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छोटी बच्चियों के साथ यौन हिंसा को लेकर कब संवदेनशील होगा समाज?

Wed, 19 Jun 2019 07:11 PM IST
pallavi saxena पल्लवी सक्सेना
Updated Wed, 19 Jun 2019 07:11 PM IST
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sexual assault and abuse against women and girl child in Indian society
दिन-रात सोशल मीडिया पर पोस्ट उंडेलने वाला समाज इस समय सबसे ज्यादा असामाजिक और संवेदनहीन नजर आता है। - फोटो : सांकेतिक तस्वीर

दिन-रात सोशल मीडिया पर पोस्ट उंडेलने वाला समाज इस समय सबसे ज्यादा असामाजिक और संवेदनहीन नजर आता है। लगता है मानों लोगों में संवेदनाएं शेष नहीं है, जिनमें है वह इस असंवेदनशील समाज में चंद आत्मीय हैं, जो अपने अतिरिक्त अन्य लोगों के विषय में भी सोच लिया करते हैं। लेकिन इस असंवेदनशील समाज के समंदर में ऐसे लोग मुट्टी भर ही होंगे जिनका आने वाले समय में कितना पतन होगा यह न उन्हें पता है न हमें। 

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अब कहीं मासूम सी हंसी किसी का मन नहीं मोह लेती, कोई नन्ही सी किलकारी किसी को सुख नहीं पहुंचाती बल्कि उसके अंदर के जानवर को जगा देती है। अब किसी बुजुर्ग का चेहरा देखकर किसी के मन मे उनके प्रति मान-सम्मान या सद्भावना नहीं आती, बल्कि उनके प्रति क्रूरता आती है।
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कितने संवेदनहीन हो चुके हैं हम 
हम जैसे पढे़-लिखे लोगों का सोशल मीडिया पर जाकर गूगल से एक तस्वीर उठाना और दुख व्यक्त करते हुए आर.आई.पी लिख आना ही हमारे कर्म की इतिश्री और हमारी संवेदनहीनता को दर्शाता है। ऐसे समाज में किसी से क्या संवेदना की उम्मीद रखेंगे आप और क्यों?
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परीक्षा में अनुतीर्ण हुआ बच्चा जब आत्महत्या का सहारा लेता है तो हममें से ही कुछ लोग उस बच्चे की जाति धर्म, समुदाय पहले देखने लगते हैं, लेकिन यह कभी नहीं सोचते की उसकी उस समय क्या मनोदशा रही होगी जिसके कारण उसे जीवन मृत्यु से अधिक कठिन लगा होगा और उसने मृत्यु को चुना होगा। जैसे अभी हाल ही में सूरत में हुई थी जिसमें कोचिंग जाने वाले मासूम बच्चे अग्नि कांड का शिकार हुए और हमने क्या किया रोते हुए नरमुंड के साथ एक बार फिर आर आई पी लिख आए और हो गया।    
 

sexual assault and abuse against women and girl child in Indian society
हाल ही में देश के अलग-अलग हिस्सों से मासूम बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाएं सामने आई हैं। - फोटो : pexels.com

मासम बच्चियों के साथ अन्याय पर क्यों मौन है समाज?  
हाल ही में देश के अलग-अलग हिस्सों से मासूम बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाएं सामने आई हैं। कई बच्चियां सीधे मार दी गईं तो कई हवस की शिकार हुईं। दरिंदे बढ़ रहे हैं और उन्हें सिवाए शरीर के कुछ नज़र नहीं आ रहा। ऐसे लोगों को सिर्फ यह कहकर छोड़ देना की वह दरिंदे हैं, मानवता के नाम पर कलंक हैं, हैवान हैं, शैतान हैं और उन्हें जल्द से जल्द सख्त से सख्त सजा मिलनी ही चाहिए। यह हमारे कर्तव्यों की इति श्री नहीं है।

दरअसल, सोशल मीडिया पर जाकर अपनी इस तरह की टिप्पणी दर्ज करा देने भर से ही हम अपना पक्ष साफ नहीं कर सकते। लेकिन होता यही है कि सिर्फ सजा की गुहार लगाने से ऐसे दरिंदों को सजा नहीं मिलेगी। हमें ही हिम्मत दिखनी होगी और भगत सिंह के कदमों पर चलना होगा। वह यदि वास्तव में कुछ देखना चाहते हैं और मानवता के प्रति नाम मात्र की भी संवेदना रखते हैं तो सबसे पहले यह देखें कि बच्ची, बच्ची होती है हिन्दू की या मुसलमान की है से फर्क नहीं पड़ना चाहिए। वह इंसान की बच्ची है या थी इस बात से फर्क पड़ना चाहिए।

इस तरह की घटनाएं जब भी हमारे सामने आती हैं तब हम में से कुछ धर्म के ठेकेदार सबसे पहले खबर में मसाला ढूंढ ने निकल पड़ते हैं कि पीड़ित बच्ची हिन्दू थी या मुसमान, निचली जाति की थी या आदिवासी। यही नहीं यह सारी घटनाएं जब ही हमारे सामने आती हैं जब उसमें क्रूरता की पराकाष्ठा हो,या दर्शायी गई हो। जैसे निर्भया से लेकर हाल ही में यूपी के अलीगढ़ में मासूम की हत्या की खबरें सामने आईं। 

ऐसे नजाने कितने किस्से कितने जुल्म है जिनके विषय में यदि विस्तार से बात करने निकलें तो शायद शब्द कम पड़ जाएंगे, लेकिन हादसे खत्म न होंगे। चाहे हत्या के मामले में प्रद्युमान ह्त्याकांड हो या पुलवामा हत्याकांड हमारे हजारों जवान शहीद हो गए और लोग उनमें वर्दी ढूंढ रहे थे की कौन से जवान थे क्या उन्हें जवानों का दर्जा हंसिल था?

क्या कागज़ पर भी उनकी गिनती जवानों में होती है? क्या उनके शहीद होने पर उन्हें पेंशन वगैरह मिलती है?

अरे मैं कहती हूं क्या फर्क पड़ता है कि वह आर्मी से थे या नेवी से बीएसफ के थे या पुलिस वाले थे या किसी और सेना के थे। थे तो आखिर हमारे ही देश के जवान ना? जो अपना परिवार छोड़कर हमारे लिए हमारे देश, हमारे शहर, हमारे नगर कि सुरक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। 

दरअसल, हम किसी का दुख बांट सकते हैं परंतु उस दुख को महसूस करने के लिए जब तक हम स्वयं उस दुख से नहीं गुजरते हम अनुमान भी नहीं लगा सकते  कि उस व्यक्ति विशेष या उसके परिवार पर क्या बीत रही होती है। यह सब संवेदनहीनता नहीं है तो और क्या है। 
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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