फिल्म "द कश्मीर फाइल्स": इतिहास के कोलाहल में सच की तलाश
“किसी समस्या को बताने में फिल्मों का किरदार वाकई बड़ा अहम होता है। कश्मीरी पंडित पिछले 32 साल से आतंकवाद के शिकार रहे हैं। घाटी में अपना घर और अपनी संपत्ति छोड़कर दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। 'द कश्मीर फाइल्स' में उस रक्त-रंजित हिंसा और पलायन का हिस्सा दिखाया गया है।
“किसी समस्या को बताने में फिल्मों का किरदार वाकई बड़ा अहम होता है। कश्मीरी पंडित पिछले 32 साल से आतंकवाद के शिकार रहे हैं। घाटी में अपना घर और अपनी संपत्ति छोड़कर दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। 'द कश्मीर फाइल्स' में उस रक्त-रंजित हिंसा और पलायन का हिस्सा दिखाया गया है।
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विस्तार
'द कश्मीर फाइल्स' के रिलीज होने के बाद 1990 के दशक के दौर में शुरू हुई हिंसा और मारकाट में जान गंवाने वाले कश्मीरी पंडितों की संख्या पर देशभर में बहस छिड़ गई है। शेख अब्दुल्ला परिवार के वारिस और मुख्यमंत्री रह चुके उमर अब्दुल्ला समेत कई नेता कह रहे हैं कि उस समय आतंकवादियों ने हज़ारों कश्मीरी पंडित नहीं, बल्कि ‘केवल’ 219 कश्मीरी पंडित की हत्या की थी।
दरअसल, दुनिया के इतिहास में संभवतः पहली बार मौत की संख्या से पहले ‘केवल’ लगाया जा रहा है। यह ‘केवल’ इंसान की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। कोई भी सभ्य इंसान इससे ज़्यादा असंवेदनशील नहीं हो सकता कि वह यह कहे कि ‘केवल’ इतने ही लोग मारे गए या ‘केवल’ इतने ही लोग ज़िंदा जलाए गए। मतलब अगर एक समुदाय के लोगों की हत्याएं हज़ारों की संख्या में नहीं हुई हैं, तो उन्हें महत्व देने की बिल्कुल भी ज़रूरत नहीं है।
इधर, एमआईएम के नेता सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने भी लोकसभा में बहस के दौरान अपना पक्ष रखते हुए कहा कि 1990 के दशक में आतंकवाद के पनपने के बाद से ‘केवल’ 219 कश्मीरी पंडितों का ही क़त्ल किया गया और घाटी से पांच लाख नहीं बल्कि ‘केवल’ दो लाख कश्मीरी पंडितों का ही जेनोसाइड हुआ था।
इधर, कई लोग तो आरटीआई का हवाला देकर यह भी दावा कर रहे हैं कि कश्मीर वैली में मौजूदा आतंकवाद के शिकार कश्मीरी पंडितों से अधिक मुसलमान हुए हैं। इतना ही नहीं यह भी कहा जा रहा है कि पंडितों से अधिक मुसलमान मारे गए और पंडितों से ज़्यादा में मुसलमान कश्मीर से बाहर भागकर गए।
सवाल कई हत्याओं और एक हत्या का नहीं है, दरअसल संवदेना का है। सवाल उठना लाजिमी है कि क्या देश के राजनेताओं की ओर से ऐसी त्रासदी पर इस तरह की तुलना ठीक है? ख़ासकर तब जब घाटी से बाहर गए मुसलमानों के घर अब भी महफ़ूज़ हैं, जबकि कश्मीरी पंडितों के घर या तो जला दिए गए या उन पर पड़ोसियों ने क़ब्ज़ा कर लिया।
