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साहिर लुधियानवी: अधूरी मोहब्बतों का पक्के वाला तल्ख़ शायर

Viplove Gupteविप्लव गुप्ते Updated Fri, 13 Sep 2019 04:37 PM IST
साहिर को दुनिया से गुस्सा था। वैराग्य था। दुनिया को लेकर वो दुखी थे। साहिर को सब कुछ सही नहीं लगता था। 
साहिर को दुनिया से गुस्सा था। वैराग्य था। दुनिया को लेकर वो दुखी थे। साहिर को सब कुछ सही नहीं लगता था। 
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कोई अपनी मौत के बाद की ज़िन्दगी को कैसे सोच सकता है और उस पर लिख सकता है? विश्व भर के साहित्य में ऐसे गिने चुने उदहारण हैं जहां लेखकों ने मृत्यु के बाद होने वाली स्थितियों की कल्पना की और उस पर लिखा। लेकिन ये निरी कल्पनाएं ही थी। अभी कुछ दिन पहले पढ़ा कि पुरानी फिल्मों, डॉक्यूमेंटरीज और फुटेज को रिस्टोर कर उन्हें देखने लायक अवस्था में लाने वाले एड फिल्म निर्माता शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर ने साहिर लुधियानवी की डायरीज, नोट्स, नज़्में, ब्लैक एंड वाइट तस्वीरें, जुहू के एक कबाड़ी की दुकान से मात्र 3000 रुपए में खरीद कर उन्हें लापता होने से और नष्ट होने से बचा लिया।
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गुरुदत्त की फिल्म प्यासा में, जिसके गीत साहिर ने लिखे थे, ऐसा ही एक दृश्य है जहां फिल्म के सेंट्रल कैरेक्टर विजय की शायरी कबाड़ में मिलती हैं। साहिर ने अपनी मौत के बाद होने वाले अपने हालात पर कई साल पहले ही लिख दिया था- 

कल और आएंगे 
नग़मों की खिलती कलियां 
चुनने वाले 


मुझसे बेहतर कहने वाले,
तुमसे बेहतर सुनने वाले;

कल कोई उनको याद करे,
क्यूं कोई मुझको याद करे?
मसरूफ ज़माना मेरे लिए क्यूं
वक़्त अपना बर्बाद करे?"


साहिर का मन कसैला था, सिगरेट और शराब के स्वाद की तरह
साहिर को दुनिया से गुस्सा था। वैराग्य था। दुनिया को लेकर वो दुखी थे। साहिर को सब कुछ सही नहीं लगता था। उस समय के लोग एक यूटोपियन वर्ल्ड की इच्छा लिए दिल को समझा लेते थे। लेकिन साहिर नहीं। साहिर का मन कसैला था। उनकी सिगरेट और शराब के स्वाद की तरह। कड़वाहट। ऐसी कड़वाहट सिर्फ एक संवेदनशील रूह को बख्शी जाती है। वो रूह जो अपने लिए कम और औरों के लिए ज़्यादा दुखी है। साहिर के मन में लोगों की कम-अक़्ली को लेकर मलाल भरा हुआ था, पूरी ज़िन्दगी। शायद इस दुःख ने उन्हें प्रेरणा दी कि वो अंदर के तेज़ाब को लफ़्ज़ों की बैरल में डाल कर मुक्त हो जाएं। कोई गीत लिख दूं, कोई नज़्म कह दूं, कोई ग़ज़ल सुना दूं। क्योंकि ये तो सुधरेंगे नहीं।

 
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