पर्यावरण और सवाल: समुद्री पक्षियों पर प्लास्टिक प्रदूषण के प्रभाव
समुद्री पक्षी महासागर के दूर दराज द्वीपों प्रजनन करते हैं जहां कई बार इंसानी गतिविधियां न के बराबर होती हैं। परन्तु फिर भी इंसानों द्वारा निर्मित एक ऐसा वस्तु है जो समुद्री पक्षियों के लिए एक भयंकर संकट बन चुका है और वह है प्लास्टिक।
समुद्री पक्षी महासागर के दूर दराज द्वीपों प्रजनन करते हैं जहां कई बार इंसानी गतिविधियां न के बराबर होती हैं। परन्तु फिर भी इंसानों द्वारा निर्मित एक ऐसा वस्तु है जो समुद्री पक्षियों के लिए एक भयंकर संकट बन चुका है और वह है प्लास्टिक।
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समुद्री पक्षी मुख्यतया: महासागर पर निर्भर रहने वाले पक्षी हैं। वे ज्यादातर अपना जीवनकाल मुख्य भूखंड से दूर समुद्र में व्यतीत करते हैं तथा महासागर के हर छोर पर पाए जाते हैं। इन पंछियों के पंख जलरोधक होते हैं और खारे पानी से नमक को अलग करने की इनमें विशेष क्षमता होती है। समुद्रीय पारिस्थितिक तंत्र को बनाए रखने में इनकी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है।
समुद्री पक्षी महासागर के दूर-दराज द्वीपों प्रजनन करते हैं जहां कई बार इंसानी गतिविधियां न के बराबर होती हैं। परन्तु फिर भी इंसानों द्वारा निर्मित एक ऐसा वस्तु है जो समुद्री पक्षियों के लिए एक भयंकर संकट बन चुका है और वह है प्लास्टिक।
आज तक जितने भी प्लास्टिक का निर्माण हुआ है, वह अभी भी धरती पर मौजूद हैं। इस सदी के पहले दशक में इतनी मात्रा में प्लास्टिक का निर्माण हुआ है, जो सन् 2000 से पहले कभी नहीं हुआ। वर्तमान में समुद्र में लगभग 15 -51 ट्रिलियन प्लास्टिक के कणों के मौज़ूद होने का अनुमान लगाया गया है।
प्लास्टिक की उपस्थिति हज़ारों मीलों दूर समुद्र के बीचों-बीच स्थित द्वीपों पर भी दर्ज की गई है। उत्तर पैसिफिक में ग्रेट पैसिफ़िक गार्बेज पैच नाम से जाना जाने वाला विशाल कचरे का खंड है जो आकार में अमेरिका के टेक्सास राज्य से दोगुना है। प्लास्टिक की समस्या, समुद्री तट से लेकर महासागर की गहराईयों और दूरवर्ती द्वीपों पर भी गंभीर रूप लेती जा रही है।
हर साल हजारों की तादाद में समुद्री पक्षियों के प्लास्टिक निगलने के प्रमाण पाए गए हैं। ऐसा अनुमान लगाया गया है कि प्रत्येक वर्ष लगभग 1 मिलियन पक्षियों की प्लास्टिक निगलने के कारण मृत्यु होती है। सन् 1960 में, 5 प्रतिशत से भी कम पक्षियों के पेट में प्लास्टिक पाए गए थे। अब 20 साल बाद यह संख्या 10 गुना बढ़ के 80 प्रतिशत हो गई है। यह समस्या बहुत ही गंभीर है और विस्फोटक तरीके से बढ़ती जा रही है, जिसके कारण इन पक्षियों की जन्संख्या और प्रजनन पर विशेष रूप से प्रभाव पड़ सकता है। सन् 2050 तक 99 प्रतिशत समुद्रीय पक्षियों के प्लास्टिक निगलने के खतरे का अनुमान है।
वैज्ञानिक शोध से यह जाना गया है की समुद्री पक्षियों में प्लास्टिक निगलने के अनेक गंभीर प्रभाव हो सकते हैं। वयस्क पक्षी गलती से प्लास्टिक के कचरे को शिकार समझकर चूजों को खिला देते हैं जो बहुत छोटे, और शिकार करने के लिए तैयार नहीं होते हैं। प्लास्टिक निगलने से इन चूजों की वयस्कता तक पहुंचने की संभावना कम हो जाती है। प्लास्टिक पक्षियों के पेट में जमा होने लगता है, जिसकी वजह से भुखमरी जैसी स्थिति पैदा होने से इनकी मृत्यु हो जाती है। मृत समुद्री पक्षियों के पेट में काफी मात्रा में प्लास्टिक पाया गया है।
प्लास्टिक के सेवन के बाद समुद्री पक्षियों में स्वास्थ्य से जुड़े कई प्रकार की समस्याएं देखी गई हैं, जैसे जो पक्षी वयस्कता तक जीवित रह जाते हैं उनके शरीर का विकास कम होता है। उनके पंख और चोंच छोटे रह जाते हैं और शरीर का वजन भी कम होता है। प्लास्टिक पक्षियों में गुर्दे संबधित विकार से यूरिक एसिड की मात्रा बढ़ने के साथ कोलेस्ट्रॉल एवं एन्ज़इम्स के निर्माण पर भी विपरीत प्रभाव डालता है।
प्लास्टिक निगलने की समस्या समुद्री सतह पर शिकार करने वाले जैसे अल्बाट्रोस या गोते लगाने वाले जैसे पफिंस में भी पाई गई है। कुछ समुद्री पक्षी जैसे ऐल्बाट्रॉस प्लास्टिक पर दिए हुए मछलियों के अंडे या फिर प्लास्टिक के टुकड़ों को स्क्विड समझ कर खा जाते है। प्लास्टिक में उलझने और फंसने से भी कई समुद्री पक्षी घायल हो जाते हैं या संक्रमण के शिकार हो जाते है या फिर डूब जाते हैं। जाल में फसने के कारण उनकी चाल और गति धीमी हो जाती है जिससे वो आसानी से अन्य जानवरों के शिकार बन जाते है।
कुछ पक्षी प्लास्टिक को अपने घोसले बनाने के उपयोग में लाते हैं। इन पक्षियों के घोंसले में मछली पकड़ने वाले जाल और नायलॉन रस्सियां में प्राकृतिक सामग्री जैसे समुद्री शैवाल और सूखी टहनियों के साथ सयुंक्त की जाती है । घोसला बनाने में प्लास्टिक के उपयोग का दुष्प्रभाव अभी समुद्री पक्षियों में पूरी तरह ज्ञात नहीं हुआ है।
इंसानों द्वारा उत्पादित प्लास्टिक का असर दूरगामी क्षेत्रों में निवास करने वाले समुद्री पक्षियों पर भी हो रहा है। मुख्य भूभाग में प्लास्टिक का कुप्रभंधन न सिर्फ नदियों, भूमि और सागरी किनारों को दूषित कर रहा है बल्कि सुदूर इलाकों में भी समस्या बन चुका है। प्लास्टिक का उचित प्रबंधन और दुष्प्रभावों के बारे में जागरूकता बढ़ाने की सख़्त आवश्यकता है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।