दरअसल, आज से कोई छह लाख साल पहले इंसान भी जानवरों की तरह ही व्यवहार करता था। तब उसमें संवेदना नाम की चीज नहीं थी। लेकिन लाखों साल की यात्रा के दौरान वह सभ्य होता चला गया। वह संवेदनशील होता चला गया। वह दूसरों के दर्द महसूस करने लगा। बाद में इंसान ने अपने लिए रोटी के साथ साथ कपड़े का प्रबंध किया।
इस तथ्य की तुलना में पिछले आठ हजार साल से इंसान जंगल में नहीं बल्कि घर में रह रहा है। अभी कुछ सदी पहले ही इंसान ने इंसान के उत्पीड़न या हत्या को अमानवीय करार देते हुए मानवाधिकार जैसा शब्द प्रतिपादित किया।
आज भी दुनियाभर के कमोबेश सभी देश मानवाधिकार की पैरवी करते हैं। तालिबान और आईएसआईएस के नियंत्रण वाले क्षेत्रों को छोड़ दें तो पूरी दुनिया में मानवाधिकार का सम्मान किया जाता है। इंसान, वह चाहे किसी भी धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा, नस्ल या लिंग का हो, की हत्या को जघन्य माना जाता है।
आज के दौर का सबसे विकट सवाल यह है कि जब किसी गैर-इस्लामिक देशों में मानवाधिकार हनन की घटनाएं होती हैं तो उनका मुखर विरोध किया जाता है। मानवाधिकार हनन करने वाले की मज़म्मत की जाती है। कुछ लोग तो देश या राज्य को ही कठघरे में खड़ा करने लगते हैं।
इससे मानवाधिकार हनन की घटनाएं वैश्विक सुर्खियां बनने लगती हैं। लेकिन कुछ खास मौकों पर मानव अधिकारों के हनन और हत्याओं पर अपने को प्रगतिशील कहने वाला तबक़ा अचानक से मौन हो जाता है। यही नहीं एक वर्ग विशेष के पैरोकार को कठघरे में देखकर उसके सुर बदल जाते हैं। अभी कुछ साल पहले रोहिंग्या मुसलमानों के उत्पीड़न पर गला फाड़कर चिल्लाने वाले लोग कश्मीरी पंडितों के मुद्दे पर हमेशा ख़ामोश रहे। यह उनकी सोच पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
इतिहास पर नजर दौड़ाई जाए तो यह बात सौ फ़ीसदी सच है कि जिस दिन जगमोहन मल्होत्रा को जम्मू-कश्मीर का दोबारा राज्यपाल बनाया गया, उसी दिन यानी 19 जनवरी 1990 को मस्जिदों से चेतावनी दी गई थी कि या तो कश्मीरी पंडित धर्म परिवर्तन करके मुसलमान बन जाएं या फिर कश्मीर से बाहर चले जाएं अन्यथा उन्हें और उनके परिवार को जान से मार दिया जाएगा।
आज भी ज़्यादातर कश्मीरी मुसलमान यही मानते हैं कि कश्मीरी पंडितों का पलायन जगमोहन ने करवाया था, क्योंकि उनका प्लान कश्मीरी पंडितों को सुरक्षित बाहर निकालकर कश्मीर में बड़ी सैन्य कार्रवाई करने का था। हालांकि अपनी आत्मकथा ‘माई फ्रोजेन टर्बुलेंस इन कश्मीर’ में जगमोहन ने इसे अफवाह क़रार देकर इस आरोप को सिरे से ख़ारिज़ कर दिया है।
1990 में अचानक कश्मीर से जान बचाकर जम्मू पहुंचने पर कश्मीरी पंडितों को शरणार्थी कैंप में घर दिया गया। जनवरी और फरवरी तक तो ठीक रहा, लेकिन इसके बाद जम्मू की प्रचंड गर्मी उनके लिए एकदम से असहनीय हो गई। कश्मीरी पंडित गर्मियों के मौसम में बीमार हो गए, क्योंकि कश्मीर में वे सदियों से ठंडे मौसम में रह रहे थे और अचानक से जम्मू में 45 डिग्री के ऊपर तापमान में रहना उनके लिए भट्ठी में रहने जैसा हो गया था।
