फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   saptarishi-idols-collapse-at-ujjain another example of Corruption, review article on it

महाकाल लोक निर्माण: हादसा या भ्रष्टाचार, ‘देव प्रांगणे भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचार न भवति..!

Fri, 02 Jun 2023 06:54 PM IST
Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Fri, 02 Jun 2023 06:54 PM IST
सार

सरकार का कहना है कि मूर्तियां ध्वस्त हुई हैं तो फिर लगवा देंगे। जबकि विपक्षी कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा के राज में भ्रष्टाचार ने भगवान के घर को भी नहीं छोड़ा। दिलचस्प बात यह है कि सरकार इस समूचे प्रकरण को महज ‘हादसा’ मान कर चल रही है। मूर्ति निर्माता कंपनी ने भरोसा दिया है कि टूटी मूर्तियां फिर बिठा दी जाएंगी।

विज्ञापन
saptarishi-idols-collapse-at-ujjain another example of Corruption, review article on it
महाकाल लोक की क्षतिग्रस्त मूर्तियां - फोटो : Twitter

विस्तार

भारतेंदु हरिश्चन्द्र का एक व्यंग्य नाटक है ‘वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति।‘ यानी वेदों में बताई गई हिंसा, हिंसा नहीं है। बदले संदर्भ में इसे यूं भी कहा जा सकता है ‘देव प्रांगणे भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचार न भवति। मध्यप्रदेश के उज्जैन में आठ माह पहले उद्घाटित महाकाल लोक परिसर में तेज आंधी में गिरी सप्तऋषियों की मूर्तियों  के धराशायी होने और बाकी 11 मूर्तियों में पड़ी दरारों को लेकर जनता के बीच जो भी संदेश जा रहा हो,  राज्य सरकार इसे ‘प्राकृतिक आपदा’ के रूप में ही ले रही है।

विज्ञापन


सरकार का कहना है कि मूर्तियां ध्वस्त हुई हैं तो फिर लगवा देंगे। जबकि विपक्षी कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा के राज में भ्रष्टाचार ने भगवान के घर को भी नहीं छोड़ा। कांग्रेस नेता सज्जन सिंह वर्मा ने तो यहां तक कहा कि यह तो भोले के प्रांगण में ‘भ्रष्टाचार का तांडव’ है। भगवान के भक्त और आम पब्लिक समझ नहीं पा रही है कि कथित भ्रष्टाचार के इस नए रूप को किस निगाह से देखें। उधर मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने महाकाल लोक की तर्ज पर  राज्य में दो और ‘लोकों’ के निर्माण का ऐलान कर दिया है। 
विज्ञापन


दरअसल भगवान के घर में राजनीति और कदाचार का यह मामला अपने आप में अजब है। क्योंकि ‘लोक निर्माण’ और ‘धर्मस्थल निर्माण’ में जन अपेक्षाएं अलग-अलग होती हैं। बारह पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से एक उज्जैन के महाकालेश्वर परिसर के सौंदर्यीकरण और विकास की योजना शिवराज सरकार के तीसरे कार्यकाल में पिछले सिंहस्थ के बाद बनी थी।
विज्ञापन
विज्ञापन


कुछ टेंडर भी जारी हुए। योजना पर आगे काम होता, इसके पूर्व पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा पर मतदाता की अवकृपा हुई। प्रदेश की कमान कांग्रेस की कमलनाथ सरकार के हाथ आई। लेकिन कांग्रेस का दावा है कि  कमलनाथ सरकार ने इस योजना को अपने ढंग से जारी रखा। पर वो सरकार भी सवा साल बाद ही गिर गई।

शिवराज चौथी बार सीएम बने तो उन्होंने महाकाल लोक को अंजाम तक पहुंचाया और पिछले साल अक्टूबर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसका शुभारंभ किया। सरकार के मुताबिक इस पर 351 करोड़ रु. खर्च हुए। यह तो पूरी योजना का प्रथम चरण है। पूरी परियोजना 856 करोड़ रु. की है। महाकाल लोक के निर्माण से उज्जैन में धार्मिक पर्यटन बहुत तेजी से बढ़ा। महाकाल लोक में मूर्ति निर्माण का ठेका गुजरात की एमपी बावरिया कंपनी को दिया गया था।


महाकाल लोक निर्माण और भ्रष्टाचार

लेकिन जब ‘लोक’ का निर्माण हो रहा था तभी ‘गड़बडि़यों’ की शिकायतें भी आने लगी थी। कांग्रेस विधायक महेश परमार की लिखित शिकायत पर तत्कालीन डीजी लोकायुक्त  कैलाश मकवाना ने इसकी जांच भी शुरू कर दी थी। उन्होंने निर्माण से सम्बन्धित एजेंसियों को नोटिस थमा दिए थे। लेकिन इसे ‘हरिइच्छा’ ही मानें कि आगे जांच बढ़ने के बजाए डीजी लोकायुक्त की कुर्सी ही चली गई। ठीक भी था। भगवान के भक्त यह मानने को कतई तैयार नहीं थे कि भगवत कार्य में कोई भ्रष्टाचार हो सकता है। 

