आषाढ़ और सावन: रिमझिम- रिमझिम बरसना बादल, हरा-भरा कर जाना बादल..!
आषाढ़ के बाद सावन..
चारो ओर हरियाली ही हरियाली
बहुत सुंदर-सा वातावरण
बूदों की रिमझिम-सी आवाज...
पंछियों का पेड़ पर गीले पंख लिए फूदकना,
पंखों को फड़फड़ाकर सुखाना
नए गीत, नई कल्पना और मन भी हरा-भरा
विस्तार
नवल से किसलय खिलेंंगे
नवल से सुमन महकेंंगे
फैलेगी चारो ओर हरियाली ,
जब मेघ आषाढ़ के बरसेंंगे
आषाढ़ मास आते ही मालूम नहींं महाकवि कालिदास क्यों कर याद आते हैं। मनुष्य प्रेम के लिए क्या नहीं कर सकता, मेघों को भी अपना दूत बना लेता है। जाओ मेघ मेरी प्रिय प्यारी को कुशल होने का संदेश देना।
सचमुच जो दूर रहते हैंं अपनी प्रियतमा से उनको तो जरूर पढ़ना चाहिए मेघदूत..क्या होता विरह..क्या होता प्यार।
परंतु हम आधुनिकता को कितना भी अपना लेंं....प्यार का महत्व रहना ही है। पैसे से हम सब कुछ खरीद सकते हैंं परंतु खुशियां, अपनापन, आत्मीयता नहीं।
मेरा तो मानना है कि जहां प्यार है वहां कभी भी अभाव नहींं रहता, कम ज्यादा में भी गुजारा हो सकता है। एक अपनेपन की मुस्कान कई पीड़ाओं को हर लेती है। एक फिल्मी गीत याद आ रहा है कि तेरी दो टकिया की नौकरी मेें मेेरा लाखों का सावन जाए।
आषाढ़ के बाद सावन..चारों हरियाली ही हरियाली कितना बहुत सुंदर-सा वातावरण..बूदों का रिमझिम-सी आवाज...
पखियों का पेड़ों पर फुदकना, नए गीत, नई कल्पना और.नई कविता मन भी हरा-भरा। कहा यह भी जाता है कि ज्यादा भावों में बहना नुकसादायक होता है।
उसको पूूछा....
उसको पूूछा
क्या तुम मुझ से प्रेम करती हो...
उसने कहा...
बहुत..
मैंने कहा
भावनाओं में बहना दुख
का कारण होता है...
उसने कहा- अभी तो सुखी हो लूं....
विचार करें तो भाव ही ईश्वर है। करुणा भाव मनुष्य काा मूल स्वभाव होना चाहिए। स्वार्थ दूरियां बढ़ाता है और कवि हृदय तो सबके लिए यही मनोकामना करता है।
कुछ न कुछ लेकर आना बादल
इस बार
हर एक के लिए...
कुछ न कुछ लेकर आना बादल
कागज की नाव डुुबो मत जाना
हरा-भरा खेतों को कर जाना....
सूनी सूनी पहाड़ियों पर
झरनों की कविता लिख जाना
सरिता का सागर से मिलन
करा जाना..
.
कुछ न कुछ लेकर आना बादल
भूल गई जो मुझको प्रियसी
उसको मेरा स्मरण करा जाना
प्रेम भरी बौछारों में उसको
भिगा जाना....
कुछ न कुछ लेकर आना बादल...
भूल गए जो राह घर की
मांं ताकती चौखट को
बारम्बार
अपनों का अपनो से मिलन
करा जाना...
कुछ न कुछ लेकर आना बादल.......
बूदों जैसे शब्द मिले
प्यास बुझे मेरे ह्दय की
इंन्द्रधनुष-सा रंग मेरी कविता
में भर जाना..
कुछ न कुछ लेकर आना बादल….
इस बार......।
हम चाह कर भी एक दूूसरे के संग नहींं रह रहे हैं..!
संसार कितनी-कितनी सुंदर चीजों से बना है। नदियां, सागर, उपवन और सुंदर वादियां। हम इनकी अनदेखी करने के कारण ही तो कई प्रकार आधुनिक समस्याओं का सामना कर रहे हैैं। आने वाली पीढ़ियों के लिए यही सब होगा। प्रकृति से दूर कृत्रिम दुनिया। होड़़ लगी भागने की तो हम भी भागे जा रहे हैं।
हम नीरस -सा जीवनयापन कर रहे अगर हम सोचेंं तो हमने अपनी सोच से काम करना ही छोड़ दिया। हम दूूसरों की सोच के अनुसार जी रहे हैैं। अगर चिड़िया चाहे की वह बाज की तरह आसमान उड़े ऐसा हो ही नहींं सकता। सबकी अपनी-अपनी सीमा है। मानव जाति सोच-विचार होने के बावजूद देखा-देखी मेें लगी हैैै।
यही सबसे बड़़ी़ समस्या है। हम तुलनात्मक अध्ययन में ज्यादा लगे हैं और इस कारण भीड़ में कही खो गए हैं। और अब तो हम अपने लापता होने की कहींं शिकायत भी नहींं कर सकते।
करियर की आग दिल को जलाती रहती है। पैसे की चिंता में जीवन चिता हुआ जा रहा है। विस्थापन, दूरियां और सहज आपसी संबंधों की गर्माहट के बीच ऐसी बर्फ जमी है की पिघलने के लिए जानें कौन सी उष्मा काम करेगी।
हो सके तो मेघों को दूत मत बनाएं। हमको किसी कुबेरजी ने देश निकाला तो नहींं दिया है। संग-संग रहे कम ज्यादा तो चलता ही है।
रिमझिम जब बरसोगे मेघ,
सुमन-सुमन चारों ओर चहकेंगे
पखों की मधुर फड़़फड़़ा़हट से
नव प्रणय गीत सजेंगे
मैं थोड़ा या ज्यादा कहे भावप्रद हूं। मैं तो ईश्वर से यह कामना करुंगा- सभी का जीवन स्नेह और प्यार भरा रहे। संसार में शांति रहे। बंधन में बंधना अच्छी बात है या नहींं आधुनिक समाज में आप देख ही रहे हैं और मेरी कामना यही है सबका बंधन बना रहे अटूट रहे।
प्यार को प्यार
और यार को यार मिले..!
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।