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देश में ‘सनातन धर्म बोर्ड’ अभियान और कुछ सवाल...

Thu, 21 Nov 2024 03:26 PM IST
Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Thu, 21 Nov 2024 03:26 PM IST
सार

हिंदुत्व के मुख्य पैरोकार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की ओर से इस बारे में खुलकर प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन भाजपा के कुछ नेताओं, जिनमें त्रिपुरा के मत्स्यपालन मंत्री सुधांशु दास व भाजपा की पूर्व सांसद प्रज्ञा ठाकुर शामिल हैं, ने इस मांग का समर्थन किया है। बहरहाल, देश में हिंदू मंदिरों के नियंत्रण और रखरखाव को राज्य सरकारों और प्रबंधन ट्रस्टों के कब्जे से मुक्त कर हिंदू संतो, पुरोहितों के हाथों में देने की व्यापक मुहिम की यह पहली पायदान है।

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Sanatan Dharma Board campaign in the country and some questions
सनातन धर्म। - फोटो : Adobe Stock

विस्तार

‘बंटेगे तो कटेंगे’ के बाद हिंदुत्व एजेंडे की राह में नई मुहिम अब ‘सनातन धर्म रक्षा बोर्ड’ की है। हिंदू मंदिरों का प्रबंधन हिंदू समाज के हाथों में सौंपने की बात तो पहले से की जा रही थी। चार वर्ष पूर्व उत्तराखंड में भाजपा सरकार ने बद्रीनाथ समेत 51 मंदिरों का प्रबंधन देवस्थानम बोर्ड से लेकर पंडे पुरोहितों के हाथों में सौंप दिया था। हाल में यह मुद्दा सबसे पहले आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण ने तिरूपति प्रसादम में मिलावट की बात सामने आने पर उठाया था।

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उसके बाद इसे हिंदू साधु संतों की दूसरी पंक्ति ने हवा दी। दूसरी पंक्ति इसलिए क्योंकि इन साधु संतो में परंपरागत हिंदू धर्माचायों से ज्यादा संख्या कारपोरेट शैली में काम करने वाले कथा वाचकों की है। उनका अपना आभामंडल और भक्तों की फौज है। इसी संदर्भ में देश के नामी कथा वाचक एवं सनातन न्यास फाउंडेशन के के अध्यक्ष देवकीनंदन ठाकुर की पहल पर बीते 16 नवंबर को दिल्ली में धर्म संसद का आयोजन कर ‘सनातन धर्म बोर्ड’ गठन की मांग पर मुहर लगाई।
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हिंदुत्व के मुख्य पैरोकार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की ओर से इस बारे में खुलकर प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन भाजपा के कुछ नेताओं, जिनमें त्रिपुरा के मत्स्यपालन मंत्री सुधांशु दास व भाजपा की पूर्व सांसद प्रज्ञा ठाकुर शामिल हैं, ने इस मांग का समर्थन किया है। बहरहाल, देश में हिंदू मंदिरों के नियंत्रण और रखरखाव को राज्य सरकारों और प्रबंधन ट्रस्टों के कब्जे से मुक्त कर हिंदू संतो, पुरोहितों के हाथों में देने की व्यापक मुहिम की यह पहली पायदान है।
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हालांकि, इस अभियान से कई बड़े और स्थापित संत अभी दूर हैं। ये वो संत हैं, जिनका भाजपा सरकारों में अच्छा रसूख है और संघ से भी उनके घनिष्ठ रिश्ते रहे हैं। फिलहाल प्रस्तावित सनातन धर्म बोर्ड का प्रारूप क्या हो, इस बारे में स्पष्टता नहीं है। कुछ लोगों का मानना है कि सिख गुरूद्वारा प्रबंधन की तर्ज पर यह बोर्ड काम कर सकता है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अनुसार प्रारूप तय करने के लिए एक कमेटी बनाई जाएगी। वैसे इस अभियान का राजनीतिक पहलू यह भी है कि देश में या तो मुस्लिमों के वक्फ बोर्ड को खत्म किया जाए या फिर कुछ उसी तर्ज पर संवैधानिक रूप से हिंदू सनातन बोर्ड गठित किया जाए। 