अब इसे नियति का चक्र कहें कि 28 फरवरी को आई तेज आंधी ने महाकाल लोक की सप्तऋषियों समेत कई मूर्तियों को ध्वस्त और खंडित कर दिया। आरंभिक जांच में सामने आया कि ये मूर्तियां प्लास्टिक फाइबर की बनी थीं और भीतर से खोखली थीं। उनमें टिकाऊ निर्माण का कोई आग्रह नहीं था। ये मूर्तियां रात में रंग बिरंगी रोशनी में जरूर मोहक लगती थीं, लेकिन दिन में उदास सी लगती थीं।

हमें यह भी बताया गया कि हर मूर्ति का खास संदेश है और वो जीने की राह दिखाती है। यह बात अलग है कि इनमें से ज्यादातर मूर्तियों का जीवन अल्पकालिक ही था, यह 30 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चली आंधी से ही साबित हो गया।

विशेषज्ञों के अनुसार चूंकि मूर्तियों को ठीक से फिक्स नहीं किया गया था और न हीं उनमें किसी तरह की भीतरी मजबूती थी, इसलिए वो धाराशायी हो गईं। 

 

saptarishi-idols-collapse-at-ujjain another example of Corruption, review article on it
महाकाल लोक विवाद - फोटो : Self


भ्रष्टाचार में सबके हाथ काले?

यह तो हुई निर्माण में ‘स्तरहीनता’ की बात। महाकाल लोक पर जो राजनीति हुई वह भी देव दुर्लभ है। पहले तो इसके निर्माण का श्रेय खुद लेने में भाजपा और कांग्रेस ने कोई कसर नहीं छोड़ी और इस हादसे के बाद वो एक दूसरे पर भ्रष्टाचार पर आरोप लगा रहे हैं।

मसलन जब अक्टूबर में महाकाल लोक का शुभारंभ हुआ तो कांग्रेस ने इसका श्रेय लेने का दावा यह कहकर किया कि उसके कार्यकाल में ही 300 करोड़ रु. के टेंडर जारी हुए थे। तब गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने कहा था कि कांग्रेस की कमलनाथ सरकार ने तो महाकाल लोक परियोजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया था। हमने सत्ता में लौटकर इसे पूरा किया है।

लेकिन मूर्ति हादसे के बाद नगरीय प्रशासन मंत्री भूपेन्द्रसिंह ने आंकड़ों के हवाले से खुलासा किया कि महाकाल लोक का वर्क ऑर्डर तो कमलनाथ सरकार के कार्यकाल में जारी हुआ। फिर उन्होंने कहा कि महाकाल लोक निर्माण के 60 फीसदी ठेके कांग्रेस के और बाकी 40 फीसदी ठेके भाजपा के शासन काल में जारी हुए।

यानी एक तो कांग्रेस कार्यकाल में यह परियोजना ठंडे बस्ते में नहीं डाली गई थी। दूसरा, यह कि अगर इसमें भ्रष्टाचार हुआ है तो दोनों के कार्यकाल में हुआ है। विवाद उसके अनुपात को लेकर है। लड़ाई अब निर्माण का श्रेय लेने के बजाय यह साबित करने की है कि किसके कार्यकाल में महाकाल लोक में ज्यादा भ्रष्टाचार हुआ।

हालांकि मंत्री भूपेन्द्र सिंह ने कांग्रेस को यह कहकर चुनौती दी कि अगर उसके पास भ्रष्टाचार के कोई ठोस सबूत हैं तो दें, हम जांच करा लेंगे। लेकिन उन्होंने पूर्व में लोकायुक्त में हुई शिकायत और उसकी जांच रुकने का कोई जिक्र नहीं किया।
 

हादसा या भ्रष्टाचार का प्रमाण

दिलचस्प बात यह है कि सरकार इस समूचे प्रकरण को महज ‘हादसा’ मान कर चल रही है। मूर्ति निर्माता कंपनी ने भरोसा दिया है कि टूटी मूर्तियां फिर बिठा दी जाएंगी। जबकि विपक्षी कांग्रेस का कहना है कि समूची परियोजना में ही गड़बड़ी हुई हैं। 

रही बात भ्रष्टाचार की तो सब को पता है कि ‘भ्रष्टाचार’ एक ऐसा असुर है, जो कभी नहीं मरता। पुरानी संस्कृत में असुर शब्द का एक अर्थ ‘शक्तिशाली’ और ‘अमर’ होना भी है। और भगवान शिव तो भोले भंडारी हैं। असुरों को भी वरदान देने में कोताही नहीं करते। वो सृष्टि के सर्जक भी हैं और संहारक भी।

भगवतकृपा रही कि आंधी 30 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से ही चली। अगर वो 60 किमी प्रति घंटे की गति से होती तो शायद पूरा लोक ही परलोक में तब्दील हो जाता। महाकाल लोक जीवन की नश्वरता और ‘नित्य नूतनता’ का संदेश देता है। गिरी हुई मूर्तियां तीन दिन में फिर लग जाएंगी। फिर गिरी तो फिर लग जाएंगी।

अगर कोई इसमें कोई भ्रष्टाचार देखना चाहता है तो देखे। भ्रष्टाचार से ही नवनिर्माण और नवनिर्माण से ही भ्रष्टाचार की राह खुलती है। आचार का क्या है, भावना पवित्र होनी चाहिए। भ्रष्टाचार भी तभी है, जब उसे ‘भ्रष्टाचार’ माना जाए।


----------------------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed