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रात के 10.30 बजे और वो पांच मिनट का रास्ता..!

Mon, 09 Mar 2020 12:27 PM IST
Neelam Tripathi नीलम त्रिपाठी
Updated Mon, 09 Mar 2020 12:27 PM IST
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story of girl who passed the road in night 10.30 pm
एक लड़की होना कितना भयानक है ये मुझे उस रात समझ आया। - फोटो : Social Media

एक लड़की होना कितना भयानक है ये मुझे उस रात समझ आया। उस दिन मौसम करवट ले रहा था, बारिश बहुत तेज हो रही थी। मॉनिटर पर काम अपनी रफ्तार से हो रहा था कि तभी गीली मिट्टी की सौंधी खुशबू ने मन में उल्लास पैदा कर दिया। बाहर खिड़की से देखा तो बारिश ने पूरी सड़क को गीला कर दिया था। लोग खुद को बारिश से बचाने के लिए सिर को हाथों से ढंककर भाग रहे थे।

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मौसम का ये रुख वाकई खुश कर देने वाला था। समय बीत रहा था, रात और काली हो रही थी साथ ही बारिश की बूंदो की रफ्तार बढ़ रही थी। शुरुआत में तो ये ठंडा मौसम दिल को सुकून दे रहा था लेकिन अब घड़ी का कांटा जैसे-जैसे बढ़ रहा था चिंता की लकीरें भी बढ़ती जा रही थीं। एक घंटा हो गया लेकिन बारिश ने रुकने का नाम ना लिया। अब सुकून पेरशानी का सबब बनने लगा था।
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सोचा कि अब शायद बारिश ना रुके तो घर के लिए कैब कर लेनी चाहिए। ऐप से घर तक के लिए कैब बुक करने की जद्दोजहद शुरू हुई, लेकिन हर बार निराशा ही हाथ लगी। बहुत बार प्रयास किया लेकिन हर बार निराशा के सिवा कुछ हाथ ना लगा। ना चाहते हुए भी ऑफिस में ही रुकना पड़ रहा था।
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story of girl who passed the road in night 10.30 pm
प्रतीकात्मक तस्वीर: रात के अंधेरे में ये समाज आपको किस नजर से देखता है! - फोटो : Pixabay

खैर, बारिश का कहर शांत हुआ लेकिन कैब अब भी साथ नहीं दे रही थी। मन में अनायास ही ख्याल आया कि नजदीकी मेट्रो स्टेशन पांच मिनट ही तो दूर है। मेट्रो से घर जाया जा सकता है। वो तो सेफ है। मैंने शॉर्टकट की बजाय मेन रोड का रास्ता चुनना ज्यादा बेहतर समझा क्योंकि वहां लोगों की आवाजाही ज्यादा होती है।

मुझे बस पांच ही मिनट तो चलना था ये सोचकर मैं ऑफिस से निकल गई। एहतियातन मैंने अपना शरीर ढंका और साथ ही अपना सिर भी। मेरे ऑफिस से मेट्रो स्टेशन तक के उस पांच मिनट के रास्ते ने मुझे एहसास दिलाया कि रात के अंधेरे में ये समाज आपको किस नजर से देखता है। लोगों की नजरें मेरे स्कार्फ को चीरते हुए मुझे घूर रही थी।

बाइक पर आते-जाते लोगों के शब्द मुझे तीर जैसे लग रहे थे। मैं अगर उनके कमेंट को बेहुदा कहूं तो शायद ये उनके लिए बहुत सलीके वाला शब्द होगा। हर कमेंट मेरे अंतरात्मा को झकझोर रहा था। मैंने अपनी आंखों से स्कार्फ हटाकर देखने की भी कोशिश की कि क्या किसी की नजर में नारी के प्रति सम्मान की भावना बची भी है कि नहीं। लेकिन अफसोस वो रास्ता उन लोगों से भरा पड़ा था जहां सब के सब एक ही भाषा का इस्तेमाल कर रहे थे और नजरों में सबके हैवानियत थी और कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें शायद इन सबसे कोई मतलब था ही नहीं।

ये वो लोग होंगे जो अक्सर तमाशबीन बनकर भीड़ को बढ़ाते हैं। अभी इस पांच मिनट के रास्ते में ये कमेंट काफी नहीं थे, कुछ लोग अपनी बड़ी-बड़ी गाड़ियों में अंदर रहकर भी मुझे इस बात का एहसास दिला रहे थे कि इतनी रात में तुम अकेली निकलीं कैसे?

अपनी गाड़ियों से पानी भरे रास्ते पर मुझ पर कीचड़ उछाल कर पता नहीं उन्हें क्या मिल रहा था। मैं ऑफिस तो साफ कपड़ों में गई थी लेकिन मेट्रो स्टेशन तक पहुंचते-पहुंचते मैं कीचड़ से नहा चुकी थी। इस पांच मिनट के रास्ते ने मुझे अंदर से हिला कर रख दिया है। मेरे लिए यह कितना भयावह था इसको शब्दों में शायद ही मैं समझा पाऊं।

रात के 10.30 बजे वो पांच मिनट का रास्ता इस बात का आइना है कि हमने अपनी सोच किस कदर बना रखी है। भले ही मुझे किसी ने छुआ नहीं लेकिन मैं खुद को लुटा हुआ महसूस कर रही थी। मैं आज खुद को अधमरा महसूस कर रही थी। हम एक लड़की को सिर्फ पांच मिनट के लिए एक सुरक्षित माहौल दे नहीं सकते तो एक लड़की का रेप होने से क्या खाक बचाएंगे।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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