पिछले 32 साल से कश्मीरी पंडित जम्मू के शरणार्थी कैंप में इसी तरह से बीमारी की हालत में रह रहे हैं। यदा-कदा मीडिया में ख़बर आ जाने के बाद लोग उनकी खोज-ख़बर लेते हैं फिर भूल जाते हैं।
1990 के दशक के बाद जम्मू-कश्मीर में जो कुछ हो रहा है, उसे केवल कश्मीरी पंडितों के ख़िलाफ़ कार्रवाई कह कर दरकिनार नहीं किया जा सकता है।
इतिहास के आईने में कश्मीर
कश्मीर दुनिया की इकलौती जगह है जिसका शुरू से अब तक लिखित इतिहास मौजूद है। इस्लाम के आगमन से पहले कश्मीर का दायरा मीरपुर, मुजफ्फराबाद, गिलगित-बाल्टिस्तान, अक्साई और क़ाराक़ोरम दर्रे तक फैला हुआ था और 90 फ़ीसदी से अधिक आबादी हिंदू और 9 फ़ीसदी बौद्ध थी।
यहां के इतिहास में 1320 में अहम मोड़ आया। बौध तिब्बती रिंचन सदर-उद-दीन के नाम से पहला मुस्लिम शासक बना। रिंचन हिंदू बनना चाहता था, लेकिन बौद्ध होने के कारण ब्राह्मणों ने कहा कि हिंदू बनाने पर उसे उच्च जाति में शामिल करना पड़ेगा, जो संभव नहीं था। हिंदुओं द्वारा ठुकराए जाने के बाद रिंचन सूफ़ी संत बुलबुल शाह की शरण में गया और इस्लाम क़बूल कर लिया। उसके सुल्तान बनने के बाद लोग बड़ी तेज़ी से इस्लाम को अपनाने लगे।
कश्मीर में इस्लामीकरण की शुरुआत 1379 में कुतुबुद्दीन के शासनकाल में फ़ारसी संत सैयद अली हमदानी के अपने 600 शागिर्दों के साथ कश्मीर आने के बाद से मानी जाती है। कर्मकांडी प्रपंचों से त्रस्त ग़ैर-सवर्ण हिंदू समाज के लिए जाति-पांति का भेद न करने वाला इस्लाम मुक्तिदाता की तरह भी था।
दरअसल, इस्लाम ने सदियों पुराने ब्राह्मणवाली समाज के विभाजनकारी सामाजिक ढांचों को ध्वस्त कर दिया। 14वीं सदी में रिंचन के समय कश्मीर की 90 फ़ीसदी से अधिक आबादी हिंदू थी, लेकिन 19वीं सदी में जब दीवानचंद मिश्र शासक बने, तो 90 फ़ीसदी से अधिक आबादी मुस्लिम हो चुकी थी।
2011 की जनगणना के अनुसार कश्मीर घाटी में इस समय दस जिलों में मुस्लिम आबादी 97 फीसदी से अधिक है। जबकि हिंदुओं की आबादी दो फ़ीसदी से कम हो गई है। अगर इसमें सिखों और बौद्ध अनुयायियों को जोड़ दें तब भी बमुश्किल तीन फ़ीसदी होती है।
कहने का मतलब महज लगभग सात सौ साल में ही कश्मीर घाटी की डेमोग्राफी उलट गई। हिंदू शासकों ने तो मुस्लिमों का शोषण नहीं किया लेकिन मुस्लिम सुल्तानों ने हिंदुओं का घोर उत्पीड़न किया। हिंदुओं के उत्पीड़न का सिलसिला अंग्रेज़ों के शासन में थम गया था।
आजादी मिलने और 26 अक्टूबर को जम्मू-कश्मीर के भारत का हिस्सा बनने के बाद भी घाटी में हिंदू आबादी ने खुद को कभी असुरक्षित महसूस नहीं किया। लेकिन 1987 के विधानसभा चुनाव के बाद, खासकर जनरल जिया-उल-हक के ऑपरेशन टोपैक के बाद हिंदुओं पर हमले की ख़बरें आने लगी थीं। आतंकवाद की ज़मीन यहां उसी साल तैयार की जाने लगी।
