साहिर लुधियानवी: अधूरी मोहब्बतों का पक्के वाला तल्ख़ शायर
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कोई अपनी मौत के बाद की ज़िन्दगी को कैसे सोच सकता है और उस पर लिख सकता है? विश्व भर के साहित्य में ऐसे गिने चुने उदहारण हैं जहां लेखकों ने मृत्यु के बाद होने वाली स्थितियों की कल्पना की और उस पर लिखा। लेकिन ये निरी कल्पनाएं ही थी। अभी कुछ दिन पहले पढ़ा कि पुरानी फिल्मों, डॉक्यूमेंटरीज और फुटेज को रिस्टोर कर उन्हें देखने लायक अवस्था में लाने वाले एड फिल्म निर्माता शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर ने साहिर लुधियानवी की डायरीज, नोट्स, नज़्में, ब्लैक एंड वाइट तस्वीरें, जुहू के एक कबाड़ी की दुकान से मात्र 3000 रुपए में खरीद कर उन्हें लापता होने से और नष्ट होने से बचा लिया।
गुरुदत्त की फिल्म प्यासा में, जिसके गीत साहिर ने लिखे थे, ऐसा ही एक दृश्य है जहां फिल्म के सेंट्रल कैरेक्टर विजय की शायरी कबाड़ में मिलती हैं। साहिर ने अपनी मौत के बाद होने वाले अपने हालात पर कई साल पहले ही लिख दिया था-
कल और आएंगे
नग़मों की खिलती कलियां
चुनने वाले
मुझसे बेहतर कहने वाले,
तुमसे बेहतर सुनने वाले;
कल कोई उनको याद करे,
क्यूं कोई मुझको याद करे?
मसरूफ ज़माना मेरे लिए क्यूं
वक़्त अपना बर्बाद करे?"
साहिर का मन कसैला था, सिगरेट और शराब के स्वाद की तरह
साहिर को दुनिया से गुस्सा था। वैराग्य था। दुनिया को लेकर वो दुखी थे। साहिर को सब कुछ सही नहीं लगता था। उस समय के लोग एक यूटोपियन वर्ल्ड की इच्छा लिए दिल को समझा लेते थे। लेकिन साहिर नहीं। साहिर का मन कसैला था। उनकी सिगरेट और शराब के स्वाद की तरह। कड़वाहट। ऐसी कड़वाहट सिर्फ एक संवेदनशील रूह को बख्शी जाती है। वो रूह जो अपने लिए कम और औरों के लिए ज़्यादा दुखी है। साहिर के मन में लोगों की कम-अक़्ली को लेकर मलाल भरा हुआ था, पूरी ज़िन्दगी। शायद इस दुःख ने उन्हें प्रेरणा दी कि वो अंदर के तेज़ाब को लफ़्ज़ों की बैरल में डाल कर मुक्त हो जाएं। कोई गीत लिख दूं, कोई नज़्म कह दूं, कोई ग़ज़ल सुना दूं। क्योंकि ये तो सुधरेंगे नहीं।
पिता, साहिर को गालियां देकर, सड़कों पर जलील कर खुश हो लेते थे
उन्होंने समय को सूफियाना दृष्टिकोण से देखा और जो भी देखा वो एक कोमल हृदय पर बहुत विभत्स प्रभाव डालता गया। हम साहिर को एंटी-इस्टैब्लिशमेंट मान सकते हैं। जो है वो ऐसा क्यों है, जो होना चाहिए वो क्यों नहीं है, जो मैं देख रहा हूं और कोई क्यों नहीं देख रहे हैं? ये जो आस- पास लोग हैं, ये सोचते क्यों नहीं हैं? क्या इनकी आंखें खुली नहीं हैं? क्या इनका दिमाग इस कदर बंद हो गया है की इन्हें ज़ुल्म और बेवकूफी नज़र नहीं आती।
