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कश्मीरी पंडितों के दर्द को ठीक से बता नहीं पाई 'शिकारा'

Sat, 08 Feb 2020 07:54 PM IST
Ashish koul आशीष कौल
Updated Sat, 08 Feb 2020 07:54 PM IST
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Shikara Movie Review Vidhu Vinod Chopra Tries to Balance But not justify pain of kashmiri pandit
कितनी सफल है फिल्म के रूप में शिकारा? - फोटो : अमर उजाला

क्या होता है कश्मीरी पंडित होना? कश्मीर में एक गाली और अपने ही देश में एक शरणार्थी। शायद ही दुनिया में कोई इस दर्द को समझ पाए। ऐसे में जब विधु विनोद चोपड़ा उनकी 11 साल से बन रही फिल्म शिकारा के जरिए कश्मीरी पंडितों का सच दिखाने की कोशिश करते हैं तो एक अजीब कौतुहल है।

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दरअसल, देश ने जिस त्रासदी को 30 साल रिफ्यूजी कैंपों में कैद रखा, आज वो एक पैगाम के साथ सिनेमा घर पहुंच गई है। ऐसा लगा कि चलो किसी ने तो हमारे उस दुःख उस पीड़ा को समझा, जिसको झेलकर भी हम एक हिन्दुस्तानी होने में फख्र महसूस करते हैं। शिकारा के साथ एक और फिल्म श्रीनगर भी सिनेमा के परदे तक हमारे समाज पर हुए आतंकवाद की बर्बरता को लोगों तक पहुंचाने का काम करेगी। उम्मीद की एक लौ उसमें भी दिख रही है।  
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क्या उम्मीदों पर खरी उतरी शिकारा? 
शिकारा देख आया हूं। बहुत उलझन में हूं कि ये क्या हो गया? मैं और मेरे जैसे दूसरे कश्मीरी पंडित तो उसमें अपनी बात देखना चाहते थे। जो हमारे साथ हुआ, जिसने किया, जैसे किया, वो देखकर ये आश्वस्त हो जाना चाहते थे कि हमारी बात भले ही 30 साल बाद रखी गई, पर एक स्पष्ट और बेहतर ढंग से रखी गई। एक ओर उससे उबर रहा हूं जो देखकर आया, तो दूसरी ओर परदे पर खुद से छूट चुके कहीं खो गए 30 सालों को देखने का एहसास भी अजीब ही है, जैसे किसी ने दबे घाव को छेड़ दिया हो। 
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यकायक अपना कश्मीर, जिसकी मिटटी में मैं किशोर हुआ वो गलियां जहां क्रिकेट खेला करता था, जैसे दिल चीरते हुए आंखों के आगे से निकल गईं। फिर कुछ ही पलों में कश्मीर के जन्नतनुमा चेहरे के पीछे छुपी हैवानियत भी बाहर आई।

याद आई 19 जनवरी कि किस तरह सात लाख लोग घुट-घुट कर जिए और 19 जनवरी से अपने ही देश में बेगाने हो गए। रिफ्यूजी का चस्पा उस दिन से ऐसा लगा कि वो छूटा नहीं और छूटा हुआ घर अब तक मिला नहीं।

कहना तो होगा कि 'शिकारा' एक कोशिश जरूर है। एक बेहद जरूरी कोशिश जो 30 साल पहले होनी चाहिए थी। सिनेमा हॉल से बाहर निकलकर यादों का जो कभी खौफनाक तो कभी दर्द भरा सफर शुरू हुआ उसमें हलकी-सी एक उम्मीद भी बार-बार झांक रही थी कि शायद इस सफर का अंत जहां होगा वहां कश्मीर वाले अपने घर का दरवाजा साफ दिखाई देगा।

सफर मुंबई वाले घर पर खत्म हुआ और घर की इस दहलीज पर वही कड़वा सच इंतजार कर रहा था। अब कश्मीर हम जैसों के लिए किसी मृगमरीचिका सा है। इसे स्वीकार कर लेने में ही भलाई है। पर फिर जो मैं सिनेमा हॉल में देख कर आया वो क्या था? 

