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बाल विवाह मुक्त भारत की ओर बढ़ते कदम: कानूनी तंत्र और सामाजिक जागरूकता से आ रहा है बड़ा बदलाव

Wed, 31 Dec 2025 08:42 PM IST
Adarsh Singh आदर्श सिंह
Updated Wed, 31 Dec 2025 08:42 PM IST
सार

  • भारत में सरकार और जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) जैसे नागरिक समाज संगठनों के प्रयासों से बाल विवाह के खिलाफ एक मजबूत ईको-सिस्टम तैयार हुआ है।
  • कानूनी हस्तक्षेप, जागरूकता और धर्मगुरुओं की भागीदारी से बाल विवाह की दर में भारी गिरावट आई है। अब बेटियां असहाय नहीं हैं, बल्कि वे खुद अपनी आवाज उठाकर अपना भविष्य सुरक्षित कर रही हैं।

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Steps towards child marriage-free India legal mechanisms and social awareness are bringing about significance
बाल विवाह का दंश झेल रहे मासूम - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

Current Status of Child Marriage in India 2025: तेलंगाना के नागरकुरनूल जिले के एक गांव की अपर्णा (बदला हुआ नाम) सिर्फ 15 साल की थी लेकिन उसके घर वालों ने उसकी शादी तय कर दी और सगाई की तैयारियां चल रही थीं। बच्ची ने मां-बाप से मिन्नतें की लेकिन वे फैसला बदलने को तैयार नहीं हुए। अपर्णा ने अपनी पीड़ा बयान करते हुए एक चिट्ठी लिखी और अपने दोस्तों को सौंप दिया। दोस्तों ने वो चिट्ठी जिले में बाल विवाह के खिलाफ काम कर रहे एक नागरिक समाज संगठन ‘कंजर्वेशन ऑफ नेचर थ्रू रूरल अवेकनिंग’ (सीओएनएआरई) और पुलिस को सौंप दी।

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तत्काल सीओएनएआरई, पुलिस और चाइल्ड हेल्पलाइन के सदस्य उसके घर आए और माता-पिता से हलफनामा लिया कि वे 18 साल से पहले अपर्णा की शादी के बारे में सोचेंगे भी नहीं।
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पश्चिम बंगाल के दक्षिण दिनाजपुर में आधी रात को चाइल्ड हेल्पलाइन के पास फोन आया, "अभी, इसी वक्त जिले के एक मैरिज हॉल में एक बाल विवाह हो रहा है।" एक नाबालिग बच्ची की शादी 37 साल के आदमी से कराई जा रही थी। तुरंत गैरसरकारी संगठन शक्ति वाहिनी की विक्टिम सपोर्ट कोऑर्डिनेटर और बीडीओ के साथ पुलिस टीम मौके पर पहुंची, लेकिन इससे पहले दूल्हा और उसका परिवार भाग चुके थे। फिर भी, दूल्हे, उसके पिता, पंडित और बिचौलिए के खिलाफ पीसीएमए के तहत एफआईआर दर्ज हुई। 
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झारखंड के धनबाद के बाघमारा प्रखंड की दसवीं की छात्रा वंदना (बदला हुआ नाम) के घर वालों ने 26 साल के एक लड़के से उसका विवाह तय कर दिया। लेकिन बच्ची बाल विवाह के खिलाफ काम कर रहे एक गैरसरकारी संगठन झारखंड ग्रामीण विकास ट्रस्ट की पहल ‘किशोरी मंडल’ से जुड़ी थी। उसने संगठन को घटना की जानकारी दी और घर वालों से साफ कर दिया कि अगर उसकी जबरदस्ती शादी की गई तो वह थाने में शिकायत करेगी।

अकेली या असहाय नहीं होती बेटियां

ये सिर्फ कहानियां ही नहीं हैं बल्कि देश में आया एक बदलाव है जिसे देखने से हम चूक गए। वो बदलाव ये है कि आज हमने देश में एक ईको सिस्टम यानी वह परिवेश व तंत्र बना लिया है जहां आज कोई बेटी अकेली या असहाय नहीं होती। कानूनी उपायों से उसकी सुरक्षा से लेकर पुनर्वास तक का एक तंत्र विकसित हुआ है। आज बेटियों में यह हिम्मत आई है कि रिवाजों या परंपरा की ओट में किसी दोगुनी उम्र के आदमी से विवाह को चुपचाप स्वीकार कर लेने के बजाय आवाज उठा सकती हैं।

यह सरकार के साथ मिलकर नागरिक समाज संगठनों की मेहनत है कि आज कोई बच्ची अपना बाल रोकने के लिए आवाज उठाए तो कोई शिक्षक, कोई धर्मगुरु, कोई पुलिस अफसर या कोई गैरसरकारी संगठन का सामुदायिक कार्यकर्ता उसकी मदद को तैयार रहता है। 

यदि स्मृतियों पर जोर डालें तो पता चलता है कि 2006 में देश में बाल विवाह की दर 47.4 प्रतिशत थी। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे- (2019-21) के आंकड़ों के अनुसार देश में बाल विवाह की दर 23.3 प्रतिशत थी। लेकिन नागरिक समाज संगठनों व सरकार के प्रयासों से अब बदलाव की रफ्तार तेज हो चुकी है।

इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन की पहल पर सेंटर फॉर लीगल एक्शन एंड बिहैवियरल चेंज फॉर चिल्ड्रेन (सी-लैब) की सितंबर 2025 में जारी रिपोर्ट ‘टिपिंग प्वाइंट टू जीरो : एविडेंस टूवार्ड्स ए चाइल्ड मैरेज फ्री इंडिया’ के अनुसार देश में लड़कियों की बाल विवाह की दर में 69 प्रतिशत जबकि लड़कों के बाल विवाह की दर में 72 प्रतिशत की गिरावट आई है।

देश के पांच राज्यों के 757 गांवों में किए गए इस सर्वे में महाराष्ट्र में शत प्रतिशत लोगों ने बाल विवाह की रोकथाम के लिए जागरूकता को सबसे प्रभावी उपाय करार दिया तो बिहार में 99 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्हें बाल विवाह से जुड़े कानूनों के बारे में जानकारी है और यह उन्हें गैर सरकारी संगठनों से मिली।

'जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन फॉर चिल्ड्रेन'

आज देश के हर राज्य, हर जिले में ऐसी कहानियां मिल जाएंगी जहां किसी गैरसरकारी संगठन ने किसी गांव में जागरूकता शिविर लगाया और वहीं किसी ने उन्हें बताया कि गांव में एक बाल विवाह होने जा रहा है। कई बार खुद लड़कियां सामने आकर अपना बाल विवाह रुकवाने के लिए मदद मांगती हैं। और इस तरह से बाल विवाह रुकते हैं।

और इन सभी कहानियों के पीछे नाम आता है जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) का। बाल अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए 250 से भी अधिक नागरिक समाज संगठनों का यह नेटवर्क पिकेट रणनीति पर अमल करते हुए बाल विवाह की दृष्टि से संवेदनशील 451 जिलों में जमीन पर काम कर रहा है। इसमें नीति, निवेश, क्षमता निर्माण, ज्ञान, तकनीक और ईको सिस्टम या एक ऐसे परिवेश का निर्माण, जो बाल विवाह को हतोत्साहित करे, शामिल हैं।

सरकार व उसकी एजेंसियों के साथ करीबी तालमेल से काम करते हुए जेआरसी ने अप्रैल 2023 से अब तक 4,00,000 से अधिक बाल विवाह रोके हैं। पढ़ाई छोड़ चुकी सात लाख से अधिक लड़कियों को पिछले एक साल में दोबारा स्कूलों में दाखिल कराया और आर्थिक दृष्टि से संवेदनशील 19 लाख परिवार सरकारी योजनाओं से जोड़े गए।

सबसे बड़ी बात ये है कि बाल विवाह के खिलाफ लड़ाई में सभी धर्मों के तीन लाख से भी अधिक धर्मगुरुओं को जोड़ा गया है।

आज गांवों में मंदिरों-मस्जिदों के बाहर लगे बोर्ड या दीवारों पर लिखा देखा जा सकता है कि बाल विवाह गैरकानूनी है और यहां बाल विवाह संपन्न नहीं कराए जाते। जेआरसी ने अगले एक साल में एक लाख गांवों को बाल विवाह से मुक्त कराने का लक्ष्य रखा है और नेटवर्क की पहुंच के मद्देनजर यह संभव है।

कानूनी हस्तक्षेप, बाल विवाह की रोकथाम के लिए प्रोत्साहन उपायों पर जोर, धर्मगुरुओं सहित पूरा समाज व पूरी सरकार का साथ मिलकर सुरक्षा से पहले रोकथाम, अभियोजन से पहले सुरक्षा और रोकथाम के लिए निवारक उपाय के तौर पर अभियोजन की नीति पर अमल ने आज एक ऐसे बाल संरक्षण तंत्र की नींव रखी है जहां अब कोई बच्चा न अकेला है और न असहाय है। यही 2025 का हासिल है।




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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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