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पं. रामप्रसाद बिस्मिल स्मृति विशेष: वतन पर मर-मिटने वाले सरफरोश

Thu, 11 Jun 2020 01:19 PM IST
Dr.Naaz Parveen डॉ. नाज परवीन
Updated Thu, 11 Jun 2020 01:19 PM IST
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Sarfarosh Pt. Ramprasad Bismil birthday special poem sarfaroshi ki tamnna
राम प्रसाद बिस्मिल बालक राम ने 18 वर्ष की आयु में ’मेरा जन्म’ शीर्षक से एक कविता लिखी - फोटो : फाइल फोटो

'बला से हमको लटकाए अगर सरकार फांसी से,

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लटकते आए अक्सर पैकरे-ईसार फांसी से।
लबे-दम भी न खोली जालिमों ने हथकड़ी मेरी,
तमन्ना थी कि करता मैं लिपटकर प्यार फांसी से'।


भारत के सरफरोश पं. रामप्रसाद बिस्मिल की राष्ट्रप्रेम से भरी पूरी कविताएं आज भी युवाओं को थकने नहीं देतीं। स्वयं से पहले राष्ट्र की चिंता उन्हें कम उम्र में ही युवाओं का नेतृत्वकर्ता बनाती है। वतन पर मर-मिटने का जज्बा ऐसा की ना ब्रिटिश हुकूमत के आगे झुके ना किसी हमराह के रोके रुके। एक बार जो ठान लिया उसे पूरा करके ही दम लिया।

आजादी से मोहब्बत ने उन्हें लाजवाब शायर और कवि बनाया। उनकी राष्ट्रप्रेम से लबरेज शायरी आज भी हम भारतीयों की पहली पसन्द है। उनके पग-चिन्हों पर चलकर असंख्य युवाओं ने देश की आजादी में अपनी शहादत के दम पर भारत की आन-बान-शान को बनाए रखने में योगदान दिया।

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आज हम जिस विकसित भारत के निर्माण के प्रयासों में लगे हैं, उसी श्रेष्ठ भारत एक भारत का स्वप्न भारत के सरफरोश देशभक्त पं. रामप्रसाद बिस्मिल ने देखा था। मात्र 30 वर्ष की आयु में ही अपने प्राणों को न्योछावर करके, भारत को आजाद कराने का गजब की मिसाल कायम की पं. राम प्रसाद बिस्मिल जी ने।

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Sarfarosh Pt. Ramprasad Bismil birthday special poem sarfaroshi ki tamnna
बिस्मिल जी ने मातृवेदी नामक क्रान्तिकारी संगठन की स्थापना की। - फोटो : सोशल मीडिया

उत्तरप्रदेश के शाहजहांपुर में श्री मुरलीधर और मूलमती जी के घर 11 जून 1897 को बालक राम ने जन्म लिया। माता-पिता दोनों ही भगवान राम के अराधक थे। लिहाजा उन्होंने इनका नाम रामप्रसाद रखा।

कहते हैं बचपन में एक ज्योतिषी ने बालक राम की कुंडली एवं हाथों की रेखाओं के आधार पर भविष्यवाणी की थी कि यदि बालक राम का जीवन किसी तरह बचा रहा, जिसकी संभावना बहुत कम है, तो बालक को चक्रवर्ती सम्राट बनने से कोई नहीं रोक सकता।

बालक राम ने हिन्दी, उर्दू, संस्कृत, अंग्रेजी में निपुणता हासिल की। वह बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के धनी थे, लेकिन कुसंगति के कारण बचपन में माता-पिता से अक्सर डांट-फटकार सुनने को मिलती रहती थी। कक्षा 9वीं के बाद बालक राम आर्यसमाज के संपर्क में आए और उनके जीवन में क्रान्तिकारी बदलाव उत्पन्न हुए।

बालक राम ने 18 वर्ष की आयु में ’मेरा जन्म’ शीर्षक से एक कविता लिखी, जिसमें अंग्रेजी हुकूमत से मुक्ति की प्रतिबद्धिता साफ तौर पर दिखाई देती है। बचपन से ही उनके मन में ब्रिटिश हुकूमत को भारत से उखाड़ फेकने की प्रबल इच्छा ने जन्म लिया। जिसे उन्होंने अपने प्राणोंं का बलिदान देकर पूरा किया।

सन् 1916 के कांग्रेस अधिवेशन में नरम दल के विरोध के बावजूद बाल गंगाधर तिलक की शोभा यात्रा पूरे लखनउ में निकाली। यहीं पर इनकी मुलाकात केशव बलिराम हेडगेवार और सोमदेव शर्मा एवं मुकुन्दीलाल से हुई। तत्पश्चात् अपने साथियों की मदद से इन्होंने ’अमेरिका की स्वतंत्रता का इतिहास’ नामक पुस्तक प्रकाशित की, जिसे उत्तरप्रदेश में प्रकाशित होते ही हुकूमत ने रोक लगा दी।

