रामचरितमानस और सियासत: भारतीय समाज के लिए अति महत्वपूर्ण हैं तुलसी और उनकी ये अद्भुत रचना
तुलसीदास के ग्रंथों और काव्य रचनाओं को आधार बनाकर असंख्य शोध और संस्थान स्थापित हो चुके हैं। ऐसे में एकाएक गोस्वामी तुलसीदास जी को भारतीय संस्कृति के आधारभूत धारणाओं में से बहिष्कृत कर देने की साजिश जरूर महाअंधकार के बढ़ जाने का संकेत है।
विस्तार
22 साल की उम्र में मैंने जब नौकरी शुरू की तब अध्यापन करते हुए सबसे ज्यादा कठिन मुझे तुलसीदास के काव्य को पढ़ाने में ही होती थी। फिर मेरी भेंट हरदा के उत्सव तुलसी में व्याख्यान देने पधारे आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी जी से हुई। उनके सामने भी मैंने अपनी यही समस्या रखी कि मैं सभी कवियों को आसानी से पढ़ा लेती हूं लेकिन तुलसीदास मुझे समझ ही नहीं आते। आप बताएं मैं तुलसीदास जी को कैसे समझूं?
उन्होंने मुझे गुरु मंत्र की तरह एक युक्ति बताई कहा- रोज रामचरित मानस कि पांच चौपाइयों का नियमित पाठ किया करो। उपाय सरल था, कर लिया। आज तुलसीदास के समन्वय को समाजनीति को राजनीति को सबको समझना मेरे लिए सरल हो गया। वाल्मीकि रामायण से लेकर साहित्य में राम के जीवन वृत्त को लेकर कई रामचरित रचे गए। पर जो स्थान रामचरित मानस का लोक में है वह भारत के किसी साहित्यिक रचना को नहीं मिला।
तुलसीदास जी ने संस्कृत भाषा के ज्ञान विद संस्कार छोड़कर राम के चरित को जन-जन के हृदय में बसती लोक भाषा अवधी में रचा। जिसे पढ़ना समझना सरल था।
साहित्य और भाषा जिन रचनाकारों की उंगली थामे अपने विकास के पद चिन्ह धरता है, उनमें समाहित हैं- कबीर, सूर, रैदास और गोस्वामी तुलसीदास जी। गोस्वामी तुलसीदास जी तो हर घर की बुनियाद हैं। यदि आज घर-घर से गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरित मानस जैसा ग्रंथ हटा दिया जाए तो भारतीय समाज खोखला और निष्प्राण हो जाएगा।
तुलसी की रचना में राम सामान्य, लेकिन आदर्श
घर -परिवार जिस आदर्श भाव भूमि को लेकर अपनी आस्था को, अपनी भक्ति को, अपने आत्मबल को, अपने विचार की पृष्ठभूमि में जिस राम को प्रतिष्ठित पाते हैं, उसके निर्माता तो गोस्वामी तुलसीदास ही हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी जिस राम का परिचय हमसे कराते हैं वह बिलकुल हमारी ही तरह हाड़-मांस का असल मनुष्य ही है जो सीता के हरण पर वन-वन लता वृक्ष से पता पूछते हैं और लक्ष्मण को जब शक्ति लगती है तो हनुमान से अनुनय करते हैं। विकल होकर आंसू बहाते हैं।
ये है गोस्वामी तुलसीदास जी की लेखनी का चमत्कार, जो विराट को भी लघु मानव में चित्रित कर देते हैं। राम ही हैं जो समुद्र के मार्ग न देने पर क्रोधित होकर समुद्र को सुखा देने के लिए शर संधान को तत्पर हो जाते हैं।
राम के जीवन के उतार-चढ़ाव को जिस खूबी से गोस्वामी जी ने हर भारतीय के मन-मानस में पिरो दिया वैसी छवि को मन से बाहर निकाल पाना जन-जन के मन के लिए बड़ा ही दुष्कर कार्य है। भारत ही नहीं विश्व के बहुत से विश्वविद्यालयों में तुलसी के राम को शोध का विषय बनाकर शोध हुए होंगे।
तुलसीदास के ग्रंथों और काव्य रचनाओं को आधार बनाकर असंख्य शोध और संस्थान स्थापित हो चुके हैं। ऐसे में एकाएक गोस्वामी तुलसीदास जी को भारतीय संस्कृति के आधारभूत धारणाओं में से बहिष्कृत कर देने की साजिश जरूर महाअंधकार के बढ़ जाने का संकेत है।
भारतीय संस्कृति की पृष्ठभूमि में से गोस्वामी तुलसीदास जी के रामचरितमानस को हटाने की करतूत वैसी ही है जैसे जन-मन में बैठे राम की छवि को पोंछने का असफल प्रयास करना। न राम को मन से निकाला जा सकता न भक्ति की अजस्र धारा प्रवाहित करते गोस्वामी तुलसीदास जी को ही मिटाया जा सकता है।
तुलसीदास जी विचार हैं, विचार कभी नष्ट नहीं होते। राम एक विचार हैं, जो कालावधि बीतने पर भी सदा संचरणशील रहेंगे ।
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