सुशांत सिंह राजपूत और फिल्मी दुनिया: फ्राइडे पर निर्भर रहता है फिल्मी सितारे का भविष्य
- फिल्म उद्योग एक पूरी तरह से असंगठित उद्योग है।
- फिल्म इंडस्ट्री को 'फ्राइडे टू फ्राइडे' इंडस्ट्री भी कहा जाता है।
- फिल्म इंडस्ट्री में एक कहावत मशहूर है, 'रोज कुआं खोदो, रोज पानी पियो'।
- जब तक फिल्म उद्योग के चेहरे से चमक दमक का नकाब नहीं उतरेगा, जब तक यहां से भय और अनिश्चितता का माहौल समाप्त नहीं होगा।
विस्तार
कभी आपने बहुत तेज रोशनी देने वाला बल्ब देखा है? इतनी तेज रोशनी की आंखें चुंधिया जाएं। सब कुछ रोशनी से सरोबार हो जाए। जो भी उसके दायरे में आए चमक जाए। लेकिन वह बल्ब जितनी तेज रोशनी देता है, उसके पीछे उतना ही घना अंधेरा होता है।
लेकिन इस हकीकत को या तो वह बल्ब जानता है या उस बल्ब को बनाने वाला। बाकी लोग तो बस उस रोशनी में नहाते हैं और वाह-वाह करते हैं। फिल्म उद्योग भी ऐसी एक जगह है जिसकी चकाचौंध से पूरा देश सरोबार होता है, उस की चमक दमक से पूरा देश प्रभावित होता है लेकिन मेकअप पुते हुए चेहरों और टीवी तथा अवार्ड शोज में लगने वाले ठहाकों के पीछे की हकीकत केवल वही लोग जानते हैं जो इस उद्योग से जुड़े हुए हैं।
इसके उजाले की चकाचौंध इतनी ज्यादा है कि जब तक सुशांत सिंह राजपूत जैसा कोई प्रख्यात अभिनेता आत्महत्या नहीं कर लेता, कोई भी इसके पीछे झांकने की कोशिश नहीं करता।
फिल्म उद्योग एक पूरी तरह से असंगठित उद्योग है जहां किसी भी काम के लिए आपको किसी भी तरह की योग्यता की बाध्यता नहीं है। अन्य क्षेत्रों में काम पाने के लिए आपको एक निश्चित शैक्षणिक योग्यता या तकनीकी जानकारी की आवश्यकता होती ही होती है लेकिन यहां ऐसा कुछ नहीं है।
एक इंजीनियर भी अभिनेता बन सकता है, एक डॉक्टर भी बन सकता है, एक खदान मजदूर भी बन सकता है और एक भीख मांगने वाला भी बन सकता है। दूसरे क्षेत्रों में अनुभव का भी एक बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान होता है। आप जितने अनुभवी होते जाते हैं उतना ही आपके पद की ऊंचाई बढ़ती जाती है आपकी सैलरी बढ़ती जाती है लेकिन यहां ऐसा भी कुछ नहीं है।
हो सकता है आपको इसलिए काम ना मिले क्योंकि आप ज्यादा अनुभवी हैं। एक से एक सफल और अनुभवी निर्देशकों और अभिनेताओं के साथ आज काम करने को कोई तैयार नहीं है। यह भी हो सकता है कि आज आप यदि एक रुपए कमाते थे तो कल आपको 50 पैसे में ही काम करना पड़े, अर्थात् आप कभी निश्चिंत नहीं हो सकते कि अच्छा मैंने अब यह मुकाम तो हासिल कर लिया है तो अब मुझे यहां से आगे ही आगे जाना है।
आप कभी भी धड़ाम से जमीन पर आ सकते हैं और कभी भी आसमान पर पहुंच सकते हैं। इसीलिए फिल्म इंडस्ट्री को 'फ्राइडे टू फ्राइडे' इंडस्ट्री भी कहा जाता है। एक सफल फिल्म के साथ फ्राइडे को एक सितारा जन्म लेता है और अगले फ्राइडे को एक असफल फिल्म के साथ एक सितारा डूब जाता है और यही अनिश्चितता इस उद्योग से जुड़े लोगों के लिए सबसे घातक होती है।
दूसरे क्षेत्रों में आप साल या 2 साल में एक बार नौकरी के लिए इंटरव्यू देते हैं और हो सकता है सफल हों, हो सकता है असफल हों। अर्थात अगर आप असफल हो भी गए तब भी साल 2 साल के बाद आपको एक बार निराशा का मुख देखना पड़ता है लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक एक्टर को एक रोल पाने के लिए कितनी बार असफलता का मुंह देखना पड़ता है? दर्जनों या कभी-कभी सैकडों स्क्रीन टेस्ट देने के बाद किसी को एक रोल मिलता है।
काम की अनिश्चितता, काम मिलने के बाद भी पैसे मिलेंगे या नहीं मिलेंगे इसका भय...