साहिर के पिता और उनकी माता के बीच सम्बन्ध अच्छे नहीं रहे। पिता लुधियाना के ज़मींदार फज़ल मुहम्मद और मां का नाम था सरदार बेग़म। फज़ल अहमद एक अय्याश ज़मींदार थे, जो उस वक़्त का पैटर्न था। एक दर्ज़न से ज़्यादा शादियां की। इतनी शादियों में बेटा बस एक ही हुआ, नाम रखा अब्दुल हयी। कहते हैं कि पिता ने इनका नाम अब्दुल हयी इसलिए रखा था कि इस नाम का उनका एक दुश्मन था। चूंकि दुश्मन अब्दुल हयी ताक़तवर था तो उसे कुछ कर नहीं सकते थे, इसलिए फ़ज़ल अहमद अपने बेटे को मार के, गालियां देकर, सड़कों पर ज़लील कर के खुश हो लेते थे। जब मां बाप की लड़ाई होती थी, मां मार खाती थी तो अब्दुल के मन में पिता की अथॉरिटी को लेकर गुस्सा भरने लगा था।
साहिर ने 19 साल की उम्र में लिखी ताज महल कविता
असंतुलित दिमाग और सोच का ये आलम 13 साल तक चलता रहा और फिर एक दिन सरदार बेग़म अपने बेटे को लेकर चली गई। जायदाद, पैसा, रुतबा सब छोड़ कर।कहते हैं साहिर रेल की पटरी के किनारे बने एक कच्चे घर में बड़े हुए, मुफलिसी की दोस्ती में। माताजी छोटे साहिर की कस्टडी को लेकर सालों तक लड़ती रही। साहिर का अपने पिता के प्रति कोई विशेष लगाव देखने में भी नहीं आया। और पिता के व्यवहार को देखते हुए और पिता की अथॉरिटी से परेशान अपनी मां को सालों तक लड़ते हुए देख कर साहिर के मन में सत्ता के प्रति सदैव आक्रोश दिखता रहा।
जब शायरी करने लगे तो अपना नाम "साहिर" रख लिया, यानी जादूगर। और लुधियाना का होने की वजह से लुधियानवी। 19 साल की उम्र में साहिर ने "ताज महल" नाम की एक कविता लिखी थी। शायरी करते थे तो पॉपुलर भी बहुत थे। कॉलेज में किसी लड़की से प्यार हो गया। जानकारों के अनुसार, इस लड़की का नाम प्रेम/ प्रेमा चौधरी था। यहां थोड़ा कन्फ्यूजन है कि साहिर और प्रेमा प्रिंसिपल के ऑफिस के सामने वाले बगीचे में बैठ कर बात कर रहे थे तो प्रिंसिपल ने कॉलेज से निकाल दिया या उस लड़की का बाप एक अमीर आदमी था और उसने साहिर को कॉलेज से निकलवा दिया। साहिर उस लड़की से मिलते तो थे मगर गरीब होने के नाते सकुचाते भी थे। फिर ऐसे में दिल से ग़ज़ल निकली ताज महल जिसका अंतिम शेर है-
इक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर
हम ग़रीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़
मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझ से
इतनी तल्ख़ ग़ज़ल लिखना और ज़िन्दगी भर इस तल्खी को पाले रहना यही साहिर की नियति थी। इस ग़ज़ल से जुड़ा एक किस्सा है। साहिर के समकालीन शायर, शकील बदायूंनी ने इस ग़ज़ल के प्रत्युत्तर में फिल्म लीडर में एक गीत लिखा था जिसे नौशाद ने कंपोज़ किया और रफ़ी और लता ने गाया था।
एक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल
सारी दुनिया को मोहब्बत की निशानी दी है
साहिर के धर्म का मतलब- मजहब और इंसानियत था
हिंदी फिल्म के इतिहास में संभवतः ये दूसरा मौका था जब किसी लिरिसिस्ट ने किसी और लिरिसिस्ट की कविता का मज़ाक उड़ाया हो और प्रयुत्तर में उसी मीटर का गीत लिखा हो, ठीक विपरीत भावना के साथ। इस तरह का पहला मौका साहिर ने खुद पैदा किया था जब उन्होंने कवि प्रदीप के गीत का मज़ाक उड़ाया था। 1954 की फिल्म नास्तिक में प्रदीप ने एक गीत लिखा था जो आज भी एंथम लेवल का गाना है -
"देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान,
कितना बदल गया इंसान.