Shikara Movie Review Vidhu Vinod Chopra Tries to Balance But not justify pain of kashmiri pandit
शिकारा कश्मीी पंडितों की कहानी और दर्द को ठीक से नहीं बता पाई। - फोटो : Social Media

शिकार एक कोशिश जरूर लेेकिन?  
एक आम दर्शक के लिए वो एक जाने-माने सफल निर्देशक द्वारा बनाई गई कश्मीर और कश्मीरी पंडितों से जुड़ी बॉलीवुड फिल्म, और मेरे जैसे कश्मीरी पंडित के लिए कोई 'छलावा' जिसका इंतजार था। एक ऐसा छलावा जो कश्मीर के लिए अलख तो जगाए रखता है पर, कश्मीर में शांति का, हमारी घर वापसी का या 80 के दशक वाले आपसी खुलूस का रास्ता नहीं दिखाता।

स्पष्ट कहूं तो इस फिल्म में अपनी उम्मीदें और उम्मीदों वाला सच ढूंढते रह जाओगे। दरअसल, फिल्म देखते ही लगता है कि, 'शिकारा' से शिकार हुई कश्मीरी पंडितों की उम्मीदें।

 
मैं दिमाग पर जोर डाल रहा हूं कि शिकारा एक दर्शक से ऐसा क्या कह रहा है जो आजकल यूट्यूब या इंटरनेट पर उपलब्ध नहीं? मुझे ऐसा लगा कि जैसे मैं नट-नटनी का रस्सी पर चलते हुए बैलेंस बनाने वाला कोई खेल देखकर आया कि जिसमें सारी मेहनत बचकर निकलने में ऐसे लगी कि अपना सच सुनने का इंतजार ऐसे खत्म होगा देखकर सारे जख्म बिलबिला उठे।

सच कहूं तो मेरे लिए सिनेमा हॉल पहुंचने के बाद, फिल्म देखकर घर लौटने तक का सफर उम्मीद से नाउम्मीदी के बीच जैसे झूल सा गया। मुझे उम्मीद थी कि कश्मीर में जो कुछ हुआ वो दो टूक सबके सामने आएगा।

लोग देखेंगे वो घिनौना चेहरा जो मुझ जैसे 6 लाख लोगों ने दम साधकर झेला है। मुझे लगा था कि शिकारा सभ्य समाज के आगे हमारे मन में 30 सालों से चल रहे सवालों की परेड कराएगा, खुद के देश में अगर हम रिफ्यूजी हुए तो उसका जिम्मेदार कौन है, ये जवाबदेही तय करेगा।

पूछेगा इस अंधे बेहरे छद्मविद्वता से भरे समाज से कि जब तुम्हें हर सही गलत, छोटी-बड़ी बात पर मानव अधिकार अक्सर खतरे में दिखते हैं तो हम तुम्हें 30 साल तक क्यों नहीं दिखे? हमारी चीखें तुम्हारे कानों से क्यों नहीं टकराई?

सिर्फ इसलिए कि हम कश्मीरी पंडित 100 फीसदी साक्षर कौम है, सारी समझदारी का बोझ और जिम्मेदारी हमारे ही मत्थे और कंधे क्यों मढ़ा गया? क्या कारण है कि मुंबई और दिल्ली में 'फ्री कश्मीर' के पोस्टरों के साथ-साथ 'जस्टिस फॉर कश्मीरी पंडितों के नारे नहीं लगे?

आज जिस आतंकवाद के साये में हमारे महानगर अपने सारे पर्व और उत्सव मनाते हैं, उसमें मुझे कश्मीरी पंडितों का अभिशाप साफ-साफ दिखाई देता है। साथ ही दिखाई देता है राज्य के द्वारा प्रायोजित आंतकवाद जिसे उस वक्त की सरकारों ने किस तरह अनदेखा करते हुए सात लाख लोगों को टुकड़े-टुकड़े कर आतंकवाद के आलमगीरों के सामने फेंक दिया। 

आज भी हिन्दुस्तान मीठा कहने की बीमारी से इस कदर पीड़ित है कि एक काबिल प्रोड्यूसर-डायरेक्टर को हिंदू आस्था का मजाक बनाने में महज 11 महीने और दुनिया के सबसे बड़े नरसंहार की कहानी को बयां करने में पूरे 11 साल लग जाते हैं। और 11 साल बाद भी फिर वही मानवता का, इंसानियत का, कश्मीरियत का पांखड देखने को मिलता है। शायद हम गलत थे कि अब भी उम्मीद लगाए हुए थे ।                                                                                                                                                      

Shikara Movie Review Vidhu Vinod Chopra Tries to Balance But not justify pain of kashmiri pandit
एक फिल्म के रूप में शिकारा सफल नहीं है। - फोटो : अमर उजाला

क्यों करती है फिल्म निराश 
दिल के किसी कोने में मुझे बहुत उम्मीद थी कि जिस तरह मैंने दो टूक शब्दों में कश्मीर और उसके इतिहास का सच अपनी किताब रिफ्यूजी कैंप के माध्यम से दुनिया तक पहुंचाया, विधु भी इतने साल से ऐसा ही कुछ करने के लिए लगातार प्रयत्नशील हैं। मुझे लगा था कि ये समाज काम से काम अब हमारा सच जानेगा। शायद मैं गलत था या भावातिरेक में था।

