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Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   sushant singh rajput suicide cases in india why do people commit suicide every year people commit suicide due to poverty

आत्महत्या के मामलों को गंभीरता से देखना होगा सरकारों को

सार

  • कोटा में ही अलग-अलग हालातों में छात्र ,छात्राएं आत्महत्याएं करते रहे हैं।
  • किसानों की आत्महत्या का एक बढ़ा आंकड़ा है।
  • ऐसे कोन से हालात हो जाते हैं कि एक हंसता खेलता व्यक्ति डिप्रेशन में आता है और फिर खुद ही खुद की बेरहमी से हत्या कर लेता है

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sushant singh rajput suicide cases in india why do people commit suicide every year people commit suicide due to poverty
गरीब लोग गरीबी से तंग आकर सामूहिक आत्महत्याएं कर रहे हैं- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हत्या और आत्महत्या भी वीआईपी होती है। इसका विश्लेषण, समीक्षा, अखबारों, टी वी की खबरों का अंदाज भी इसी से तय होता है। फिल्म इंडस्ट्री में आत्महत्याएं होती रही हैं, क्यों होती हैं, किसलिए होती हैं, पुलिस अनुसंधान के बाद फाइल बंद हो जाती है। मीडिया चुप हो जाता है।

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लेकिन देश में जो माहौल है इस माहौल में रोज किसान, मजदूर, मध्यमवर्गीय, परिवारों में सास-बहु,पति-पत्नी के विवादों सहित गरीबी एक मात्र वजह होने से सैकड़ों आत्महत्याएं प्रतिदिन होती हैं। उन्हें अखबार हो, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हो फोकस नहीं करता।
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कोटा में ही अलग-अलग हालात में छात्र ,छात्राएं आत्महत्याएं करते रहे हैं। किसानों की आत्महत्या का एक बड़ा आंकड़ा है। मजदूर तो रोज मर ही रहे हैं। कईं ऐसे मामले हैं कि गरीब लोग गरीबी से तंग आकर पहले अपनी बीवी,अपने बच्चों की हत्या कर रहे हैं, फिर खुद मर रहे हैं,सामूहिक आत्महत्याएं हो रही हैं।
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आश्चर्य है कि ऐसे में मनोवैज्ञानिक, मनोचिकित्सक, समाजशास्त्री विशेषज्ञों को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर बिठाकर कभी चर्चाएं नहीं हुई। आर्थिक हालात की वजह से आत्महत्याएं क्यों होती हैं? गरीब डिप्रेशन में क्यों हैंं? छात्र-छात्राएं कोचिंग स्थलों पर क्यों डिप्रेशन में मरते हैं? किसान किन हालात में आत्महत्याएं कर रहे हैं?

मजदूर उसका परिवार सामूहिक आत्महत्याएं क्यों कर रहा है? इस पर शिद्द्त से कभी बहस नहीं हुई कभी रिसर्च नहीं हुआ। सिर्फ आंकड़ा सामने आया कि हजार से ज्यादा लोग प्रति दिन आत्महत्याएं कर रहे हैं। कोचिंग क्षेत्रों में काउंसलिंग सेंटर खोले गए हैं, कहकर इतिश्री कर ली जाती है। 

खैर वीआईपी आत्महत्या से यह तो तय है की अगर चैनल चिल्लाना बंद नहीं हुए तो इसमें कोई समाधान, कोई भविष्य की रचनात्मक पहल सामने आ सकती है। भक्तजन और भक्तजनों के पत्रकार तो हो सकता है ऐसी आत्महत्याओं के पीछे गांधी जी, नेहरू जी, सोनिया जी, पाकिस्तान, दाऊद इब्राहिम, राहुल जी, प्रियंका जी का हाथ ही साबित कर दें, लेकिन यह हमारे देश के लिए देशवासियों के लिए एक चिंतन का  विषय है।

आखिर अचानक ऐसे कोन से हालात हो जाते हैं कि एक हंसता खेलता व्यक्ति डिप्रेशन में आता है और फिर खुद ही खुद की बेरहमी से हत्या कर लेता है। अभी जो वीआईपी आत्महत्या हुई है उसके ऐंगल बहुत हैं लेकिन जिस तरह से फोटो उजागर हुए है और गले के निशानात सामने आए हैं ,उन्हें मेडिकल जुरिस्परडेंस की नजर से भी देखना जरूरी है।

निशान ऊपर की तरफ यू नहीं बना रहा है, निशान कुछ संकेत भी दे रहा है। यह तथ्य तफ्तीश के हैं लेकिन यह सच है कि समाज में रिश्तों के प्रति उपेक्षित रवैये,सेल्फिशनेस,अखबारों, टी वी में नकारात्मक खबरें,रोज़गार के अवसर खत्म होना, भूख ,गरीबी, इश्क, आशिकी,फसल खराब होना, कर्जदारी, अचानक विवाद,बेटे बहु,पति-पत्नी,सास,बहु के विवाद सहित कई ऐसे हालात है जो आत्महत्याओं के कारण हैं।                   

गृहमंत्रालय, समाज कल्याण मंत्रालय,रोजगार मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय,श्रम मंत्रालय, महिला बाल कल्याण मंत्रालय सहित संबंधित मंत्रालयों को इस पर चिंतन करना चाहिए क्योंकि आयोग वगेरा तो करोड़ों,अरबों रूपये खर्च कर कोई विशेष ऐसे मामलों में चिंतन रिपोर्ट नहीं दे पाए हैं।



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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