ग्लोबल टेररिस्ट सैयद सलाउद्दीन उर्फ मोहम्मद यूसुफ शाह ने 1987 में मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट के टिकट पर श्रीनगर के आमिर कडल विधानसभा से चुनाव लड़ा था, लेकिन कहा जाता है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस के ग़ुलाम महिउद्दीन शाह को विधान सभा में भेजने के लिए धांधली की गई। हारने के बाद सलाउद्दीन मुज़फ़्फ़राबाद चला गया। आज़ादी और जिहाद के नारे पर 1989 में उसने हिज़बुल मुजाहिद्दीन की स्थापना की। 1989 में राजीव गांधी की भारी पराजय के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह ने सत्ता संभालने के बाद अलगाववादी नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद को गृहमंत्री बना दिया।
8 दिसंबर 1989 की शाम गृहमंत्री की बेटी रूबिया सईद के अपहरण की ख़बर आ गई। रूबिया अपनी ड्यूटी पूरी होने के बाद घर के लिए निकली, लेकिन उसे अगवा कर लिया गया। घटना के दो घंटे बाद ही जेकेएलएफ के जावेद मीर ने कश्मीर टाइम्स और द ग्रेटर कश्मीर को फोन करके गृहमंत्री की बेटी के अपहरण की जिम्मेदारी ली। रूबिया के अपहरण की खबर आते ही कोहराम मच गया। केंद्र सरकार ने रूबिया को मुक्त करने बदले में पांच-पांच दुर्दांत आतंकवादी छोड़ दिए। उसके बाद घाटी में जो खूर-खराबा शुरू हुआ वह आज तक जारी है।
आतंकवाद से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में से एक दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग में 1990 में अपना घर-बार छोड़कर जम्मू पलायन करने वाले वरिष्ठ पत्रकार प्रभु राज़दान कहते हैं-
“किसी समस्या को बताने में फिल्मों का किरदार वाकई बड़ा अहम होता है। कश्मीरी पंडित पिछले 32 साल से आतंकवाद के शिकार रहे हैं। घाटी में अपना घर और अपनी संपत्ति छोड़कर दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। हम लोग आतंकवाद रूपी महादानवी ख़तरे के बारे में दुनिया को आगाह कर रहे थे, अपनी पीड़ा बताने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन हमारी बात किसी ने नहीं सुनी। धन्यवाद 'द कश्मीर फाइल्स' कि उसने उस रक्त-रंजित हिंसा और पलायन का एक छोटा सा हिस्सा दिखाने की हिमाकत तो की है।”
अनंतनाग के ही पहलगाम के चीरहमदान गांव के रहने वाले संजय कौल बताते हैं-
उनके गांव में 50 घर कश्मीरी पंडितों के थे। कश्मीर खाली करने का फतवा जारी होने पर सभी हिंदुओं को भागकर जम्मू आना पड़ा। उनका परिवार भी शरणार्थी कैंप में रह रहा है। हालांकि वह इस पलायन के लिए केवल मुसलमानों को ज़िम्मेदार नहीं मानते, क्योंकि उनका कहना है कि गांव से निकल कर भागने में मुसलमानों ने पंडितों की मदद की।
संजय कौल कहते हैं कि 1990 तक कश्मीर में 3.5 लाख कश्मीरी पंडित थे, अब मुश्किल से एक हजार से कुछ अधिक होंगे।
