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हिमानी झीलों पर वैज्ञानिक पहरा या सुरक्षा का भ्रम?

Tue, 20 Oct 2026 05:11 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Tue, 20 Oct 2026 05:11 PM IST
सार

रेफ्रिजरेटर में तापमान का परीक्षण और लगभग पांच हजार मीटर की ऊंचाई पर बर्फबारी, तेज हवाओं, हिम संचय तथा संचार संबंधी बाधाओं के बीच उपकरण की कार्यक्षमता प्रमाणित करना एक समान नहीं है। प्रयोगशाला में प्रारंभिक परीक्षण करना अनुचित नहीं, लेकिन उसे वास्तविक हिमालयी परिस्थितियों में व्यापक परीक्षण का विकल्प नहीं माना जा सकता।

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Scientific monitoring of glacial lakes or an illusion of safety
इस संदर्भ में उत्तराखंड के प्रख्यात भूवैज्ञानिक, हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय क - फोटो : जयसिंह रावत

विस्तार

वैज्ञानिकों की लगातार चेतावनियों और हिमालय में विनाशकारी बाढ़ की घटनाओं के बाद उत्तराखंड सरकार ने चमोली की वसुंधरा ताल में हिमनद झील विस्फोट से उत्पन्न बाढ़ की निगरानी के लिए पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित की है। सरकार इसे हिमालयी आपदा प्रबंधन की महत्वपूर्ण उपलब्धि बता रही है। लेकिन इस उपलब्धि के साथ कुछ गंभीर सवाल भी जुड़े हैं।

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जिस उपकरण के आधार पर हजारों लोगों की सुरक्षा संबंधी निर्णय लिए जाने हैं, यदि वही अस्थिर जमीन पर स्थापित हो और उसका पर्याप्त परीक्षण न हुआ हो, तो वह खतरे की सही चेतावनी कैसे देगा? यदि आपदा के समय चेतावनी देने वाला उपकरण ही नष्ट हो जाए, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? सवाल केवल एक उपकरण की गुणवत्ता का नहीं, बल्कि समूची आपदा प्रबंधन व्यवस्था की विश्वसनीयता का है।
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उत्तराखंड सरकार की यह पहल निस्संदेह स्वागतयोग्य है। हिमालयी आपदाओं से जनजीवन की सुरक्षा के लिए सरकार की सक्रियता आवश्यक भी है। लेकिन सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़ा कोई भी प्रयास तभी सार्थक होगा, जब वह प्रमाणित तकनीक, वैज्ञानिक परीक्षण और हिमालय की वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप हो।
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लगभग 4,800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित वसुंधरा ताल राज्य की संभावित जोखिम वाली हिमनद झीलों में शामिल है। उत्तराखंड में ऐसी 13 झीलें चिह्नित हैं, जिनमें पांच को विशेष निगरानी की आवश्यकता बताई गई है। केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान, रुड़की और वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के सहयोग से यहां लगाए गए उपकरणों से जलस्तर, तापमान, वर्षा, हिम संचय, हवा की गति और जमीन की हलचल संबंधी आंकड़े प्राप्त होने की अपेक्षा है।

लेकिन इस परियोजना की तकनीकी तैयारियों को लेकर कुछ चिंताजनक जानकारियां भी सामने आई हैं। सुविज्ञ सूत्रों के अनुसार उपकरण का वास्तविक हिमनदीय परिस्थितियों में परीक्षण करने के बजाय उसकी ठंड सहने की क्षमता की जांच घर में रेफ्रिजरेटर में की गई। यदि यह जानकारी सही है, तो यह अत्यंत गंभीर मामला है।

रेफ्रिजरेटर में तापमान का परीक्षण और लगभग पांच हजार मीटर की ऊंचाई पर बर्फबारी, तेज हवाओं, हिम संचय तथा संचार संबंधी बाधाओं के बीच उपकरण की कार्यक्षमता प्रमाणित करना एक समान नहीं है। प्रयोगशाला में प्रारंभिक परीक्षण करना अनुचित नहीं, लेकिन उसे वास्तविक हिमालयी परिस्थितियों में व्यापक परीक्षण का विकल्प नहीं माना जा सकता। संबंधित संस्थानों को स्पष्ट करना चाहिए कि उपकरण का परीक्षण कहां, किन परिस्थितियों में और किन वैज्ञानिक मानकों के अनुसार किया गया।

दूसरी महत्वपूर्ण जानकारी उपकरण की स्थापना के स्थान से संबंधित है। बताया जा रहा है कि इसे स्थिर चट्टानी आधार के बजाय अपेक्षाकृत कमजोर हिमोढ़ अथवा मोरेन पर स्थापित किया गया है। हिमोढ़ हिमनद द्वारा जमा किया गया मिट्टी, रेत, कंकड़ और चट्टानी टुकड़ों का असंगठित मलबा होता है। ऐसी संरचनाएं हमेशा ठोस चट्टान की तरह स्थिर नहीं होतीं।

जमने-पिघलने की प्रक्रिया, तापमान में बदलाव और पानी के दबाव से इनमें हलचल हो सकती है। यदि निगरानी उपकरण की नींव ही अस्थिर हो, तो उसकी कार्यक्षमता और सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। हालांकि संबंधित स्थल की वास्तविक स्थिरता भू-तकनीकी परीक्षण से ही निर्धारित होगी। प्रश्न यह है कि उपकरण लगाने से पहले ऐसा परीक्षण हुआ भी था या नहीं?

इस संदर्भ में उत्तराखंड के प्रख्यात भूवैज्ञानिक, हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के भूगर्भ विज्ञान विभागाध्यक्ष तथा उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र के पूर्व निदेशक प्रोफेसर महेंद्र प्रताप सिंह बिष्ट के सुझाव महत्वपूर्ण हैं। प्रो. बिष्ट ने पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने की सरकारी पहल का स्वागत किया है।

उनका मानना है कि हिमालयी आपदाओं से जनजीवन की सुरक्षा के लिए वैज्ञानिक निगरानी अत्यंत आवश्यक है। साथ ही उनका सुझाव है कि उपकरणों की स्थापना के लिए यथासंभव स्थिर चट्टानी आधार चुना जाए और उनकी कार्यक्षमता का वास्तविक हिमालयी परिस्थितियों में परीक्षण किया जाए।

वसुंधरा ताल के संभावित खतरे की ओर प्रारंभिक चरण में ध्यान आकर्षित करने वाले वैज्ञानिकों में प्रो. बिष्ट भी शामिल रहे हैं। उनके अनुसार वर्ष 2021 में उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र के निदेशक रहते उन्होंने उपग्रह आंकड़ों के आधार पर तत्कालीन मुख्य सचिव को पत्र भेजकर डोबाला अथवा वसुंधरा ताल के विस्तार और संभावित खतरे की जानकारी दी थी।

इसके बाद वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के डॉ. मनीष मेहता के नेतृत्व में प्रारंभिक स्थल सर्वेक्षण हुआ। आगे इसरो के वैज्ञानिक डॉ. प्रकाश चौहान के सहयोग से जोखिम वाली झीलों की पहचान का कार्य बढ़ा। इस प्रकार वर्तमान परियोजना के पीछे कई वर्षों के वैज्ञानिक अध्ययन और प्रयास रहे हैं।

प्रो. बिष्ट ने जून 2013 की केदारनाथ आपदा का एक महत्वपूर्ण उदाहरण भी दिया है। उनके अनुसार वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान ने केदारनाथ के पीछे स्थित चोराबाड़ी ताल, जिसे गांधी सरोवर भी कहा जाता है, के हिमोढ़ पर स्वचालित मौसम केंद्र स्थापित किया था।

उस समय झील को अत्यधिक संवेदनशील नहीं माना गया था। लेकिन जून 2013 की असाधारण वर्षा और झील से अचानक पानी तथा मलबे के बहाव के दौरान वहां स्थापित उपकरण का भी पता नहीं चला। उनका सुझाव है कि यदि ऐसे उपकरण सुरक्षित चट्टानी आधार पर स्थापित किए जाएं, तो आपदा के दौरान उनके बचने और महत्वपूर्ण वैज्ञानिक आंकड़े उपलब्ध कराने की संभावना बढ़ सकती है। चोराबाड़ी के उपकरण और उससे प्राप्त आंकड़ों की वास्तविक स्थिति का अभिलेखीय सत्यापन भी उपयोगी होगा।