सूरज न बदला चांद न बदला,
ना बदला रे आसमान, कितना बदल गया इंसान."
साहिर, धर्म के ठेकेदारों से नाराज़ रहते थे। उनके लिए धर्म या मज़हब का मतलब इंसानियत होता था। इस गाने में भगवान् से की गयी शिकायत से नाराज़ साहिर ने 1955 की फिल्म रेलवे प्लेटफॉर्म (सुनील दत्त की पहली फिल्म) में ठीक उसी तर्ज़ पर लिखा -
देख तेरे भगवान् की हालत क्या हो गयी इंसान,
कितना बदल गया भगवान्.
भूखों के घर में फेरा न डाले, सेठों का हो मेहमान,
कितना बदल गया भगवान
हालांकि ये एक पैरोडी गीत था और फिल्म में रखा भी उसी तरह गया था मगर ये गीत तब भी मौजूं था। आज भी मौजूं है। सभी के मन में ये ख्याल आता ही है। साहिर ने गुस्से में सच लिखा था। लेफ्टिस्ट विचारधारा का होने की वजह से साहिर की ज़िन्दगी में हमेशा ही दिक्कतें रहीं हैं। पार्टीशन के बाद लिखे लेख की वजह से पाकिस्तान से हिंदुस्तान (लाहौर से दिल्ली) आने का मामला बना।
प्रीत नगर में हुई थी अमृता और साहिर की मुलाकात
साहिर अपने पिता के समान आशिक मिज़ाज थे। अमृता प्रीतम से इनकी अनकही मोहब्बत की कहानियां, अमृता द्वारा रचित साहित्य का एक अतुलनीय हिस्सा है।अमृतसर के पास प्रीत नगर में 1944 के एक मुशायरे में दोनों ने एक दूसरे को सुना। बात शायद नहीं हुयी मगर शायर की आंखों को लफ़्ज़ों की ज़रुरत नहीं होगी। अमृता की शादी बचपन में प्रीतम सिंह नाम के शख्स से हो चुकी थी और शादी कुछ खास चल नहीं रही थी। साहिर का गाम्भीर्य और अमृता का सौंदर्य, पहली नज़र में एक दूसरे के पास खींच लाया। फिर भी कई सालों तक मुशायरों में मिले लेकिन बात नहीं की। दोनों ने एक दूसरे को सिर्फ खत लिखे। खूबसूरत मोहब्बत हमेशा नाज़ुक होती है।
कभी- कभी वे मिल भी लेते। लेकिन बात नहीं होती थी ज़्यादा, बस समझ लिया जाता था। रूहानी रिश्ते की इस मिसाल का एक किस्सा अमृता प्रीतम ने अपनी जीवनी "रसीदी टिकट" में बयान किया है। इनकी मुलाक़ात में साहिर, अमृता के घर आते। घंटों तक दोनों एक ही कमरे में बैठे रहते। एक शब्द भी शायद नहीं बोलते। साहिर, चुप चाप सिगरेट फूंकते रहते, आधी पी कर बुझा देते, फिर नयी सुलगा लेते। फिर अचानक उठते और चले जाते । उनके जाने के बाद अमृता बचे हुए सिगरेट के टुकड़ों को जमा कर के अलमारी में रख लेती। फिर जब अकेली होती तो साहिर के अंदाज़ में ही सिगरेट जला कर पीती। बकौल अमृता, उन्हें लगता था कि मेरी उंगलियां साहिर की उंगलियों को छू रही हैं। बस इसी तरह अमृता को सिगरेट पीने की आदत पड़ी। सन्नाटे को बांटने की ये प्रेम कहानी अपने आप में एक मिसाल है उस प्यार की जो जुबां के भरोसे नहीं था मगर जुबां न होने से पूरा भी नहीं हो पाया।
