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नवंबर की त्रिमूर्ति : रजत जयंती पर तीन राज्यों का आत्म-साक्षात्कार
सार
उत्तराखंड, जहां खनिज नहीं के बराबर हैं, को जलविद्युत से केवल 1,200 करोड़ रुपये की आय हुई। परन्तु यही अंतर बताता है कि खनिज संपदा होने के बावजूद विकास समान रूप से नहीं फैला।
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उत्तराखंड प्रवासी सम्मेलन
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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विस्तार
नवम्बर को अगर नए राज्यों का मातृ माह कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं, क्योंकि देश के 35 राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में से 14 का जन्म या पुनर्गठन इसी माह हुआ। इनमें उत्तराखण्ड, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ सहित सात नये राज्य बने, तीन पुनर्गठन से बने और तीन केंद्र शासित प्रदेश के रूप में अस्तित्व में आए।
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पुडुचेरी का भारत में हस्तांतरण भी इसी माह हुआ। नवम्बर में जन्में तीन नये राज्यों को विकास के साथ ही अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान के लिये भी स्वशासन की आवश्यकता थी।
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अपने पैतृक राज्यों से भौगोलिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भिन्न ये तीनों राज्य नवम्बर शुरू होते ही अपनी रजत जयन्ती मना रहे हैं। समारोह भी जरूरी हैं, लेकिन उससे जरूरी नदके लिये आत्म चिन्तन है। इन ढाई दशकों में तीनों ने काफी प्रगति की, विशेषकर उत्तराखण्ड ने। लेकिन इन उपलब्धियों के साथ ही नाकामियाँ भी कम नहीं।
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खासकर छत्तीसगढ़-झारखण्ड के लिए आत्मचिन्तन का विषय यह है कि प्राकृतिक संपदा से भरपूर होने के बावजूद ये राज्य आपदाओं और राजनीतिक अस्थिरता के बावजूद उत्तराखण्ड से पीछे क्यों रह गये।
तीनों का गठन क्षेत्रीय आकांक्षाओं और विकास की समान आशा के साथ हुआ था। झारखंड और छत्तीसगढ़ दोनों ही खनिज-संपदा से भरे हैं। झारखंड में कोयला, लोहा, यूरेनियम, जबकि छत्तीसगढ़ में लोहा, बॉक्साइट और कोयले के विशाल भंडार हैं। परंतु 25 वर्षों के बाद विकास के पैमाने पर उत्तराखंड इन दोनों से कहीं आगे दिखाई देता है।
सवाल यह है कि प्राकृतिक संपदा के बावजूद झारखंड और छत्तीसगढ़ पीछे क्यों रह गये? वर्ष 2024-25 की स्थिति देखें तो झारखंड की प्रति व्यक्ति आय केवल 0.95 लाख रुपये है, जबकि छत्तीसगढ़ की 1.45 लाख रुपये तक पहुंचती है। इसके मुकाबले उत्तराखंड में यह आँकड़ा 2.65 लाख रुपये है, यानी लगभग दोगुना। आर्थिक वृद्धि दर में भी यही प्रवृत्ति है।
2023-24 में झारखंड की जीडीपी वृद्धि 6.8 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ की 7.9 प्रतिशत और उत्तराखंड की 8.2 प्रतिशत रही। नीति आयोग के 2023 के आंकड़ों के अनुसार झारखंड में 36.9 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं, छत्तीसगढ़ में यह अनुपात 29.1 प्रतिशत और उत्तराखंड में केवल 17.2 प्रतिशत है। खनिज राजस्व में झारखंड को वर्ष 2023 में 28,000 करोड़ रुपये और छत्तीसगढ़ को 22,000 करोड़ रुपये की प्राप्ति हुई।
इसके विपरीत उत्तराखंड, जहां खनिज नहीं के बराबर हैं, को जलविद्युत से केवल 1,200 करोड़ रुपये की आय हुई। परन्तु यही अंतर बताता है कि खनिज संपदा होने के बावजूद विकास समान रूप से नहीं फैला। साक्षरता के क्षेत्र में भी उत्तराखंड सबसे आगे है। यहाँ साक्षरता दर 88.3 प्रतिशत है, जबकि छत्तीसगढ़ में 77.3 प्रतिशत और झारखंड में मात्र 71.4 प्रतिशत। कुल मिलाकर यह साफ है कि खनिज-संपदा से सम्पन्न दो राज्य आर्थिक रूप से उस राज्य से पीछे हैं, जहाँ प्राकृतिक संसाधन कम हैं।
झारखंड में कोल इंडिया, सेल और टाटा स्टील जैसे उद्योग सक्रिय हैं। देश का लगभग 40 प्रतिशत कोयला और 25 प्रतिशत लोहा इसी राज्य से निकलता है। शिक्षा और नगरीय विकास के क्षेत्र में रांची और जमशेदपुर को स्मार्ट सिटी के रूप में विकसित किया गया है, जहां आइआइटी, आइआइएम और एआइएमएस जैसे राष्ट्रीय संस्थान कार्यरत हैं।