यहां के लोगों को रिजेक्शन सहने की आदत सी हो जाती है। अगर इतनी बार असफलता का मुंह किसी और काम से जुड़े आदमी को देखना पड़े तो शायद वह झेल ना पाए। प्रसिद्ध होने के अपने फायदे हैं तो नुकसान भी उतने ही हैं। 10 करोड़ महीने कमाने वाले बिजनेस मैन को कोई नहीं जानता किंतु 10 लाख महीने कमाने वाला या 2 लाख महीने भी कमाने वाले एक्टर को सब जानते हैं और जब सब जानते हैं तो उसे एक निश्चित लाइफस्टाइल भी मेंटेन करना ही पड़ता है।
एक काम आया नहीं की महंगी गाड़ियां, पॉश इलाकों में घर, नौकर- चाकर, ड्राइवर, क्लब, रेस्टोरेंट, पार्टियों, और भी ना जाने क्या-क्या के खर्चे बढ़ते चले जाते हैं। अब ऐसे में अगर एक फिल्म पिट गई या एक सीरियल बंद हो गया तो सोचिए उनकी क्या हालत होती होगी।
फिल्म इंडस्ट्री में एक कहावत मशहूर है, 'रोज कुआं खोदो, रोज पानी पियो'। यहां हर आदमी दैनिक वेतन भोगी है। जिस दिन आप काम करते हैं सिर्फ और सिर्फ उसी दिन का पैसा मिलता है। ज्यादातर तो वह भी मिलने में इतनी मुश्किल होती है कि आप के पसीने छूट जाते हैं और एक बार जब आप सुविधाओं के, प्रसिद्धि के, हमेशा चमक दमक में रहने के आदी हो जाते हैं तब फिर गुमनाम बनकर साधारण जीवन जीना बहुत मुश्किल हो जाता है।
काम की अनिश्चितता, काम मिलने के बाद भी पैसे मिलेंगे या नहीं मिलेंगे इसका भय, एक सुविधाजनक जीवन जीने की आदत हो जाने के बाद उसके छूट जाने का भय, इनमें से कोई एक भय ही मनुष्य को तोड़ देने के लिए काफी है और यहां तो इन तीनों का संगम है।
इतना ही नहीं, केवल असफलता ही भयभीत नहीं करती, सफलता भी करती है। एक फिल्म हिट हो जाने के बाद भय लगा रहता है कि अगर अगली फिल्म ना चली तो? दो फिल्म हिट होने के बाद लगता है अगर इसके बाद की फिल्में जनता ने नकार दी तो?
आप जब सुपरस्टार बन जाते हैं, आपके पीछे दर्जनों हिट फिल्मों का ठप्पा लग जाता है फिर भी यह भय नहीं जाता कि यदि कल को मेरी फिल्में में पिटनी शुरू हो गई तो? यदि जनता ने मुझे नकार दिया तो? यदि प्रोड्यूसर- फाईनेंसर्स ने मेरी फिल्मों पर पैसा लगाना बंद कर दिया तो?