साहिर अपने आपको आवारा समझते रहे
इनके प्रेम का एक और किस्सा अमृता ने यूं बयान किया। साहिर ने एक दिन अमृता से कहा कि चलो हम चीन चलते हैं। अमृता ने कहा क्यों? साहिर के कहा हम दोनों वहां शायरी किया करेंगे। अमृता ने कहा कि शायरी तो यहां भी हो सकती है। साहिर ने कहा कि हां, मगर हमें चीन से वापस आने की ज़रुरत नहीं होगी। गुस्सैल साहिर के मुंह से एक आशिक की तरह का एस्केपिस्ट या यूं कहें पलायनवादी ख्याल, इस पाक मोहब्बत का अजीब सुबूत है।
साहिर अपने आप को आवारा समझते रहे। अमृता के प्रेम से बंधे तो रहे मगर रिश्ते को कोई नाम देने के बारे में उन्होंने कभी सोचा ही नहीं। मोहब्बत ऐसी ही होती है, बस यही मान कर बैठे रहे। अपनी मां को भी एक बार साहिर ने कहा था, वो देखो अमृता, वो तुम्हारी बहू हो सकती थी। लेकिन ये रिश्ता अबोला रहा, चलता रहा और इसके किस्से साहित्य जगत में मशहूर होते रहे। फिर साहिर का मुंबई आना और सफल होना, साहिर की तल्खी, सफलता से उपजी सनक, आशिकी के किस्से और उनकी ज़िन्दगी में गायिका सुधा मल्होत्रा का आना... ऐसे कई कारणों से अमृता और साहिर का ये रिश्ता ख़तम हो गया।
खैर, बरसों बाद साहिर और अमृता फिर टकराये, और अमृता की ज़िन्दगी की नाव अब इमरोज़ के हाथ थी जो उनसे 10 साल छोटे थे मगर अमृता से बेतहाशा इश्क़ करते थे।साहिर को अमृता का इमरोज़ के लिए प्यार बर्दाश्त नहीं था। गुस्सैल साहिर ने फिर लिखा-
महफ़िल से उठा जाने वालों
तुम लोगों पर क्या इलज़ाम
तुम आबाद घरों के वासी
मैं आवारा और बदनाम
जब साहिर को गुस्सा आया और मंगनी तोड़ दी
साहिर की ज़िन्दगी में उनकी मां सबसे महत्वपूर्ण थीं। ज़िन्दगी का हर फैसला साहिर ने उन्हीं से पूछ के किया और शायद वो रिजेक्ट कर देंगी ये सोच कर साहिर ने किसी भी इश्क़ को उसके मुक़ाम तक पहुंचाने की हिम्मत नहीं दिखाई। वैसे उन्होंने पाकिस्तान की मशहूर लेखिका हाजिरा मसरूर से इंगेजमेंट ज़रूर कर ली थी। फिर एक दिन किसी मुशायरे में हाजिरा ने साहिर के किसी उर्दू शब्द के उच्चारण को दुरुस्त किया। बस क्या था, फिर आया साहिर का गुस्सा और उन्होंने मंगनी को नमस्ते कह दिया गया। हाजिरा ने बाद में पाकिस्तान के अहमद अली खान से शादी की जो कि उर्दू अखबार "डॉन" के 28 सालों तक संपादक रहे!
