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हिन्दी साहित्यकारों का प्रिय पक्षी खंजन
सार
खंजन का चेहरा सफेद, आंखें काली और पंख काले, सफेद और स्याह का मिश्रण होते हैं। अक्सर ये पानी के किनारे कीड़े मकोड़ों का शिकार करता है और दौड़कर चलता है, अन्य पक्षियों की भांति फुदकता नहीं।
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खंजन पक्षी।
- फोटो : मनीष कुमार
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विस्तार
हिंदी साहित्य में अगर किसी पक्षी का सबसे ज्यादा जिक्र हुआ है तो वो है खंजन। तुलसीदास से लेकर मैथलीशरण गुप्त इनके नैनों की चंचलता पर मुग्ध रहे हैं। अमृतलाल नागर ने तो सूरदास पर लिखी अपनी किताब का नाम ही रख दिया खंजन नयन तो तुलसीदास जी ने रामचरितमानस की एक चौपाई में सीता जी की आंखों की तुलना खंजन पक्षी से कर दी।
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रंगरूप के आधार पर खंजन, सफेद, पीला, धूसर आदि कई श्रेणियों में बांटा जाता है पर इन प्रवासी खंजनों में सबसे ज्यादा तादाद सफेद खंजन की है जिसे भारत के कई इलाकों में धोबन के नाम से भी जाना जाता है।
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खंजन का चेहरा सफेद, आंखें काली और पंख काले, सफेद और स्याह का मिश्रण होते हैं। अक्सर ये पानी के किनारे कीड़े मकोड़ों का शिकार करता है और दौड़कर चलता है, अन्य पक्षियों की भांति फुदकता नहीं।
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कहते हैं कि पानी के किनारे दिखने और पंखों को कपड़ों की तरह लगातार झटकने की वज़ह से आम बोलचाल में इसका नाम धोबन पड़ गया। अंग्रेजी में इसलिए इस प्रजाति के पक्षी को वैगटेल के नाम से जाना जाता है।
सर्दियों की आहट पाते ही सफेद खंजन मध्य एशिया और साइबेरिया के ठंडे प्रदेशों से भारत के मैदानी इलाकों में फैल जाता है। ठंड के मौसम में इसकी उपस्थिति को ध्यान में रख महाकवि तुलसीदास ने रामचरितमानस में कहा भी है जानि सरद रितु खंजन आए। बिहार में ये अक्टूबर से मार्च महीने तक सबसे ज्यादा देखा जाता रहा है।
वैसे तो जलाशयों के इर्द गिर्द इसे बिहार के अधिकांश जिलों में देखा जा चुका है पर विगत कुछ वर्षों में इसकी सबसे ज्यादा रिपोर्टिंग भागलपुर, कटिहार पूर्णिया, पश्चिमी और पूर्वी चम्पारण, नालंदा और पटना जिलों से हुई है। अप्रैल में तापमान बढ़ते ही ये वापस यूरेशिया के ठंडे इलाकों का रुख करते हैं। इन्हीं ठंडे इलाकों में वो प्रजनन करते हैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।