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'द सोशल लाइफ ऑफ इंडियन ट्रेन्स': राष्ट्र का मनोविज्ञान रचती भारत की रेल, यह हमारा सांस्कृतिक आर्काइव
Sun, 11 Jan 2026 07:42 AM IST
नितिन गौतम
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नितिन गौतम
Updated Sun, 11 Jan 2026 07:42 AM IST
सार
अमिताव कुमार की यह बेस्टसेलर किताब भारतीय रेल के सामाजिक, राजनीतिक एवं ऐतिहासिक पहलुओं का विश्लेषण करती है और उसे देश की उम्मीदों के एक चलते-फिरते आर्काइव के रूप में पेश करती है।
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लेख
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
लेखक : अमिताव कुमार
प्रकाशक : एलेफ बुक कंपनी
मूल्य : 399 रुपये (हार्डकवर)
अमिताव कुमार की द सोशल लाइफ ऑफ इंडियन ट्रेन्स भारतीय रेल के बारे में है, जिसे हवाई यात्रा के बढ़ते चलन के दौर में हल्के में लिया जाने लगा है। ट्रेनें हमारी जिंदगी का एक अहम हिस्सा रही हैं। अगर कोई चीज इस उपमहाद्वीप जैसे विशाल देश को एकसाथ जोड़ती है, तो वह है रेलवे। कई लोगों की जिंदगी इस पर निर्भर करती है। कुछ लोग रोज ट्रेन से सफर करते हैं, तो कुछ लोगों के लिए यह जीवनरेखा है।
भले ही रेलवे की शुरुआत एक औपनिवेशिक परियोजना के तौर पर हुई, लेकिन दशकों से हमने उन पर इतना हक जमा लिया है कि वह हमारा सांस्कृतिक आर्काइव बन सकती हैं। यह छोटी-सी किताब कुछ हद तक रिपोर्टिंग है, कुछ हद तक संस्मरण, कुछ हद तक इतिहास, और कुछ व्यंग्य।
लेखक ट्रेनों के सफर के रोजमर्रा के जीवन का इतिहास लिखने के विचार से एक ही बार में उत्तर से कन्याकुमारी तक पूरे भारत की यात्रा हिमसागर एक्सप्रेस से करते हैं, जो 12 राज्यों से होते हुए लगभग 3,800 किलोमीटर की दूरी तय करती है। मगर यह किताब रेलवे का इतिहास नहीं है, बल्कि एक तरह की रिपोर्टिंग है, जो यादों, मुलाकातों, पुराने और आज के आर्काइव्स तथा एक समृद्ध पृष्ठभूमि को ध्यान में रखती है, जिस पर यह साहित्यिक ट्रेन अपनी यात्रा करती है। लेखक ट्रेन को माध्यम बनाकर समाज की वास्तविकता, राजनीति, संस्कृति और नैतिक माहौल को एक बाहरी व्यक्ति की तरह समझना चाहते हैं। लेखक हमें अजनबियों के साथ बातचीत में शामिल करते हैं : आसपास की बर्थ पर बैठे लोग, भीड़ भरे गलियारों में, टॉयलेट के पास इंतजार करने वाले और सोने वाले लोग। एक तरह से, पाठक इस किताब में चलते-फिरते भारत को देखते हैं।
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लेखक गांधी की ट्रेन यात्राओं से प्रेरित होने के बारे में लिखते हैं और बताते हैं कि जिस रेलवे ने उपनिवेशवाद की मदद की, वही उसके खिलाफ एक मजबूत दीवार भी साबित हुई; इसने गांधी को बनाया, जिन्होंने साम्राज्य को खत्म कर दिया। इस पुस्तक में समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट, 26/11 के दौरान छत्रपति शिवाजी टर्मिनस, गोधरा दंगों के दौरान ट्रेन जलाने की घटना, फिर कोविड-19 के दौरान स्टेशनों से निकली आखिरी ट्रेनें, भगदड़ और बंटवारे की ट्रेनों आदि का जिक्र किया है, लेकिन लेखक ने उस पर गंभीर राजनीतिक टिप्पणी करने से परहेज किया है, जो अखरने वाली है।