उल्लेखनीय है कि इस साल सितंबर में सनातन धर्म रक्षा बोर्ड की जरूरत बताते हुए आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण ने सोशल मीडिया पर लिखा था कि अब समय आ गया है कि पूरे भारत में मंदिरों से जुड़े सभी मुद्दों पर विचार करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर ‘सनातन धर्म रक्षा बोर्ड’ का गठन किया जाए। इस पर व्यापक बहस होनी चाहिए।

इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कथा वाचक देवकीनंदन ठाकुर ने देश की राजधानी दिल्ली में धर्मसंसद बुलाई। इसमें उन्होंने अन्य कथावाचकों और साधु संतों के अलावा राजनीतिक दलों के नेता जैसे मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी, जेपी नड्डा, अखिलेश यादव को भी निमंत्रण भेजा था। इनमें से कोई भी उसमें शामिल नहीं हुआ। इस धर्म संसद में 13 अखाड़ों से संतों के साथ ही हरिद्वार, ऋषिकेश, मथुरा, वाराणसी,  तीर्थ नगरियों के कई लोग शामिल हुए।

कुछ लोग इसे भाजपा का ही राजनीतिक एजेंडा मान रहे हैं, क्योंकि इस धर्म संसद में समान नागरिक संहिता लागू करने, हलाल सर्टीफिकेट जारी करने वाली कंपनियों का विरोध तथा धर्मांतरण रोकने जैसी मांगें भी उठाई गई। समागम में शामिल जैन मुनि लोकेश ने देश में जनसंख्या नियंत्रण कानून जल्द से जल्द लागू करने की मांग की।

धर्म संसद के मुख्य अतिथि द्वारका शारदा पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती ने राम जन्म भूमि की तरह श्री कृष्ण जन्मभूमि और ज्ञानवापी मस्जिद भी हिंदुओं को सौंपने की मांग की। धर्म संसद में शामिल अन्य प्रमुख लोगों में सीहोर के पंडित प्रदीप मिश्रा, हनुमान गढ़ी के महंत राजू दास, अयोध्या के डॉ.राम विलास वेदांती आदि थे। लेकिन इस धर्म संसद से स्वामी अवधेशानंद गिरी, स्वामी गोविंदगिरी स्वामी कैलाशानंद गिरी,  आचार्य बालकृष्ण,  स्वामी चक्रपाणी, आचार्य प्रमोद कृष्णम्, स्वामी दीपांकर जैसी हस्तियां दूर रहीं। धर्म संसद के पहले 4 नवंबर को मथुरा में हिंदू संतों की एक महापंचायत भी हुई थी।  

दरअसल, हिंदू धर्म में मंदिरों के रखरखाव प्रबंधन और संचालन के लिए कोई एक सुनिश्चित व्यवस्था नहीं है। कई जगह सरकारों ने मंदिर प्रबंधन के लिए ट्रस्ट बना रखे हैं तो ज्यादातर मंदिरों का मैनेजमेंट पंडे पुरोहितों के भरोसे है। जबकि अखाड़ा परिषद का मानना है कि मंदिर प्रबंधन में सरकारी दखल होने से मंदिरों की परंपरा व व्यवस्था खंडित हो रही है। बताया जाता है कि अखाड़ा परिषद ‘सनातन बो’र्ड का प्रारूप तैयार करवा रही है।

इसमें 13 अखाड़ों के प्रमुख संतों, हर प्रदेश के हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त जज, वरिष्ठ अधिवक्ता, तीर्थपुरोहित व एक हिंदू प्रशासनिक अफसर को शामिल करने का सुझाव दिया गया है। साथ ही सनातन बोर्ड का चेयरमैन अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष को ही बनना चाहिए, क्योंकि उनके  संपर्क में देशभर के धर्माचार्य रहते हैं। चेयरमैन सहित बोर्ड में कुल 21 सदस्य होने चाहिए। इसी मुद्दे पर संत पुरोहित समाज में रस्साकशी शुरू हो गई है। बोर्ड का चेयरमैन अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष को बनाने के प्रस्ताव का  अखिल भारतीय पुजारी महासंघ ने पुरज़ोर विरोध किया है। 

महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष महेश पुजारी और सचिव रूपेश मेहता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को भेजे पत्र में मांग की  गई है कि सनातन धर्म रक्षा बोर्ड का नेतृत्व शंकराचार्यजी को करना चाहिए न कि अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष को। क्योंकि बोर्ड का प्रारूप बनाने का अधिकार अखाड़ा परिषद को नहीं है। शंकराचार्यजी सनातन धर्म के सर्वमान्य प्रतिनिधि हैं। हालांकि अखाड़ा परिषद के भी दो धड़े हो चुके हैं। एक धड़े के अध्यक्ष निर्वानी अखाड़े से और दूसरे निरंजनी अखाड़े से बताए जाते हैं।

वैसे सनातन बोर्ड के अलावा भारत के हिंदुओं को धार्मिक आधार पर संगठित करने और उसे एक कानूनी संगठन का रूप देने के लिए देश में संवैधानिक ‘राष्ट्रीय हिंदू बोर्ड’ की स्थापना भी प्रस्तावित है। भारत का प्रत्येक हिंदू इस बोर्ड का सदस्य होगा। उसे राष्ट्रीय हिंदू बोर्ड के प्रमुख को चुनने के लिए मताधिकार होगा। हालांकि हर हिंदू को इसका सदस्य बनने की अनिवार्यता नहीं होगी, जबकि जैन, सिख और बौद्ध धर्मावलंबी भी चाहें तो इसके सदस्य बन सकते हैं।

प्रस्तावित बोर्ड के पास हिंदू मंदिरों के प्रबंधन के कानूनी अधिकार होंगे। वर्तमान में बड़े मंदिरो के प्रबंधन और स्वामित्व से जुड़े विवाद भी यह बोर्ड ही सुलझाएगा। इस कानून के तहत  राष्ट्रीय सनातन रजिस्ट्रार की नियुक्ति होगी। यह कानून बनने के बाद मंदिरो के प्रबंधन के लिए वर्तमान में लागू हिन्दू देवस्थानम अधिनियम अप्रभावी हो जाएगा। यह ट्रस्ट हिंदू धर्म स्थानों का पंजीयन तो करेगा, लेकिन विभिन्न सम्प्रदायों, पन्थो, मठो आदि का अधिग्रहण नहीं करेगा, और न ही उनके दान का प्रबंधन करेगा। सभी विवाद नागरिको की जूरी द्वारा ही सुने जायेंगे।

सनातन महजब की तरह अपने आप में कोई धर्म नहीं है। जो शाश्वत है, वही सनातन है और हिंदू धर्म व जीवन शैली की मुख्य धारा है। वर्तमान में देश में करीब 7 लाख छोटे बड़े हिंदू मंदिर हैं। इनमें भी सर्वाधिक मंदिर तमिलनाडु में हैं। अंग्रेजों के समय पर हिंदू मंदिरों के रखरखाव को लेकर  पहली बार कानून 1863 में बना। इसके बाद तत्कालीन मद्रास ( अब तमिलनाडु) में 1925 में हिंदू मंदिरों का प्रबंधन शक्तिशाली कमिश्नर बोर्ड के माध्यम से करने का कानून बना। 

केरल में मंदिरों के प्रबंधन के लिए देवस्वोम बोर्ड है, जो मंदिर के पुजारियों और अन्य स्टाफ की भर्ती भी करता है। कर्नाटक में सरकार हिंदू मंदिरो से भी टैक्स वसूलती है। वहां लागू कानून में प्रावधान है कि 1 करोड़ रू से अधिक वार्षिक आय वाले हिंदू मंदिरों को कमाई का 10 फीसदी व 10 लाख रू. तक की आय वाले मंदिरों को कमाई का 5 फीसदी सरकार को देनी होगी।

सनातन बोर्ड बनेगा या नहीं, या कब बनेगा, यह मोदी सरकार पर निर्भर है, लेकिन जिस सुनियोजित तरीके से यह मांग उठाई जा रही है, उसका कुछ तो नतीजा निकलेगा। सवाल यह है कि क्या नई व्यवस्था भी मंदिरों का निर्विवाद संचालन कर पाएगी? क्योंकि अव्यवस्थाओं की शिकायतों के बाद ही तो इस काम में सरकारों ने हाथ डाला था।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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