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महासागरों के 55 फीसदी प्रदूषण के लिए बड़ी कंपनियां जिम्मेदार, संकट में शार्क मछली का जीवन

Amalendu Upadhyay अमलेंदु उपाध्याय
Updated Mon, 24 Feb 2020 12:11 PM IST
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study of sharks pollution in sea india environment
महासागर का अम्लीकरण का प्रभाव अब शार्क पर भी होने लगा है। - फोटो : PTI

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शार्क मछली पालक देश है। शार्क मछलियों को उनके मांस और पंखों के लिए पकड़ा जाता है। शार्क के पंख मालवन से मडगांव और मंगलूरु जैसे दो प्रमुख मछली व्यापार केंद्रों से चीन और जापान में भेजे जाते हैं। इसी तरह, पोरबंदर से ओखा, वैरावल, मुम्बई, कालीकट और कोच्चि से होते हुए सिंगापुर, हांगकांग और दुबई व आबूधाबी तक शार्क के पंख भेजे जाते हैं।

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शार्क मछलियों के पंखों का उपयोग चीन, जापान, इंडोनेशिया और थाइलैंड जैसे देशों में सूप बनाने और दवाओं में होता है। लेकिन हालिया एक शोध में यह बात सामने आई है कि इस शार्क मछली का जीवन संकट में है क्योंकि महासागर धीरे-धीरे अधिक अम्लीय हो रहे हैं, जिसका सीधा प्रभाव शार्क मछली के पंख और उसकी त्वचा पर पड़ रहा है।
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उधर दूसरे शोध ने उन बड़ी कंपनियों की पहचान की है जो महासागर को अमलीय बनाने का अपराध कर ही हैं। जर्मनी की जैकलीन डेज़िएर्गवा, क्रिस्टोफर आर. ब्रिजेस, जोआचिम एनैक्स और दक्षिणी अफ्रीका की सारिका सिंह, स्वेन ई. केर्वथ, लुत्ज़ और्सवल्ड का एक संयुक्त शोध नेचर पत्रिका में प्रकाशित हुआ है, जिसके मुताबिक महासागर अम्लीकरण शार्क की सख्त त्वचा को ख़राब कर सकता है।
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इस अध्ययन में डीमेरल शार्क प्रजातियों में समुद्र के अम्लीकरण की स्थिति के कारण दंत क्षरण के सबूत पाए गए हैं। एक छोटे से प्रयोग में पाया गया कि नौ सप्ताह तक अम्लीय समुद्री जल के संपर्क में आने से पफैडर शार्क की त्वचा पर कई डेंटिकल्स के किनारों को भुरभुरा कर दिया था। क्षतिग्रस्त डेंटिकल्स शार्क को संक्रमण या चोट की चपेट में ले सकते हैं और शार्क की चिकनी त्वचा पर खिंचाव बढ़ा सकते हैं।

महासागर धीरे-धीरे अम्लीय हो रहे हैं क्योंकि समुद्री जल वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड की बढ़ती मात्रा को अवशोषित करता है और इसे कार्बोनिक एसिड में परिवर्तित करता है। जलवायु परिवर्तन पर काम कर रहे वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि मानव जीवाश्म ईंधन को इसी गति से जलाते हैं और CO₂ को वर्तमान स्तरों पर उत्सर्जित करते रहते हैं, तो वर्ष 2300 तक महासागरों का औसत pH लेवल आज 8.1 से 7.3 तक कम हो जाएगा।
 

study of sharks pollution in sea india environment
पूरी दुनिया में समुद्र में बढ़ रहे प्रदूषण को लेकर चिंता है। - फोटो : पेक्सेल्स

महासागर का अम्लीकरण समुद्री जीवन के लिए कई समस्याओं का कारण बन सकता है। यह क्लैम्स और अन्य द्विपक्षियों के कैल्शियम कार्बोनेट के गोले को कमज़ोर कर सकता है, मूंगों को अधिक भंगुर बना सकता है और कुछ प्राणियों से गलत व्यवहार भी करा सकता है। लेकिन शार्क कैसे प्रभावित हो सकती है, इसके बारे में अभी तक बहुत कम लोगों को पता था। इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने एंडीमिक डेमर्सल शार्क प्रजाति हाप्लोबलफेरस एडवर्ड्स पर हाइपरकेनिया के प्रभाव की जांच की।

वायुमंडल से एन्थ्रोपोजेनिक सीओ-2 का निरंतर अवशोषण समुद्र के अम्लीकरण की चल रही प्रक्रिया को प्रभावित करता है, जिससे औसत CO2 स्तर और CO2 के उतार-चढ़ाव दोनों की मात्रा प्रभावित होती है।

एंथ्रोपोजेनिक कार्बनडाई ऑक्साइड उत्सर्जन के कारण समुद्र के कार्बोनेट रसायन विज्ञान में चल रहे बदलावों का समुद्री जीवों के जीव विज्ञान, वितरण, आकृति विज्ञान, व्यवहार और शरीर विज्ञान पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

समुद्री जल में CO2 के विघटन के परिणामस्वरूप H3O+ आयनों की सांद्रता में शुद्ध वृद्धि हुई है और CO3 (कार्बन ट्राईऑक्साइड) आयनों में कमी पीएच का स्तर कम कर देती है। यह प्रक्रिया समुद्र के अम्लीकरण के रूप में जानी जाती है।

वर्ष 2300 तक समुद्रीय pCO2 के स्तर में वृद्धि के कारण महासागरों का वैश्विक पीएच लेवल 7.3 होने का अनुमान है। नर्म हड्डी की (कार्टिलाजिनस) मछलियां वैश्विक समुद्री पारिस्थितिक तंत्र में महत्वपूर्ण  भूमिका निभाती हैं, जबकि कुछ प्रजातियां मछली व्यवसाय के लिए महत्वपूर्ण हैं। फिर भी इस फाइटिक समूह के लिए समुद्र के अम्लीकरण के खराब परिणामों के विषय में ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया।

अध्ययन कहता है कि शार्क के विकास की धीमी दर, कम फेनोटाइपिक प्लास्टिसिटी और कम अनुकूलन क्षमता के कारण लंबे प्रजनन समय और कम उत्पादकता ने शार्क को जलवायु परिवर्तन से होने वाले प्रभावों से उच्च जोखिम में डाल दिया है।

उधर, वैज्ञानिक पत्रिका एनवायरनमेंटल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि पूर्व-औद्योगिक समय से महासागर के अम्लीकरण के आधे से अधिक के लिए दुनिया की सबसे बड़ी जीवाश्म ईंधन कंपनियों का उत्सर्जन जिम्मेदार है।

यूएसए की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के इतिहास विभाग के बेंजामिन फ्रांता ने अध्ययन में पाया है कि 1880 के बाद से आधे से अधिक समुद्र के अम्लीकरण के लिए शीर्ष जीवाश्म ईंधन कंपनियों का उत्सर्जन ज़िम्मेदार है। महासागर की अम्लता के पांचवें हिस्से से अधिक की वृद्धि के लिए सिर्फ 20 बड़ी कंपनियां जिम्मेदार हैं।

88 सबसे बड़े गैस, तेल और कोयला उत्पादकों और सीमेंट निर्माताओं पर ध्यान केंद्रित करते हुए, अध्ययन ने जीवाश्म ईंधन निष्कर्षण, उत्पादन और उपयोग के दौरान जारी कार्बन के परिणामस्वरूप होने वाले महासागर अम्लीकरण की मात्रा की गणना की।

अध्ययन ने दो समयावधि वर्ष 1880 से 2015 और 1965 से 2015 के दौरान कंपनियों के उत्सर्जन की जांच की। हाल के शोध ने यह प्रमाणित किया है कि 1960 के दशक के मध्य से तेल और गैस उद्योग अपने उत्पादों के जलवायु जोखिमों से भली भाँति अवगत था।

एक बार जब ये जोखिम व्यापक रूप से ज्ञात हो गए तो जीवाश्म ईंधन कंपनियों ने कई मिलियन -डॉलर जनता को यह गलत सूचना देने के अभियान पर फूंक दिए कि जलवायु विज्ञान भी उनके उत्पादनों के जलवायु पर दुष्प्रभाव के विषय में सही नहीं जानता है।

अग्रणी अध्ययन लेखक और यूनियन ऑफ कंसर्नड साइंटिस्ट्स (यूसीएस) के वरिष्ठ जलवायु वैज्ञानिक रशेल लिकर ने कहा, “हम कई दशकों से जानते हैं कि जीवाश्म ईंधन जलाना समुद्र के अम्लीकरण का सबसे बड़ा कारक है, लेकिन हम इस बात पर नज़र रखने में सक्षम नहीं थे कि किसी एक जीवाश्म ईंधन कंपनी ने कितना और किस तरह से समस्या बढाने में योगदान दियाI“

 

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प्रतीकात्मक तस्वीरः समुद्र में बढ़ते प्रदूषण ने पर्यावरण को नष्ट किया है। - फोटो : Pixabay

अध्ययन में पाया गया कि :

1880 से 2015 तक 88 प्रमुख कार्बन उत्पादकों के लिए किए गए उत्सर्जन ने इस अवधि में समुद्र के अम्लीकरण में आधे से अधिक (~ 55 प्रतिशत) योगदान दिया है।

 

1965-2015 से 88 प्रमुख कार्बन उत्पादकों के लिए किए गए उत्सर्जन ने 1880-2015 के बीच महासागर के अम्लीकरण के आधे से अधिक (~ 51 प्रतिशत) योगदान दिया है।

 

1965 के बाद से बीपी, शेवरॉन, एक्सॉनमोबिल और रॉयल डच शेल सहित 20 सबसे बड़ी निवेशक-स्वामित्व वाली और बहुसंख्यक राज्य-स्वामित्व वाली कंपनियों के उत्सर्जन से एक-पांचवें (~ 23 प्रतिशत) से अधिक की अम्लता का पता लगाया जा सकता है।
 

समुद्र के अम्लीकरण से नुकसान का सामना करने वाले क्षेत्रों में कोरल त्रिकोण, बेरिंग सागर और अलास्का की खाड़ी, पेरू करंट, आर्कटिक महासागर और कैलिफोर्निया करंट शामिल हैं।

 

कैलिफ़ोर्निया में बढ़ते समुद्र के अम्लीकरण से वर्तमान में और अधिक मछलियाँ पैदा होती हैं जो अमेरिका के वेस्ट कोस्ट के साथ 43,000 से अधिक रोजगार प्रदान करती हैं, जो पहले से ही समुद्री जल के गर्म होने से प्रभावित हो रहा है।

 

इसी तरह, अलास्का की खाड़ी में समुद्र के अम्लीकरण से मत्स्य पालन पर जोर पड़ता है जो एक ऐसे क्षेत्र में 53,000 से अधिक रोजगार प्रदान करते हैं जो पहले से ही समुद्र के पानी को गर्म करने से प्रभावित हो रहे हैं।

 

कोरल त्रिकोण दुनिया के तीन-चौथाई से अधिक रीफ-बिल्डिंग कोरल का घर है। अम्लीयता बढ़ने से क्षेत्र में लगभग 4.3 मिलियन रोजगार प्रदान करने वाली मछलियों पर जोर पड़ता है, जिसमें इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, पापुआ न्यू गिनी, सोलोमन द्वीप और तिमोर लेस्ते शामिल हैं।

 

महासागर धरती के 70 प्रतिशत से अधिक हिस्से तक फैला हुआ है और गर्मी-बढ़ाने वाले उत्सर्जन से जनित वायुमंडल के अधिकांश तापमान को अवशोषित करता है, जिससे तापमान में वृद्धि होती है। महासागर भी समुद्री रसायन को बदलते हुए, वायुमंडल में उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर लेता है। नतीजतन, समुद्र पिछले 66 मिलियन वर्षों में अद्वितीय दर से अम्लीकृत हो रहा है, जो समुद्री जीवन और तटीय समुदायों के स्वास्थ्य और आजीविका को नुकसान पहुंचा रहा हैI 

 

1880 के बाद से, समुद्र की सतह की पानी की अम्लता 25 प्रतिशत से अधिक बढ़ गई है। यह दोनों अध्ययन हमारे चेतने के लिए काफी हैं। अगर हमारी विकास और ऊर्जा की भूख ऐसे ही बढ़ती रही तो वह दिन दूर नहीं जब इस धरती पर जीवन खोजना मुश्किल हो जाएगा।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।ू
 

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