अमिताव कुमार ने समकालीन अंग्रेजी लेखन में अपनी खास जगह बनाई है। द सोशल लाइफ ऑफ इंडियन ट्रेन्स एक सरल किताब है, लेकिन सतही नहीं, बल्कि समझदारी भरी अवलोकन वाली है। यह किताब आपको याद दिलाती है कि भारतीय रेलवे सिर्फ परिवहन का एक और माध्यम नहीं है, बल्कि यह देश की उम्मीदों, चिंताओं और विरोधाभासों का एक चलता-फिरता आर्काइव है।
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प्रकाशक : एलेफ बुक कंपनी
मूल्य : 399 रुपये (हार्डकवर)
अमिताव कुमार की द सोशल लाइफ ऑफ इंडियन ट्रेन्स भारतीय रेल के बारे में है, जिसे हवाई यात्रा के बढ़ते चलन के दौर में हल्के में लिया जाने लगा है। ट्रेनें हमारी जिंदगी का एक अहम हिस्सा रही हैं। अगर कोई चीज इस उपमहाद्वीप जैसे विशाल देश को एकसाथ जोड़ती है, तो वह है रेलवे। कई लोगों की जिंदगी इस पर निर्भर करती है। कुछ लोग रोज ट्रेन से सफर करते हैं, तो कुछ लोगों के लिए यह जीवनरेखा है।
भले ही रेलवे की शुरुआत एक औपनिवेशिक परियोजना के तौर पर हुई, लेकिन दशकों से हमने उन पर इतना हक जमा लिया है कि वह हमारा सांस्कृतिक आर्काइव बन सकती हैं। यह छोटी-सी किताब कुछ हद तक रिपोर्टिंग है, कुछ हद तक संस्मरण, कुछ हद तक इतिहास, और कुछ व्यंग्य।
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लेखक ट्रेनों के सफर के रोजमर्रा के जीवन का इतिहास लिखने के विचार से एक ही बार में उत्तर से कन्याकुमारी तक पूरे भारत की यात्रा हिमसागर एक्सप्रेस से करते हैं, जो 12 राज्यों से होते हुए लगभग 3,800 किलोमीटर की दूरी तय करती है। मगर यह किताब रेलवे का इतिहास नहीं है, बल्कि एक तरह की रिपोर्टिंग है, जो यादों, मुलाकातों, पुराने और आज के आर्काइव्स तथा एक समृद्ध पृष्ठभूमि को ध्यान में रखती है, जिस पर यह साहित्यिक ट्रेन अपनी यात्रा करती है। लेखक ट्रेन को माध्यम बनाकर समाज की वास्तविकता, राजनीति, संस्कृति और नैतिक माहौल को एक बाहरी व्यक्ति की तरह समझना चाहते हैं। लेखक हमें अजनबियों के साथ बातचीत में शामिल करते हैं : आसपास की बर्थ पर बैठे लोग, भीड़ भरे गलियारों में, टॉयलेट के पास इंतजार करने वाले और सोने वाले लोग। एक तरह से, पाठक इस किताब में चलते-फिरते भारत को देखते हैं।
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अमिताव कुमार ने समकालीन अंग्रेजी लेखन में अपनी खास जगह बनाई है। द सोशल लाइफ ऑफ इंडियन ट्रेन्स एक सरल किताब है, लेकिन सतही नहीं, बल्कि समझदारी भरी अवलोकन वाली है। यह किताब आपको याद दिलाती है कि भारतीय रेलवे सिर्फ परिवहन का एक और माध्यम नहीं है, बल्कि यह देश की उम्मीदों, चिंताओं और विरोधाभासों का एक चलता-फिरता आर्काइव है।