सुधा मल्होत्रा और साहिर की कहानी भी साहिर की तरह है, अधूरी और एक तरफ़ा। सुधा मल्होत्रा को मशहूर संगीतकार गुलाम हैदर ने चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर पहचान दी। मुंबई में सुधा की आवाज़ गूंजने में वक़्त नहीं लगा। फिल्म भाई बहन के एक गाने "मेरे नदीम मेरे हम सफर" में साहिर और सुधा की पहचान हुई। साहिर को सुधा पसंद आ गयी थी। इस समय साहिर अमृता के अधूरे प्यार से परेशान थे। एक समय वो आया जब साहिर रोज़ सवेरे सुधा को फ़ोन करते और कोई नया गाना सुना कर उनसे गाने की गुज़ारिश करते। सुधा के पिताजी, साहिर के फ़ोन को, सुधा का मॉर्निंग अलार्म कहते! यहां से दोनों की मोहब्बत की अफवाहें उड़ीं। दोनों ने कभी स्पष्टीकरण नहीं दिया। साहिर ने कभी कहा नहीं और सुधा के मन में सिवाय इज़्ज़त के कुछ था नहीं।
साहिर के लिखे तकरीबन दो दर्ज़न गाने सुधा ने फिल्मों में गाए। साहिर ने सुधा की म्यूजिक डायरेक्टर्स से सिफारिश भी खूब की। अफवाहें और किस्से चलते रहे। साहिर का एकतरफा प्यार परवान चढ़ता रहा और फिर एक दिन सुधा की शादी हो गयी।साहिर फिर से टूट गए। बाद में गॉसिप ये बनायीं गयी कि साहिर ने किसी पार्टी में सुधा को अपने पति के साथ देखा और गुस्सैल साहिर की कलम बोल उठी।
वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा
चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों
इस गाने को बीआर चोपड़ा ने ऐसी ही सिचुएशन बना कर फिल्माया। सुनील दत्त बने साहिर, साधना बनी सुधा और अशोक कुमार बने सुधा के पति। हालांकि साहिर ने ये ग़ज़ल अपने ग़ज़ल संग्रह तल्खियां में बहुत पहले लिखी थी तो इस कहानी का सही होना संदेहास्पद है। 1960 में चेतन आनंद की एक फिल्म (जो रिलीज़ नहीं हुयी) में सुधा ने साहिर की लिखी एक ग़ज़ल गायी थी जिसका शीर्षक था "कभी कभी"। ये ग़ज़ल बाद में यश चोपड़ा ने इसी नाम की फिल्म में इस्तेमाल की और इसे मक़बूलियत हासिल हुई। कहते हैं कि साहिर और अमृता की प्रेम कहानी ही कभी कभी फिल्म की कहानी का आधार थी।
वैसे सुधा मल्होत्रा का एक ऐसा अचीवमेंट है जो उनकी और साहिर की ख़याली कहानी को बयान करता है। सुधा ने साहिर के एक गाने को न खुद कंपोज़ किया बल्कि उसे गाया भी है और ये गाना साहिर अफ़सोस और अधूरे प्रेम की कहानी को बयान करता है।
तुम मुझे भूल भी जाओ, तो ये हक़ है तुमको
मेरी बात और है, मैंने तो मोहब्बत की है.
साहिर ने कभी शादी नहीं की, बस मोहब्बत की
तल्खी देखिये साहिर की, मेरी बात और है। साहिर के मन में कहीं न कहीं "देवदास" वाला बेचारगी भरा, मुझे कोई नहीं समझता वाला, कॉम्प्लेक्स रहा होगा। साहिर ने कभी शादी नहीं की। बस मोहब्बत की, और ढेर सारी मोहब्बतें की। अमृता से उनकी मोहब्बत उन पर बहुत भारी थी। एक संगीतकार से वो इसलिए नाराज़ हो गए थे कि उस संगीतकार ने उनके घर में टेबल पर रखे चाय के पुराने कप को हटाने की गुस्ताखी की थी। वो कप अमृता के कप था, जिसमें उसने चाय पी थी, जब वो आखिरी बार घर आयी थी। अब इस बात को क्या कहा जाए। मोहब्बत या वहशियत।
अमृता की करीबी दोस्त और पाकिस्तान की मशहूर लेखिका फहमिदा रियाज़ ने वहां के अखबार "जंग" में इन दोनों की आखिरी मुलाक़ात के बारे में लिखा था, जो शायद अमृता ने उनसे शेयर किया था। जब अमृता आखिरी बार जाने के लिए उठी तो साहिर ने कहा - तुम चली जाओगी, परछाइयां रह जाएंगी, कुछ न कुछ इश्क़ की रानाइयां रह जाएंगी.