छत्तीसगढ़ ने औद्योगिक विस्तार के साथ सामाजिक सुरक्षा को संतुलित रखा है। भिलाई इस्पात संयंत्र के विस्तार और कोरबा को पावर हब बनाने से औद्योगिक क्षेत्र में ऊर्जा आई है।
खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में राज्य का ‘‘छत्तीसगढ़ मॉडल’’ देश के लिए उदाहरण बना। नक्सल प्रभावित बस्तर क्षेत्र में 2014 के बाद से 500 से अधिक नए स्कूल खुले हैं और सड़कें पहले की तुलना में तीन गुना बढ़ी हैं। राज्य ने जैविक खेती में भी राष्ट्रीय पहचान बनाई है।
उत्तराखण्ड की ही तरह झारखंड में भी राजनीतिक अस्थिरता सबसे बड़ी चुनौती रही है। 2000 से 2024 तक यहाँ 11 मुख्यमंत्री बदले गए और तीन बार राष्ट्रपति शासन लागू हुआ। भ्रष्टाचार भी एक बड़ा अवरोध रहा। वहां एक सदस्यीय विधायक मधुकोड़ा भी मुख्यमंत्री बने जबकि मधुकोड़ा के अलावा शिब्बू सोरेन और हेमंत सोरेन को जेल जाना पड़ा।
झारखंड का ₹1.86 लाख करोड़ का कोयला घोटाला और छत्तीसगढ़ के लौह अयस्क विवाद इस दिशा में गंभीर संकेत हैं। पर्यावरणीय दृष्टि से झारखंड के 40 प्रतिशत वन क्षेत्र खनन से प्रभावित हुए हैं, जबकि छत्तीसगढ़ में हसदेव अरण्य क्षेत्र में वनों की कटाई ने व्यापक विरोध खड़ा किया।
छत्तीसगढ़ में यह स्थिति अपेक्षाकृत स्थिर रही, जहाँ अब तक पाँच मुख्यमंत्री हुए हैं। सुरक्षा और नक्सलवाद की समस्या झारखंड के 18 जिलों और छत्तीसगढ़ के 10 जिलों में लंबे समय तक बनी रही। खनन और बाँध परियोजनाओं के चलते झारखंड में लगभग 25 लाख और छत्तीसगढ़ में 18 लाख आदिवासी विस्थापित हुए।
उत्तराखंड का विकास मॉडल मूलतः पर्यटन, जलविद्युत और सेवा क्षेत्र पर आधारित है, जो घरेलू माँग से संचालित और स्थिर हैं। इसके विपरीत झारखंड और छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था खनन पर निर्भर है, जो वैश्विक माँग और कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण अस्थिर रहती है। नेतृत्व की स्थिरता ने भी फर्क पैदा किया।
उत्तराखंड के शुरुआती वर्षों में एन.डी. तिवारी जैसे अनुभवी नेता ने मजबूत प्रशासनिक और विकास का ढांचा खड़ा किया। सामाजिक और प्रशासनिक दृष्टि से भी उत्तराखंड में जातीय संघर्ष या नक्सल गतिविधियाँ नहीं हैं। प्रशासनिक दक्षता में अंतर साफ दिखता है।
उत्तराखंड को उत्तर प्रदेश से अनुभवी नौकरशाही विरासत में मिली, जबकि झारखंड और छत्तीसगढ़ को नई प्रशासनिक मशीनरी विकसित करनी पड़ी। निवेशक भी सुरक्षा और पारदर्शिता को देखते हैं। उत्तराखंड ने सुरक्षित और स्वच्छ छवि बनाई, जबकि नक्सल क्षेत्रों में उद्योगों ने दूरी बनाए रखी।
उत्तराखंड की सफलता पूर्ण नहीं है। पहाड़ी जिलों में पलायन गंभीर समस्या बन चुका है। अब तक 1,500 से अधिक गाँव खाली हो चुके हैं और लगभग 10 लाख युवा रोजगार की तलाश में बाहर चले गए हैं। आपदा प्रबंधन भी बड़ी चुनौती है।
2013 की केदारनाथ त्रासदी और 2023 के जोशीमठ भू-धंसाव जैसी घटनाओं से राज्य को हर वर्ष लगभग ₹5,000 करोड़ का नुकसान होता है। सरकारें भ्रष्टाचार रोकने में विफल हैं और लोकायुक्त का गठन करने से डरती हैं। आर्थिक असमानता भी चिंताजनक है।
हरिद्वार जैसे मैदानी जिलों की औसत आय पौड़ी या चमोली जैसे पहाड़ी जिलों से लगभग दो गुना है। राज्य के सकल घरेलू उत्पाद का 40 प्रतिशत केवल तीन मैदानी जिलों से आता है, जबकि दस पहाड़ी जिले पिछड़े हैं।
झारखंड को चाहिए कि वह अपने खनिज राजस्व का बड़ा हिस्सा आदिवासी कल्याण कोष में डाले और पंचायत (अनुसूचित क्षेत्र) अधिनियम का सख्ती से पालन करे, ताकि स्थानीय लोगों को कम-से-कम 50 प्रतिशत रोजगार सुनिश्चित हो। छत्तीसगढ़ अपने सफल खाद्य सुरक्षा मॉडल को सुदृढ़ कर जैविक खेती को वैश्विक पहचान दे सकता है।
उत्तराखंड के लिए राजनीतिक स्थिरता के साथ ही भ्रष्टाचार पर रोक के लिये लोकायुक्त के गठन और प्रभावी आपदा प्रबंधन की आवश्यकता है।
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