वस्तुतः 'द कश्मीर फाइल्स' 1989-90 में आतंकवाद के उभार के बाद श्रीनगर और घाटी के अन्य हिस्से में कश्मीरी पंडितों द्वारा सहे गए क्रूर कष्टों की सच्ची कहानी बताती है। यह सच्ची कहानी है, जो कश्मीरी पंडित समुदाय के नरसंहार के पीड़ितों के वीडियो साक्षात्कार पर आधारित है।
फिल्म बर्फ़ पर खेले गए एक क्रिकेट मैच से शुरू होती है। जहां सचिन तेंदुलकर का समर्थन करने पर आतंकवादी कश्मीरी बच्चे पर हमला कर देते हैं। अंत में आतंकी सेना की वर्दी पहन कर लोगों को बचाने का झांसा देकर लाइन में खड़ा करके गोली मार देते हैं।
ईमानदारी से कहा जाए तो बॉलीवुड की फिल्में शुरू से ही एक ख़ास विचारधारा से प्रेरित होकर बनाई जाती रही हैं। ऐसी विचारधारा आतंकवाद को आतंकवाद कहने से परहेज़ ही नहीं करती है, बल्कि उसका पुरज़ोर विरोध भी करती है। वैसे कश्मीर समस्या पर अब तक कुल 15 फिल्में बनी हैं, लेकिन 'रोज़ा' और 'मिशन कश्मीर' को छोड़कर बाकी सभी फ्लॉप रही हैं।
यहां तक कि श्रीनगर में पैदा होने और पलने-बढ़ने वाले फिल्मकार विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म 'शिकारा' भी कहीं न कहीं उसी विचारधारा से प्रेरित लगी थी। 'द कश्मीर फाइल्स' बॉलीवुड की खाटी परंपरा के विपरीत बनी फिल्म लग रही है। विवेक अग्निहोत्री और पल्लवी जोशी की यह फिल्म 1989-90 के बाद कश्मीरी पंडितों के कत्लेआम की झांकी पेश करती है। यही वजह है कि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बड़े बजट की फिल्मों को मात दे रही है।
यह भी सच है कि 'द कश्मीर फाइल्स' सिर्फ फिल्म नहीं है, बल्कि यह एक पूरी पीढ़ी का या यूं कहें कि देश का गिल्ट है। नई पीढ़ी फिल्म देखकर अचानक झटके से नींद से जाग गई है। पिछले 32 साल के दौरान नई पीढ़ी ने सरसरी तौर पर सुना था कि तब कश्मीरी पंडितों को कट्टरपंथियों ने उनके घरों से भगा दिया था लेकिन उससे ज़्यादा उन्हें कुछ पता नहीं था। और आज जब इस फिल्म ने उस पुरानी त्रासदी एक-एक रेशा उघाडकर रख दिया है तो पूरा देश आत्मग्लानि और सदमे में चला गया है।
साहित्य ही नहीं बल्कि फिल्म भी समाज का दर्पण होता था। फिल्म के बारे में यह कथन अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं है। बशर्ते फिल्म ईमानदारी से बनाई जाए, कथा-तथ्यों एवं घटनाओं पर लीपा-पोती न की जाए और यह फिल्म 1990 के दशक के दर्पण की तरह है।
प्रभु राजदान आगे कहते हैं-
पिछले 32 साल से हम लोगों ने जो कुछ सहा है, यह फिल्म उसका बहुत संक्षिप्त कहानी प्रस्तुत करती है। नरेंद्र मोदी सरकार आठ साल से सत्ता में है, हम शुरू से मांग करते रहे हैं कि कश्मीर में नरसंहार की जांच के लिए एक जांच आयोग का गठन किया जाए, ताकि जिम्मेदार लोगों की शिनाख्त करके उहें दंडित किया जाए। इससे दूध का दूध और पानी का पानी और कश्मीरी पंडितों को न्याय मिल सकेगा।
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