- ज़िंदगी से यही गिला है मुझे, तू बहुत देर से मिला है मुझे। हमसफर चाहिए हुजूम नहीं, इक मुसाफिर भी काफिला है मुझे।


परिवर्तन प्रकृति का अनिवार्य नियम है लेकिन परिवर्तन का सिलसिला हमें 'फ्यूनरल प्लानिंग व डेथ सर्विस' तक लाएगा इसकी कल्पना हमने नहीं की थी। वर्चुअल दुनिया से बाहर निकलकर रिश्तों को समय देना शुरू करिए क्योंकि बहुत खामोश रिश्ते ज्यादा दिनों तक जिन्दा नहीं रहते।

कुल मिलाकर, रिश्तों को मजबूत बनाकर रखें, जिससे कि ज़िंदगी का आख़िरी रास्ता भी अपनों के साथ हो, ना कि किराए के लोगों के साथ।



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed