मौसम के रस रंग: बरखा है ये भादो की, बरसे तो बड़ी बरसे
इब्ने इंशा भादो की विशेषता कुछ यूं ही बयां करते हैं। फागुन के बादल जहां छुटपुट बरसकर निकल जाते हैं वहीं भादो जब बरसता है तो खूब ही बरसता है। दूर-दूर से उमड़ते-घुमड़ते खूब कारे-कजरारे बादल आते और छाते चले जाते हैं। सूरज बादलों के पीछे गायब हो जाता है।
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मौसम के जितने शेड्स भारत देश में पाए जाते हैं, उतने किसी दूसरे मुल्क में नहीं। इतना भर नहीं है। यहां हर मौसम का सेलिब्रेशन है। ऋतुओं के हिसाब से पर्व, त्योहार और उत्सव हैं। मौसम के अनुसार बदलते खान-पान हैं। बदलती जीवन शैली है। कुल मिलाकर हर मौसम अपने साथ उल्लास लेकर आता है। इन दिनों देश पर भादो मास का खुमार और वर्षा ऋतु का उल्लास छाया हुआ है। वर्षा चौथी हिंदी ऋतु है। इसके बाद शरद ऋतु का आगमन होगा।
सीने से घटा उट्ठे आंखों से झड़ी बरसे
फागुन का नहीं बादल, जो चार घड़ी बरसे
बरखा है ये भादो की, बरसे तो बड़ी बरसे
दरवाजा खुला रखना, दरवाजा खुला रखना
इब्ने इंशा भादो की विशेषता कुछ यूं ही बयां करते हैं। फागुन के बादल जहां छुटपुट बरसकर निकल जाते हैं वहीं भादो जब बरसता है तो खूब ही बरसता है। दूर-दूर से उमड़ते-घुमड़ते खूब कारे-कजरारे बादल आते और छाते चले जाते हैं। सूरज बादलों के पीछे गायब हो जाता है। हर तरफ छांह-छांह सी हो जाती है। ठंडी बयार बहने लगती है। पेड़-पालौ झूमने-मचलने लगते हैं। पंछी कोलाहल करते हैं।
पपीहा पी को पुकारने लगता है और मयूर नाचने लगता है। बस यूं लगता है कि पूरी कायनात ही इन बादलों के आगमन ने मदमस्त हो रही है। फिर जब बूंदें टूट-टूटकर बिखरने लगती हैं तो उससे एक मधुर सा संगीत पैदा होता है। पेड़ों की पत्तियों पर गिरती ये बूंदें शांति का संगीत पैदा करती हैं। तपती-तरसती धरती अपना आंचल फैला देती है। सीली-सीली सी हवा इधर-उधर भागती फिरती है।
मानो सभी को अपनी आगोश में ले सकने को आतुर हो रही है। एक बार जब झड़ी लगती है तो खूब-खूब बारिश होती है। भादो का महीना अपने साथ उल्लास लाता है। मन खिला-खिला सा हो जाता है। सावन की तरह ही भादो का महीना भी बड़ा ही रूमानियत भरा है। भादो की बूंदें प्रेमियों को अपने रस में भिगो डालती हैं।
भादो को भाद्रपद भी कहते हैं। यह वर्षा ऋतु का आखिरी मास है। इस साल भादो 20 अगस्त से शुरू हुआ और इस महीने 17 सितंबर को यह मास खत्म हो जाएगा। बरखा ऋतु जून के आखिर में शुरू होती है। हिंदी मास के हिसाब से देखें तो इस ऋतु के दो प्रमुख मास हैं। सावन और भादो। यह दोनों ही मास खूब बसरते हैं। इब्ने इंशा कहते हैं,
सावन-भादो साठ ही दिन हैं फिर वो रुत की बात कहां
अपने अश्क मुसलसल बरसें अपनी-सी बरसात कहां
भादो के बाद आसौं में भी हल्की बारिश हो ही जाती है। 17 सितंबर के बाद आसौं (आश्विन) या कुंवार शुरू हो जाएगा। कुंवार से शरद ऋतु का आगमन हो जाता है। यहां से न सिर्फ बारिश बल्कि गर्मी की भी विदाई शुरू हो जाती है।