बिस्मिल जी ने मातृवेदी नामक क्रान्तिकारी संगठन की स्थापना की। इसमें उनकी मदद औरैया के पंडित गेंदा लाल दीक्षित ने की। दोनों ने मिलकर इटावा, मैनपुरी, आगरा, शाहजहांपुर जिलों के युवाओं को मातृभूमि की रक्षा के लिए संगठित किया। मैनपुरी षडयंत्र केस में ब्रिटिश जज ने रामप्रसाद बिस्मिल और दीक्षित जी को भगोड़ा घोषित कर दिया।

ब्रिटिश हुकूमत ने फरवरी 1920 में मैनपुरी षडयंत्र के सभी बंदियो को रिहा कर दिया। तत्पश्चात् बिस्मिल भी अपने शहर शाहजहांपुर वापस आ गए। सितम्बर 1920 में कलकत्ता अधिवेशन में लाला लाजपत राय से प्रभावित होकर सन् 1922 में बिस्मिल जी ने अपनी पुस्तक कैथेराइन को प्रकाशित करवाया।

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पंडित राम प्रसाद बिस्मिल की प्रतिमा पर माल्यार्पण करते योगी - फोटो : अमर उजाला

सन् 1921 के कांग्रेस अधिवेशन में अहमदाबाद में मौलाना हसरत मोहानी के साथ मिलकर पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव कांग्रेस की साधारण सभा में पारित कराने में अहम भूमिका निभाई। रामप्रसाद बिस्मिल का एक मात्र उददेश्य था पूर्ण स्वतंत्रता, जिसे पूरा कराने के लिए उन्होंने गांधी जी के असहयोग आन्दोलन में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया और लोगों का विशाल हुजूम तैयार किया, लेकिन चौरा-चोरी हत्याकाण्ड के बाद गांधी जी के आन्दोलन वापस लेने से बहुत निराश हुए। जिसका विरोध सन् 1922 के गया अधिवेशन में रामप्रसाद बिस्मिल एवं उनके साथियों ने दर्ज कराया। उनके विचारों का प्रभाव साफ तौर पर तब दिखाई दिया जब कांग्रेस उदारवादी एवं उग्रवादी विचारधारा अलग-अलग हो गई।

सितम्बर 1923 को दिल्ली के विशेष अधिवेशन में असहयोग आन्दोलन से असन्तुष्ट युवकों ने देश में नई क्रान्तिकारी पार्टी बनाने का निर्णय लिया। लाला हरदयाल जो उन दिनों विदेश में थे, और वहीं से भारत की आजादी की गतिविधियों में जुटे हुए थे।

उन्होंने पत्र लिखकर रामप्रसाद बिस्मिल और शचीन्द्रनाथ सान्याल एवं यदु गोपाल मुखर्जी जी से मिलकर नयी पार्टी एवं उसका संविधान बनाने के लिए कहा। जो एच. आर. ए. के रूप में देश के समक्ष आई।

अंग्रेजी हुकूमत से आजादी की जंग में सबसे अहम घटनाओं में शुमार काकोरी कांड 9 अगस्त 1925 को अंजाम दिया गया, जिसका मूल उद्देश्य संगठन के लिए धन इकट्ठा करना था। वो भी ब्रिटिश खजाने पर सेंध लगाकर। रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकुल्ला खां, राजेन्द्र लाहिड़ी, चन्द्रशेखर आजाद, सचिंद्र बख्शी, केशव चक्रवर्ती, मनमठनाथ गुप्ता, मुरारी लाल गुप्ता, मुकुन्दी लाल गुप्ता और बनवारी लाल आदि लोगों ने मिलकर घटना को अंजाम दिया।

ब्रिटिश हुकूमत ने हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के 40 क्रान्तिकारियों को पकडकर मुकदमा चलाया। जिसमें रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, रोशन सिंह, राजेन्द्र लाहिड़ी को मौत की सजा सुनाई गई। मुकदमें में 16 अन्य क्रान्तिकारियों को कम से कम 4 वर्ष की सजा से लेकर काला पानी की सजा तक सुनाई गई।

19 दिसम्बर 1927 को गोरखपुर की जेल में पं. रामप्रसाद बिस्मिल को फांसी दे दी गई। भारत के इन बेमिशाल देशभक्तों की शहादत ने भारत की आजादी के द्वार खोले। इनकी शहादत से देश भारत माता और वन्देमातरम के जयकारे से गूंज उठा।

सरफरोशी की तमन्ना लाखों युवाओं के दिलों में जगाकर भारत माता की गोद में सो गए पं. रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकुल्ला खां, राजेन्द्र लाहिड़ी और रोशन सिंह।

इन वीरों को शत् शत् नमन् वन्दे मातरम्.
जय हिन्द...!

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।


 

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