1964 की फिल्म शगुन में साहिर ने इसे गाने की तरह इस्तेमाल किया। किस्सा ये रहा कि खय्याम साहब, जो साहिर की मित्र और मुरीद थे, ने गाना रफ़ी साहब की आवाज़ में रिकॉर्ड किया। खय्याम साहब ने ओके भी कर दिया। मगर साहिर की ज़िद थी कि रफ़ी साहब एक बार और रिकॉर्ड करें, क्योंकि "रानाइयां" इस शब्द के मायने रफ़ी की गायकी से साफ़ नहीं हो रहे थे। रफ़ी साहब, साहिर की बहुत इज़्ज़त करते थे और खय्याम साहिर का कहना टाल नहीं सकते थे। साहिर ने रफ़ी से कहा - ये अमृता के लिए है, चुनांचे आपको ज़ेहमत दी।
साहिर ने अपनी पहली फिल्म "आज़ादी की राह" में 4 गाने लिखे। फिल्म के बारे में कोई चर्चा नहीं हुई। गुमनाम होते साहिर की मुलाक़ात एसडी बर्मन से हुई। साहिर का अंदाज़ दादा को पसंद आया, शायद साहिर की कविता और मीटर की समझ की वजह से। अंग्रेजी गायिका कॉनी फ्रांसिस ने अपने एक गीत "नेवर ऑन अ संडे" के शुरू में आलाप लिया था जिस से इंस्पायर हो कर दादा बर्मन ने ट्यून बनाई थी और साहिर ने लिखा - ठंडी हवाएं लहरा के आएं। यहां से दोनों के साथ काम करने की शुरुआत हुयी। बाद में बाज़ी फिल्म में दोनों पहली बार झगड़े थे।
साहिर इस बात से गुस्सा थे की दादा बर्मन ने एक ग़ज़ल को बार डांसर का गाना बना दिया वो भी वेस्टर्न धुन पर।गाना था - तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले, अपने पे भरोसा हैं तो एक दांव लगा ले। खैर, दोनों ने साथ साथ कई सुपर हिट गीतों की रचना की। फिर आयी फिल्म फिल्म "प्यासा"। निर्देशक गुरुदत्त की शुरूआती दौर की फिल्में हलकी फुलकी होती थी।
गुरुदत्त और साहिर की एक कॉमन समस्या थी, मोहब्बत। गुरु दत्त की गायिका गीता दत्त से शादी में कई दिक्कतें आई। फिर गुरुदत्त का वहीदा रहमान के प्रति झुकाव। और गुरुदत्त के मन में एक अमिट छाप छोड़ने वाले निर्देशक की ख्याति पाने का ख्वाब, सब कुछ साहिर की ज़िन्दगी से मिलता जुलता ही था। वैसे प्यासा के संगीत पर एक पूरी किताब लिखी जा सकती है। साहिर के अंदर छुपी कलाकार की अकड़, इस फिल्म के संगीत की सफलता से बाहर आ गई थी। साहिर ने लता मंगेशकर से एक रुपया ज़्यादा फीस की डिमांड करना शुरू कर दी थी। और साहिर ने प्यासा में दादा बर्मन से एक रुपया ज़्यादा लेने की ज़िद भी की थी।
प्यासा के इस गीत के फिल्मांकन ने इस गीत को हमेशा के लिए अमर कर दिया। असफल शायर विजय जो अपनी ही मृत्यु के पश्चात् अपनी स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में पहुंच जाता है और बालकनी के दरवाज़े पर खड़ा है, रौशनी पीछे से आ रही है, उसकी आकृति दिख रही है और शॉल लपेटे भूखा प्यासा शायर ज़िंदा है तो बरबस उसके मुंह से साहिर की तल्ख़ आह निकलती है। इस फिल्म के गाने लिखने में साहिर ने अपने आप को निचोड़ के रख दिया था।