अरे जब इस समाज ने अपनी अस्मिता को लुटते हुए नहीं देखा, अपने परिजनों, छोटे मासूम बच्चों की एके-47 से किए क्षत-विक्षत शरीर नहीं देखा, बहनों-बेटियों को आरे पर कटते-लुटते नहीं देखा, अपने घरों को जलते नहीं देखा, 10 हजार सालों की सभ्यता को मिटते नहीं देखा, तो आखिर क्यों उम्मीद की जानी चाहिए कि ये जरा भी समझ पाएगा कि क्या होता है एक कश्मीरी पंडित होना।

शिकारा से उम्मीद थी कि कश्मीरी पंडित दुनिया में एक मजाक से मलहम का सफर तय करेगा। 1990 में जो हमारे साथ हुआ उसकी जवाबदेही तय होगी। उम्मीद को निराशा ने घेर लिया है। शिकारा कश्मीरी पंडितों की संवेदनाओं को अहसास जरूर कराता है पर न्याय की बात कहीं नहीं। अगर एक कौम के साथ गलत हुआ तो भी कई सिरे खुले ही छूट गए कि फिर गलती करने वाले का क्या हुआ?

क्या जिसके साथ गलत हुआ उसके न्याय के लिए क्या किसी ने आवाज उठाई? अगर न्याय नहीं मिल रहा तो कारण क्या है? सारे सवाल जैसे उम्मीदों के बादलों में ही फंसे रह गए, कहानी की धरातल पर उतरे ही नहीं। कहानी इतनी संभलकर कही गई कि ये दिल तक नहीं पाई। सिनेमा हॉल की खाली सीटें भी इसी बात की तस्दीक करती हैं।

क्या मौकापरस्त है बॉलीवुड?  
दरअसल, अब शिकार का सिनेमा घरों तक पहुंचना बॉलीवुड की मौकापरस्ती का सटीक उदहारण है। पिछले दो सालों में, खासकर धारा 370 हटने के बाद कश्मीर में पंडितों की वापसी का माहौल खूब गर्म हुआ और शिकारा शायद इसी मंशा को अहसास कराने के लिए जल्दबाजी में बनी कोशिश है।

शायद इसीलिए विवेक अग्निहोत्री की फिल्म से पहले अपनी फिल्म लाने की चाहत में एक औसत दर्जे की कोशिश की गई। शिकारा न तो कश्मीरी पंडितों पे हुए सदियों के अत्याचार को और न ही पिछले 30 सालों में कश्मीरी पंडित समाज पर विस्थापित होने से सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव को दर्शा पाता है।

विधु विनोद चोपड़ा ने खुद को कश्मीरी बताकर कश्मीरी पंडित समाज की भावनाओं को बेचने की कोशिश की है। शायद कहीं कोई पुरानी प्रेमकथा धूल में लिपटी हुई फाइल से निकाली गई और उसको कश्मीरी पंडितों की भावनाओं वाली चाशनी से लपेट कर जनता को बेवकूफ बनाया गया।

शिकारा एक ऐसा छलावा है जो आने वाली कोशिशों पर भी एक प्रश्नचिन्ह लगा देगा। शायद ही कश्मीरी पंडित समाज अब किसी और फिल्म को इतना अंधा समर्थन दे पाएगा। 
मुझे जितना फख्र ये कहने में है कि मैं एक कश्मीरी पंडित हूं, उतना ही फख्र ये मानने में भी है कि हिन्दुस्तान के लाखों करोड़ों लोगों की तरह मैं भी बॉलीवुड की फिल्मों का मुरीद हूं।  

पिछले कुछ सालों से निर्देशक जिस तरह अनछुए प्रसंगों और मुद्दों पर फिल्में बनाने की हिम्मत कर रहे थे, आशाएं शिखर पर थी। अब सच्चाई के धरातल पर खड़े होकर सिर्फ इतना निवेदन है कि बॉलीवुड हमारे जख्मों में से अपनी फिल्मों को बेचने के लिए मसाला निचोड़ने का मजाक दुबारा न करे। एक आम कश्मीरी पंडित के लिए भी ये एक सीख ही है कि घर तक का रास्ता मिठास से लबरेज दबी-सहमी शिकारा से होकर नहीं गुजरेगा इसके लिए तो वो ही जुझारूपन और जिद के साथ हिम्मत आएगी जो रिफ्यूजी कैंप ने दी है।  

बहरहाल, इस सब के बावजूद विधु बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने वो कोशिश की कि जिसने एहसास कराया कि इस तरह की कोशिशें करत्ते रहने पर भी हो सकता है। किसी दिन बॉलीवुड इतनी हिम्मत जुटा ही ले कि पूरा सच सामने रख पाए।

 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

                                                                                                                                                     

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