क्या होगा अगर मैं कल किसी पार्टी में जाऊं और कोई मुझे नहीं पहचाने तो? यहां जीवन का हर पल अनिश्चितता और भय से भरा है। ना असफलता में चैन ना सफलता में। अगर आप फिल्म इंडस्ट्री को लगातार फॉलो करते हैं, उसके समाचार देखते हैं तो यहां मैंने जो कुछ भी कहा है उस सब के उदाहरण आपके सामने बिल्कुल स्पष्ट सामने आ खड़े होंगे।
शायद आप जानते होंगे कि गुरुदत्त साहब ने भी आत्महत्या ही की थी...
सुशांत सिंह राजपूत की दुर्भाग्यपूर्ण आत्महत्या के पीछे भी तरह-तरह के कारण बताए जा रहे हैं, तरह-तरह के अनुमान लगाए जा रहे हैं, कई लोगों को इसका जिम्मेदार ठहराया जा रहा है; लेकिन जब तक कोई भी बात पूरी तरह से ठोक बजाकर साबित नहीं हो जाती मुझे नहीं लगता कि किसी भी व्यक्ति या संस्था को बदनाम करना चाहिए।
मुझे तो ऐसा लगता है कि इसका जिम्मेदार कोई व्यक्ति हो या ना हो किंतु यह व्यवस्था अवश्य है। यह सिस्टम ही ऐसा है जो प्रसिद्धि और चमक-दमक के बदले मनुष्य का सुख और चैन छीन लेता है। मुझे याद है एक बार मेरे एक शो में एक महत्वपूर्ण रोल के लिए मैंने अपने जमाने की एक मशहूर हीरोइन को फोन किया था।
उनसे मेरी डेढ़ घंटे तक बात होती रही और किस मुद्दे पर? केवल इसी मुद्दे पर कि 20 साल पहले लोगों ने मेरा ग्लैमरस रूप देखा है, लोग मेरे नाम पर आहें भरते थे, लोग मेरे फैशन की नकल करते थे, क्या आज वह मुझे इस अधेड़ उम्र में स्वीकार करेंगे?
मैंने लाख समझाने की कोशिश की किंतु अंततः उनका भय जीत गया और उन्होंने वह रोल करने से मना कर दिया। मैं इस उद्योग जगत का हिस्सा बनने की इच्छा रखने वाले हर नवागंतुक से कहता हूं कि वह यहां आने से पहले कृष्ण चंद्र का उपन्यास 'बावन पत्ते' अवश्य पढें और स्वर्गीय गुरु दत्त साहब की फिल्म 'कागज के फूल' देख कर ही आए।
शायद आप जानते होंगे कि गुरुदत्त साहब ने भी आत्महत्या ही की थी। उनकी इसी फिल्म का एक गीत है जो फिल्म उद्योग की हकीकत को सबके रूबरू कर देता है। उस फिल्म के इसी गीत के साथ जिसे महान शायर कैफी आजमी साहब ने लिखा था मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
उड़ जा, उड़ जा प्यासे भंवरे, रस न मिलेगा खारों में;
कागज के फूल जहां खिलते हैं, बैठ न उन गुलजारों में;
नादान तमन्ना रेती पर, उम्मीद की किश्ती खेती है;
एक हाथ से देती है दुनिया सौ हाथों ले लेती है;
यह खेल है कब से जारी, बिछड़े सभी बारी बारी....
जब तक फिल्म उद्योग के चेहरे से चमक दमक का नकाब नहीं उतरेगा, जब तक यहां से भय और अनिश्चितता का माहौल समाप्त नहीं होगा, जब तक यह असंगठित उद्योग संगठित और व्यवस्थित नहीं होगा, जब तक यहां प्रतिभाओं को बिना भेदभाव के सही सम्मान नहीं दिया जाएगा, और सबसे बड़ी बात, हमेशा बुराई पर अच्छाई की जीत दिखाने वाला यह उद्योग जब तक अपने अंदर की बुराइयों पर विजय प्राप्त नहीं कर लेगा तब तक सुशांत जैसे प्रतिभाशाली सितारे इस व्यवस्था के अंधकार में उसी तरह गुम होते रहेंगे जिस तरह ब्लैक होल बड़े-बड़े सितारों को अपने आगोश में ले कर हमेशा के लिए खत्म कर देता है।
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