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दूसरा पहलू: हरियाणा के गांव में 5000 साल पुरानी सभ्यता के राज... तिगड़ाना में वजूद खो रहा है टीला

Tue, 21 Jul 2026 09:38 AM IST
Gurdeep Singh Gurdeep Singh
Updated Tue, 21 Jul 2026 09:38 AM IST
सार

पांच हजार वर्ष पुरानी सिंधु घाटी व हड़प्पाकालीन सभ्यता के राज समेटने वाले हरियाणा के गांव तिगड़ाना का टीला अपना वजूद खो रहा है। मई 2016 में यहां खोदाई की गई थी। तब यहां से कांच की चूड़ियां, सफेद रंग के मनके और मिट्टी के बर्तन बनाने की भट्ठी मिली थी।

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Secrets of 5000 yr old civilization in village of Haryana Tigrana Bhiwani mound losing existence Indus vally
हरियाणा के गांव में हजारों साल पुरानी सभ्यता - फोटो : अमर उजाला प्रिंट / ग्राफिक्स

विस्तार

पांच हजार वर्ष पुरानी सिंधु घाटी और हड़प्पाकालीन सभ्यता के राज समेटने वाले गांव तिगड़ाना का टीला अपना वजूद खो रहा है। करीब 25 एकड़ में फैला यह टीला प्रशासनिक उपेक्षा और पुरातत्व विभाग की अनदेखी के कारण अब मिट्टी का ढेर बन रहा है। आसपास के किसानों ने इसे समतल कर फसलें उगा ली हैं। नतीजतन, पुरातत्व महत्व से जुड़े ऐतिहासिक सबूत और चिह्न मिट चुके हैं। जिस टीले को संरक्षित कर पीढि़यों को इतिहास से जोड़ना था, वह वीरान पड़ा है।

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भिवानी से जींद की तरफ करीब 10 किलोमीटर चलने पर आता है गांव तिगड़ाना। यहां से आठ किमी दूर स्थित है ऐतिहासिक टीला। हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय (पाली) पुरातत्व विभाग के तत्कालीन निदेशक डॉ. नरेंद्र परमार की अगुवाई में मई 2016 में तिगड़ाना के करीब 25 एकड़ क्षेत्रफल में फैले ऐतिहासिक खेड़े की खोदाई की गई थी। टीम को यहां से कांच की चूड़ियां और मिट्टी के बर्तन बनाने की भट्ठी मिली थी। मिट्टी के बर्तन, तांबे की वस्तुएं, फियान्स (पेस्ट मटेरियल की हरे रंग की चूड़ियां) सफेद रंग के मनके भी मिले, जिनका इस्तेमाल गहनों के रूप में किया जाता था।
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अर्ध कीमती पत्थर भी जमीन से निकल चुके हैं। इतिहासकारों के अनुसार, सिंधु घाटी सभ्यता के लोग इनका इस्तेमाल रोजमर्रा के जीवन में करते थे। वे मानते हैं कि उस दौर में तिगड़ाना औद्योगिक केंद्र रहा होगा। यहां से मिले अवशेष महेंद्रगढ़ पाली के केंद्रीय विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग के संग्रहालय में संरक्षित हैं। लेकिन, अब इस ऐतिहासिक टीले की जमीन का एक बड़ा हिस्सा लोगों ने खेती के लिए समतल कर दिया है, जिससे मिट्टी में दबे हजारों साल पुराने अवशेष नष्ट हो रहे हैं। पुरातत्व विभाग को इसे संरक्षित कर इसकी चहारदीवारी करानी थी, पर ऐसा हो नहीं सका। इस कारण टीला धीरे-धीरे गायब होने के कगार पर पहुंच गया है।
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इस ऐतिहासिक टीले की जमीन का एक बड़ा हिस्सा लोगों ने खेती के लिए समतल कर दिया है, जिससे मिट्टी में दबे हजारों साल पुराने अवशेष नष्ट हो रहे हैं। टीला गायब होने के कगार पर पहुंच गया है।


भिवानी जिले में ऐसे पांच ऐतिहासिक स्थल हैं, जहां हड़प्पाकालीन सभ्यता से जुड़े अवशेष मिल चुके हैं। गांव मानहेरू में दिल्ली व महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय का संयुक्त शोध 2009 में किया गया था। तोशाम क्षेत्र के खानक में बनारस विश्वविद्यालय की पुरातत्व टीम 2016 में हड़प्पाकालीन सभ्यता खोज चुकी है। गांव नौरंगाबाद के खेड़े पर 2001 में यौधेय (कुषाण) सभ्यता के अवशेष मिल चुके हैं। गांव मिताथल में 1968 में कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी के प्रो. सूरजभान ने हड़प्पाकालीन अवशेषों की खोज की थी।

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