नेपाल और चीन से जुड़े हिमालयी क्षेत्रों में हाल में हुई विनाशकारी बाढ़ की घटनाओं से भी सबक लेने की आवश्यकता है। प्रो. बिष्ट ने कुछ स्थानों पर हिमोढ़ों पर स्थापित निगरानी उपकरणों के अपेक्षित रूप से प्रभावी नहीं रहने की जानकारी का उल्लेख किया है।

हालांकि, इन घटनाओं के तकनीकी विवरण और उपकरणों की वास्तविक स्थिति की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। फिर भी मूल प्रश्न बना रहता है कि जिस प्राकृतिक संरचना के टूटने या बहने की आशंका हो, क्या उसी पर महत्वपूर्ण निगरानी उपकरण स्थापित करना सबसे सुरक्षित विकल्प है?

हिमालयी झीलों का खतरा लगातार बढ़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार हिंदूकुश हिमालय में वर्ष 2011 से 2020 के दौरान हिमनदों के क्षरण की गति पिछले दशक की तुलना में 65 प्रतिशत बढ़ी। इसरो के अप्रैल 2024 के अध्ययन में हिमालयी नदी घाटियों की दस हेक्टेयर से बड़ी 2,431 झीलों में से 676 के क्षेत्रफल में 1984 से 2023 के बीच उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।

इनमें 601 झीलों का क्षेत्रफल दोगुने से अधिक हो गया था। जून 2013 की केदारनाथ आपदा और अक्टूबर 2023 में सिक्किम की दक्षिण ल्होनक झील से आई विनाशकारी बाढ़ इन खतरों की गंभीरता स्पष्ट करती हैं।

पूर्व चेतावनी प्रणाली की उपयोगिता केवल मौसम संबंधी आंकड़े जुटाने में नहीं है। झील के जलस्तर, प्राकृतिक बांध की स्थिरता, आसपास की ढलानों और संभावित बाढ़ के प्रवाह का वैज्ञानिक आकलन भी जरूरी है। चेतावनी मिलने के बाद उसे प्रभावित बस्तियों तक पहुंचाने और लोगों को सुरक्षित निकालने की व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

केंद्र सरकार ने चार हिमालयी राज्यों में हिमनद झील विस्फोट बाढ़ जोखिम न्यूनीकरण के लिए 150 करोड़ रुपये की योजना स्वीकृत की है, जिसमें उत्तराखंड का हिस्सा 30 करोड़ रुपये है। इतने महत्वपूर्ण सार्वजनिक निवेश का मूल्यांकन उपकरणों की संख्या से नहीं, उनकी वास्तविक उपयोगिता से होना चाहिए।

राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और संबंधित वैज्ञानिक संस्थानों को उपकरणों के परीक्षण, स्थापना स्थल की स्थिरता तथा चेतावनी प्रणाली की कार्यक्षमता पर तथ्यपूर्ण स्पष्टीकरण देना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर स्वतंत्र विशेषज्ञों से तकनीकी मूल्यांकन भी कराया जाना चाहिए। वैज्ञानिक सुझावों को आलोचना के बजाय सुधार के अवसर के रूप में स्वीकार करना ही जिम्मेदार आपदा प्रबंधन की पहचान है।

उत्तराखंड सरकार की सक्रियता सराहनीय है, लेकिन हिमालय में पूर्व चेतावनी प्रणाली की वास्तविक परीक्षा उसके उद्घाटन के दिन नहीं, बल्कि उस संकट की घड़ी में होगी, जब हजारों लोगों का जीवन उससे मिलने वाली सूचना पर निर्भर करेगा। यदि चेतावनी देने वाली प्रणाली ही अविश्वसनीय हो, तो वह सुरक्षा का झूठा विश्वास पैदा कर सकती है।

इसलिए हिमालय की झीलों पर वैज्ञानिक पहरे का अर्थ केवल उपकरण स्थापित करना नहीं, बल्कि उनकी विश्वसनीयता सुनिश्चित करना है। उपलब्धियों का ढोल पीटने से अधिक आवश्यक है वैज्ञानिक सतर्कता, तकनीकी पारदर्शिता और जवाबदेही। आखिर प्रश्न किसी परियोजना की प्रतिष्ठा का नहीं, हजारों लोगों के जीवन की सुरक्षा का है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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