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हिंदू नववर्ष 2022 विशेष: भारतीय नववर्ष का वैज्ञानिक तथा पौराणिक महत्व

Fri, 01 Apr 2022 12:59 PM IST
Rajesh Verma राजेश वर्मा
Updated Fri, 01 Apr 2022 12:59 PM IST
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The Scientific and Mythological Significance of Indian Nav varsh
हिंदू नववर्ष चैत्र नवरात्रि - फोटो : अमर उजाला

नववर्ष के दिन प्रत्येक इंसान चाहे कहीं भी हो अपने आपको को उत्साहित, प्रफुल्लित व नई उर्जा से ओतप्रोत महसूस करता है। अधिकतर देशवासी 1 जनवरी को ही नववर्ष की शुरुआत मानते हैं लेकिन अपनी संस्कृति व इतिहास के प्रति हमारी उदासीनता के चलते यह सत्य नहीं है। 1 जनवरी से शुरू होने वाला कैलेंडर तो ग्रिगोरियन कैलेंडर है। इसकी शुरूआत 15 अक्टूबर 1582 को इसाई समुदाय ने क्रिसमस की तारीख निश्चित करने के लिए की थी क्योंकि इससे पहले 10 महीनों वाले रूस के जूलियन कैलेंडर में बहुत सी कमियां होने के कारण हर साल क्रिसमस की तारीख निश्चित नहीं होती थी। इस उलझन को सुलझाने के लिए 1 जनवरी को ही इन लोगों ने नववर्ष मनाना शुरू कर दिया।

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क्या हम भारतीयों ने भी यह सोचा की हमारा नववर्ष कबसे शुरू होता है? हमारा अपना क्या इतिहास है? ठीक है किसी को भी कोई भी उत्सव जब मर्ज़ी मनाने की स्वतंत्रता होनी चाहिए यह उसका अपना निजी अधिकार है लेकिन क्या हम अपनी संस्कृति व अपने संस्कारों की तिलांजलि दे कर उत्सव मनाएं? आज जिस भारतीय संस्कृति का अनुसरण विदेशी लोगों ने करना शुरू किया है उसी भारतीय संस्कृति व सभ्यता को हम तहस-नहस करने पर तुले हैं।
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भारतीय कैलेंडर के अनुसार नववर्ष का आगाज 1 जनवरी से नहीं बल्कि चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा से नवसंवत्सर आरंभ होता है जो अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार अक्सर मार्च-अप्रैल माह में आता है। हिंदू नववर्ष यानी संवत 2079 इस वर्ष 2 अप्रैल यानी शनिवार से शुरू होने जा रहा है। शास्त्रों में कुल 60 संवत्सर बताए गए हैं। मान्यता है कि नए वर्ष के प्रथम दिन के स्वामी को उस वर्ष का स्वामी मानते हैं। 2 अप्रैल को शनिवार का दिन है इसलिए इस वर्ष के देवता शनि महाराज हैं। 
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इसके साथ ही नवसंवत्सर का निवास कुम्हार का घर व समय का वाहन अश्व होगा। भारतीय हिंदू कैलेंडर की गणना सूर्य और चंद्रमा के अनुसार होती है। दुनिया के तमाम कैलेंडर किसी न किसी रूप में भारतीय हिंदू कैलेंडर का ही अनुसरण करते हैं। भारतीय पंचांग और काल निर्धारण का आधार विक्रम संवत ही हैं। जिसकी शुरुआत मध्य प्रदेश की उज्जैन नगरी से हुई। यह हिंदू कैलेन्डर राजा विक्रमादित्य के शासन काल में जारी हुआ था तभी इसे विक्रम संवत के नाम से भी जाना जाता है। विक्रमादित्य की जीत के बाद जब उनका राज्यारोहण हुआ तब उन्होंने अपनी प्रजा के तमाम ऋणों को माफ करने की घोषणा करने के साथ ही भारतीय कैलेंडर को जारी किया इसे विक्रम संवत नाम दिया गया।

The Scientific and Mythological Significance of Indian Nav varsh
यूनानियों ने नकल कर भारत के इस हिंदू कैलेंडर को दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में फैलाया। - फोटो : istock

विक्रम संवत आज तक भारतीय पंचाग और काल निर्धारण का आधार बना हुआ हैं। सबसे बड़ी विशेषता इस कैलेंडर की यह है कि यह वैज्ञानिक रूप से काल गणना के आधार पर बना हुआ है। सभी 12 महीने राशियों के नाम पर हैं, इसका समय 365 दिन का होता है। बात करें चन्द्र वर्ष की तो इसके महीने चैत्र से प्रारम्भ होते हैं। इसकी समयावधि 354 दिनों की होती है शेष बढ़े हुए 10 दिन अधिमास के रूप में माने जाते हैं। ज्योतिष काल की गणना के अनुसार इसके 27 प्रकार के नक्षत्रों का वर्णन है। एक नक्षत्र महीने में दिनों की संख्या भी 27 ही मानी गई है। सावन वर्ष में दिनों की संख्या लगभग 360 होती है और मास के दिन 30 होते हैं वैसे तो अधिमास के 10 दिन चन्द्रवर्ष का भाग है लेकिन इसे चंद्रमास न कह कर अधिमास कह दिया जाता है। 