भादो रूमानियत भरा मास है। फिल्मों और फिल्मी गीतों ने वर्षा ऋतु के इस मास को प्रमियों के बीच काफी लोकप्रिय कर दिया। भादो को लेकर खूब सारे गीत बनाए गए हैं। 60 से 80 तक का दशक ऐसा था, जब हर पांचवी फिल्म में वर्षा पर एक गीत या कोई सीन जरूर होता। ऋतुराज बसंत के बाद वर्षा ऋतु को ही प्रेमियों का मौसम कहा गया है। इस मौसम का सभी को इंतजार रहता है। इस ऋतु में न सिर्फ पूरी कायनात बल्कि तन-मन भी भीग जाते हैं। निखर जाते हैं। संवर जाते हैं।
साहित्य में भी भादो प्रेम और विरह का मास है। मलिक मोहम्मद जायसी ने ‘बारहमासा’ में भादो मास में विरह का सीजव चित्रण किया है। ‘बारहमासा’ ‘पदमावत’ का एक हिस्सा है। ‘बारहमासा’ में जायसी प्रेयसी के विरह को चित्रित करते हुए कहते हैं,
चढा आसाढ़, गगन घन गाजा
साजा विरह दूंद दल बाजा
सावन बरस मेह अति पानी
भरनि परी, हौं विरह झुरानी
भा भादो दूभर अति भारी
कैसे भरौं रैन अधियारी
लाग कुंवार, नीर जग घटा
अबहुं आउ कंत, तन लटा
कातिक सरद चंद उजियारी
जग सीतल, हो विरहै जारी
अर्थात, अषाढ़ मास के आते ही बादल उमड़ने-घुमड़ने लगते हैं और हर तरफ छा जाते हैं। यह मास सावन के आने का संदेसा देने लगता है। सावन मास में नायिका का दिल अपने प्रियतम से मिलने के लिए बेचैन हो रहा है। उसकी यही हालत भादो मास में भी है। अलबत्ता कुंवार के महीने में नायिका के मन में पिया मिलन की उम्मीद जगी है। अब वर्षा कम और थम के हो रही है। जल का प्रकोप कम हो गया है। रास्ते सूख गए हैं। इससे आवागमन शुरू हो गया है। अब उसके पिया के आने की आस बढ़ सी गई है। वह अपने प्रियतम से कहती है कि मेरा शरीर वियोग से बीमार हो गया है।
अमीर खुसरो ने भादो पर भी पहेली कही है,
सावन भादो बहुत चलत है
माघ पूस में थोरी
अमीर खुसरो यूं कहें
तू बुझ पहेली मोरी
जवाबः मोरी यानी नाली
भादो मास खेती के लिए बहुत मुफीद होता है। इन दिनों खेतों में धान की फसल रोपी जा चुकी होती है। खेतों की तरफ निहार कर देखें। यूं लगता है जैसे दूर-दूर तक किसी ने हरा कालीन बिछा रखा है। मखमली कालीन। इसे निहारना बहुत मनोरम लगता है। किसान कहते हैं कि भादो की बूंदे धान के लिए सोने के समान हैं। लोक कवि घाघ भादो मास को लेकर भविष्यवाणी करते हैं,
भादो की छठ चांदनी, जो अनुराधा होय
ऊबड़ खाबड़ बोय दे, अन्न घनेरा होय
घाघ कहते हैं कि अगर भादो सुदी छठ को अनुराधा नक्षत्र पड़े तो इस दौरान ऊबड़-खाबड़ जमीन में भी अन्न बो देना चाहिए। इस दिन अनाज बोने से पैदावार बहुत अच्छी होती है।
घाघ ने भादो में भोजन को लेकर भी समझाया है। घाघ ने कहा है,
सावन साग न भादो दही
क्वार करैला न कार्तिक मही
यानी वर्षा ऋतु के सावन मास में साग का और भादो मास में दही का सेवन नहीं करना चाहिए। कुंवार में करैला और कार्तिक में मट्ठा नहीं खाना चाहिए। ये सभी सेहत के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं।
भादो जाने-जाने को है। इसी के साथ बरस भर के लिए वर्षा ऋतु भी विदा ले चलेगी। फिर शरद पूर्णिमा से नई ऋतु का आगमन होगा। मौसम बदलेगा। मन बदलेगा। जीवन बदलेगा। बदलता मौसम उल्लास के नए मौके लेकर आएगा।
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