वो ये साबित करने पर तुले हुए थे कि गीतकार की वजह से फिल्म का गाना हिट होता है। प्यासा से साहिर ने एक नया ट्रेंड शुरू किया था। उस ज़माने में धुन बनती थी, और लिरिसिस्ट उस पर फिट होने वाले शब्दों से गीत बनाते थे। प्यासा में साहिर ने एसडी बर्मन को सभी गानों के लिरिक्स पहले ही लिख कर दे दिए और उन्हें न चाहते हुए भी साहिर के बोलों के लिए संगीत देना पड़ा। इस फिल्म के बाद साहिर ने कभी एसडी बर्मन के साथ काम नहीं किया।
आज सजन मोहे अंग लगा लो (गीता दत्त)/ सर जो तेरा चकराए (रफ़ी)/ हम आपकी आंखों में (रफ़ी- गीता)/ जाने क्या तूने कही (गीता)/ जाने वो कैसे लोग थे (हेमंत कुमार)/ ये हंसते हुए फूल (रफ़ी)/ जिन्हें नाज़ है हिन्द पर (रफ़ी)/ तंग आ चुके हैं कश्मकशे (रफ़ी)/ ये कूचे ये नीलाम घर (रफ़ी) और सबसे खूंखार गीत है जिसकी रचना दादा बर्मन ने न्यूनतम वाद्य यंत्रों की मदद से की थी।
"ये महलों ये तख्तों ये ताजों की दुनिया,
ये इंसा के दुश्मन समाजों की दुनिया.
ये दौलत के भूखे रवाजों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है.
खूंखार इसलिए क्योंकि गाने का अंत होता है रफ़ी का तार सप्तक में ये गाना -
जला दो इसे, फूंक डालो ये दुनिया,
मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया
तुम्हारी है, तुम ही सम्भालो ये दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
साहिर की ज़िन्दगी में कई औरतें आई। कई बार उन्होंने मोहब्बत की। मगर अमृता प्रीतम जैसा प्यार उन्हें कभी हुआ नहीं, और शायद किसी और से किया भी नहीं। साहिर के चाहने वाले लाखों हैं। उनकी तल्खियों के दीवानों की कमी नहीं है। एक टूटे दिल के आशिक की कहानी लिखने में साहिर का कोई सानी नहीं था और हिंदुस्तान में हर इंसान या तो मोहब्बत कर रहा है या मोहब्बत में जूते खा रहा है। बस इसलिए साहिर का गुस्सा हम सबमें नज़र आता है।
कभी वहश की तरह, कभी ज़ुल्म की तरह और कभी बेगैरत इंसान की तरह। मौत के बाद भी साहिर को चैन नहीं था। जिस कब्रिस्तान में उसे दफनाया गया था, जब बाद में उसमें जगह नहीं बची तो वहां की कब्रें खोद दी गई और नई कब्रों को जगह दी गई।साहिर के साथ उस कब्रिस्तान में रफ़ी साहब और मधुबाला की भी कब्रें हुआ करती थी।
साहिर के गाने आज भी बेहतरीन उर्दू शायरी के नमूने माने जाते हैं। उन्होंने अपनी ग़ज़लों को फ़िल्मी गीतों की शक्ल भी दी मगर उस बात से न मजमून नहीं बदला और न गहराई कम हुई। अपनी ज़िन्दगी के आखिरी दिन टैक्सी वाले को रुकने का कह कर वो अपने दोस्त से मिलने उसके घर गए। टैक्सी वाला इंतज़ार करता रहा और साहिर ने अपने दोस्त की बांहों में दम तोड़ दिया। अपने आप से जूझते साहिर की ज़िन्दगी खुद ही लिखी होगी उसने
रंग और नूर की बारात किसे पेश करूं
ये मुरादों की हसीं रात किसे पेश करूं
मैंने जज़्बात निभाए हैं उसूलों की जगह
अपने अरमान पिरो लाया हूं, फूलों की जगह
गौरतलब है कि इस ग़ज़ल को गया रफ़ी साहब ने, कंपोज़ किया ग़ज़ल के सबसे बेहतरीन कंपोजर मदन मोहन साहब ने, फिल्म का नाम भी था ग़ज़ल। सुनील दत्त साहब पर फिल्माया था ये गाना और सिचुएशन थी मीना कुमारी का रहमान साहब से निकाह।
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