यही नहीं यूनानियों ने नकल कर भारत के इस हिंदू कैलेंडर को दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में फैलाया। भले ही आज दुनिया भर में अंग्रेजी कैलेंडर का प्रचलन बहुत अधिक हो गया हो लेकिन फिर भी भारतीय कलैंडर की महत्ता कम नहीं हुई। आज भी हम अपने व्रत-त्यौहार, महापुरुषों की जयंती-पुण्यतिथि, विवाह व अन्य सभी शुभ कार्यों को करने के मुहूर्त आदि भारतीय कलैंडर के अनुसार ही देखते हैं। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही वासंती नवरात्र भी प्रारंभ होते हैं। सबसे खास बात इसी दिन ही सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी। ताज्जुब होता है जिस भारतीय कैलेंडर ने दुनिया भर के कैलेंडर को वैज्ञानिक राह दिखाई आज हम उसे ही भूलने लग गए हैं।

पड़ोसी देश चीन नववर्ष मनाने में अपनी संस्कृति का अनुसरण करता है, चीनी चांद आधारित कैलेंडर के अनुसार अपना नववर्ष मनाते हैं। चीनी नववर्ष को ‘लूनर न्यू ईयर’ के नाम से भी जाना जाता है। चीनी नव वर्ष चीन में सबसे महत्वपूर्ण छुट्टियों में से एक है चीन में हर नववर्ष को किसी पशु का नाम दिया जाता है जैसे चूहा, बैल, बाघ, खरगोश, सांप, घोड़ा, भेड़, बंदर,मुर्गा,कुत्ता और सुअर आदि इस वर्ष 2022 बाघ का वर्ष है, चंद्र नव वर्ष 2022 इस साल 1 फरवरी को पड़ रहा है पिछली बार 12 फरवरी को शुरू हुए नववर्ष को बैल (ऑकस) का नाम दिया गया था। इस साल चंद्र नव वर्ष के समारोह 31 जनवरी और 1 फरवरी को होंगे। पारपंरिक तौर पर इस जश्न की शुरूआत पहले दिन की शाम से शुरू होकर महीने के 15 वें दिन में होने वाले लालटेन उत्सव तक चलती रहती है।

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अपने धर्म व संस्कृति के उत्सवों को मनाने का सभी में लगाव होना चाहिए। - फोटो : istock

नव वर्ष के पहले दिन नया चांद निकलता है। चीनी नेता भी इस मौके पर लोगों को बधाई देते हैं। चीनी नववर्ष का सामाजिक तौर पर भी बहुत महत्व है यह नववर्ष चीनी लोगों में मेल-मिलाप कराता है, सभी झगड़ों को मिटाता है और सभी को सुख समृद्धि की शुभकामनाएं देता है। नए साल के अगले दिन बच्चे अपने माता-पिता को नववर्ष की बधाई देते है, लाल कागज के लिफाफे में माता-पिता अपने बच्चों को पैसे देते हैं। चीन में यह त्योहार सबसे लंबी राष्ट्रीय छुट्टी का पर्व है। करीब 30 करोड़ प्रवासी मजदूर अपनी जमा पूंजी के साथ अपने माता-पिता और गांवों में अपने बच्चों से मिलने व नववर्ष मनाने के लिए चले जाते हैं।

दूसरी तरफ हम भारतीय हिंदू नववर्ष के दिन शुभकामनाएं देने से हिचकिचाते हैं शायद इसलिए की कहीं हम पर रूढ़ीवादी का टैग न लग जाए? जबकि अपनी संस्कृति संस्कारों का अनुसरण करना रूढ़िवादीता नहीं। यह तो वह बहुमूल्य धरोहर है जिससे एक तरफ पूरा विश्व सीख रहा है तो दूसरी ओर हम इस धरोहर को खोते जा रहें हैं। दुनिया को राह दिखाने वाली संस्कृति आज खुद राह से भटकने को मजबूर है। भले ही आज सोशल मीडिया पर हिंदू नववर्ष को मनाने के लिए हम सब संदेशों को प्रचारित प्रसारित कर रहे हों लेकिन हकीकत में उस दिन को भूल जाते हैं। 

अपने धर्म व संस्कृति के उत्सवों को मनाने का सभी में लगाव होना चाहिए। हमारे महापुरुषों व वीर योद्धाओं ने धर्म व संस्कृति की रक्षा के लिए बहुत बलिदान दिया है क्या वह बलिदान इसलिए ही दिया था की एक दिन हम अपनी संस्कृति व धर्म को ही भूल जाएं। अभी भी समय है सभी को मिलजुलकर ऐसा प्रयास करना चाहिए जिससे विश्व में हमारी संस्कृति का एक ऐसा संदेश जाए की हम 100 करोड़ से उपर भारतीय अपनी संस्कृति को संरक्षित रखने के लिए एकजुट हैं। क्या अब भी हमें अपने हिंदू कैलेंडर के अनुसार नववर्ष को नहीं मनाना चाहिए? जिसमें पूरे ब्रह्माण्ड की रचना है। आओ इस हिंदू नववर्ष को धूमधाम से मनाएं और आपसी भाईचारे व प्रेम को विश्वभर में ले जाएं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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